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Marna humara jansidh Adhikar hai




अब इलेक्ट्रिक श्मशान का जमाना आ गया है। क्या ठाटदार श्मशान बने हैं । इलेक्ट्रॉनिक चाइनीस भट्टी। 
इधर रिमोट कंट्रोल दबाया उधर मुर्दा खल्लास। चीखने, चिल्लाने, रोने की कोई परेशानी भी नहीं।
रोने वाले भी शमशान में ऑन रेंट उपलब्ध है। 


श्मशान में शानदार बगीचा, बगीचे में शानदार फव्वारे। फव्वारे मैं शानदार संगीत, संगीत के साथ बजते तबले।
वाह उस्ताद जवाब नहीं। ऐसी मरने की शानदार सुविधा। मन करता है साल में 4-5 तो बार मर ही जाए।
श्मशान में किसी मुर्दे को जलते देखा नहीं कि इससे मन जल उठता है।


काश! ईश्वर ने हमें भी मरने का ऐसा पवित्र मौका दिया होता। परंतु हाय रे! मरने की न्यूनतम सुविधा तक नहीं। पहले लोग भूखे पेट भरकर मजे से शमशान का फायदा उठाते। लेकिन सरकार ने यह सुविधा भी छीन ली।
लोगों को जबरन गुलाब जामुन और जलेबी बनाने लग गई।

भूखे पेट मरने पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया। वरना खाली पेट मरने का आनंद ही कुछ और था। खाली पेट हल्का मुर्दा, फूल - सा। अर्थी ढोने वाले भी मुर्दे को दुआएं देते।
उछलते कूदते उसे श्मशान ले जाते सरकार ने मरने की सुविधा चीन का गरीबों का हक मार दिया । पहले रेलगाड़ियों के नीचे दबकर मरने का फैशन था। रेल मंत्रालय इसमें पूरी मदद करता ।नॉक आराम से लेटे लेटे ही रेल के नीचे आकर श्मशान का लुफ्त उठाते।


अब कोई रेलवे से दबकर मरता ही नहीं। कमबख्त सरकार ने यह सुविधा भी छीन ली। अप मारने वाला पड़ा रहता है परियों पर इंतजार करता है । अब रेल आएगी । अब रेल आएगी । शानदार तरीके से कुचल कर आगे निकल जाएगी किंतु रेल देवी 20 बीस घंटे तक नहीं आती।


रेलें आपस में टकराकर ही अपना स्वयं के मरने का कोटा पूरा कर लेती हैं। बेचारा मुर्दाकांक्षी भूखा प्यासा तड़पता रहता है । घोर अंधेरगर्दी व्याप्त है । पहले जहर खाकर भी तसल्ली से मरने का रिवाज था। अच्छे-अच्छे लोग जहर खाकर मरने में विश्वास रखते, किंतु आजकल महंगाई देवी ने मुर्दाकांसी की कमर तोड़ कर रख दी है । जहर के भाव भी मंगल ग्रह को छूने लग गए हैं।

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