सियासत की सच्चाई बयां करते 10 चुनिंदा शेर... सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सियासत की सच्चाई बयां करते 10 चुनिंदा शेर...


हम को यारों ने याद भी न रखा
'जौन' यारों के यार थे हम तो
- जौन एलिया


ऐसा हो ज़िंदगी में कोई ख़्वाब ही न हो
अंधियारी रात में कोई महताब ही न हो
- ख़लील मामून


'हातिम' उस ज़ुल्फ़ की तरफ़ मत देख
जान कर क्यूं बला में फंसता है
- शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम


इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
ढूंढ़ता फिरा उस को वो नगर नगर तन्हा
- जावेद अख़्तर


हमें तो अहल-ए-सियासत ने ये बताया है
किसी का तीर किसी की कमान में रखना
- महबूब ज़फ़र


जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में
बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते
- अल्लामा इक़बाल


समझने ही नहीं देती सियासत हम को सच्चाई
कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पन नहीं मिलता
- अज्ञात


सरों पर ताज रक्खे थे क़दम पर तख़्त रक्खा था
वो कैसा वक़्त था मुट्ठी में सारा वक़्त रक्खा था
- ख़ुर्शीद अकबर


सिर्फ बाक़ी रह गया बेलौस रिश्तों का फ़रेब
कुछ मुनाफिक हम हुए, कुछ तुम सियासी हो गए
- निश्तर ख़ानकाही


कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर
क्या हक़ीक़त है और सियासत क्या
- सागर ख़य्यामी


ख़ुद-कुशी करती है आपस की सियासत कैसे
हम ने ये फ़िल्म नई ख़ूब इधर देखी है
- गोपालदास नीरज


रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे
हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे
- शकील जमाली


फिर चीख़ते फिर रहे बद-हवास चेहरे
फिर रचे जानें लगें हैं षड्यंत्र गहरे
- माधव अवाना


आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग
- मिर्ज़ा ग़ालिब

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