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बेपनाह - Bepanah Written - By Vikarm Sharma Sifar | hindi kahani Bhag 7 to 8....... - hindishayarih


बेपनाह - "Bepanah"   ज़िन्दगी के रेगिस्तान में तड़पते लोगों को प्यार पनाह देता है लेकिन कुछ ऐसे भी बदकिस्मत होते हैं जो बेपनाह रह जाते हैं। बेपनाह _Bepanah ऐसे ही बदकिस्मत लोगों की कहानी है।



दिल्‍ली के पॉश इलाके में स्थित भवन को घर कहना शायद इसका अपमान होगा। यह किसी भी तरह से किसी महल से कम नहीं था। अगर यूँ कहें कि यह उस इलाके का सबसे सुन्दर भवन और शान था तो गलत नहीं होगा। घर के बाहर लगी हुई सुनहरी नाम-पट्टिका पर उकरे हुए अक्षर उसमें रहने वाली बुलन्द शख्सियत के ठाठ-बाठ के गवाह थे।


इस भवन के मालिक श्री कमल रना स्वयं भी किसी राजा से कम नहीं थे। मुश्किल से मुश्किल काम उनकी चुटकी बजाते ही हो जाते थे। कुछ ही दर्षों में उन्होंने इतनी प्रगति की थी उनके प्रतियोगी भी हैरान थे और उनके सहयोगियों की ढॉँछें खिली हुई थीं। कपड़े से लेकर केमिकल, मोबाइल से लेकर मेडिकल इंडस्ट्री तक में उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हस्तक्षेप था।


१२ कुर्सियों वाले डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करते समय उनके एक हाथ में टोस्ट और दूसरे हाथ में अख़बार था जिस पर जमी हुई नज़रों से वह आज की राजनीति का बख़्बी जायज़ा ले रहे थे जबकि दिमाग में आज शेयर बाजार को लेकर कुछ विचार हुड़दंग मचाने को व्याकुल हुए पड़े थे।


कश्मीर मे जन्मे कमल रैना को आतंकवादियों के डर से अपने माँ-बाप के साथ बचपन में ही दसा-बसाया घर और काम छोड़कर आना पड़ा था। वहाँ से विस्थापन के पश्चात्‌ उन्हें सब कुछ शून्य से शुरु करना पड़ा था। जाने कितने पापड़ बेलने के बाद दर्षों के अनथक परिश्रम से कमाई जमा-पूंजी से एक कारखाना लगाया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ दर्षों में ही वह शहर के शक्तिशाली उद्योगपति बन गए थे और अब उनका लक्ष्य देश के अग्रणी और दिग्गज लोगों की सूची में आना था और इसके लिए वह कोई भी साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपना सकते थे। लेकिन कहते हैं न कि ज़्यादा पैसा दिमाग खराब कर देता है, वैसे ही पैसे का गुरूर उनके सिर पर भी चढ़ कर बोलता था।


इतने गुणों के होते हुए भी वह दिल्ली में ही अंगद की तरह पाँव जमाए बैठे थे जबकि उनका एक भवन देश की व्यापारिक राजधानी मुम्बई में भी था और इस भवन से अधिक बड़ा था। परन्तु दिल्ली में रह कर राजनेताओं से सीधे सम्पर्क साधा जा सकता था और कई आड़े-सीधे काम एक ही आग्रह पर हो सकते थे। उड़ती-उड़ती खबर तो यह भी थी कि अगले चुनाव में किसी बड़े राजनीतिक दल के माध्यम से वह अपना भाग्य आज़मा सकते थे। राजनीतिज्ञों के सम्पर्क में रहकर कुछ कूटनीतिक वह भी सीख गए थे और व्यापार में अक्सर ये दाँव-पेच आज़माते रहते थे। इस समय वह शान से बैठे हुए किसी महाराजा से कम नहीं लग रहे थे।


उस बड़ी सी डाइनिंग टेबल के दूसरे छोर पर बैठी महिला इस घर की मालकिन यानी कि कमल रैना की पत्नी किरण रैना थी। पहनावे और ठाठ से वह भी महारानी लगती थी। कंधों तक कटे हुए बाल, होंठों पर गहरी लाल लिपस्टिक, बदन पर बैकलेस ब्लाउज और रेशमी साड़ी उनकी रईस शख्सियत को और निखार रही थी। वह अपनी उम्र से कम नज़र आती थी और अब तक लोग उनकी अदाओं के दीवाने थे (ऐसा उनका मानना था)। डाइनिंग टेबल पर इस समय बैठकर वह सामने पड़ी प्लेट में रखे पराँठे को खा कम रही थी और देख ज़्यादा रही थी (दरअसल आजकल दह डाइटिंग पर थी)। अपने पति की तरह ही श्रीमती रना के शौक भी रईसों दाले ही थे। रोज़ जिम जाती थी (शायद कसरत करने) लेकिन वहाँ उनकी सहेलियाँ भी आती थी इसलिए ढातें ही हो पाती थीं। श्रीमती रना को शॉपिंग का भी बहुत शौक था। उनका ज्यादा वक़्त या तो खरीददारी में चला जाता था और या फिर पार्टियों में। इसके अलावा वह आजकल अपने पति के लिए राजनीतिक ज़मीन तैयार करने में लगी थी। उनकी बहुत-सी समाज सेदा की खबरें सामाचारपत्रों का हिस्सा बनी रहती थीं। लेकिन उन्होंने अपनी बीती ज़िन्दगी, जिसमें बहुत सा हिस्सा गरीबी में गुज़ारा था, उससे इतनी ज्यादा नफ़रत थी कि वह उन दिनों को याद भी नहीं करना चाहता थी और न ही पिछली ज़िन्दगी से जुड़े लोगों के बारे में बात ही करना चाहता थी। फिलहाल वह पराँठा खाते हुए इसी सोच में घुली जा रही थी कि अपने बढ़ते वज़न को कैसे नियन्त्रित करे।


कमल रैना के दाईं तरफ २ कुर्सियां छोड़ कर बैठी लड़की इस घर की राजकुमारी यानी रैना दम्पति की छोटी संतान अर्पिता रैना थी। उसका ध्यान अपने सामने मेज़ पर कटेरे में रखे कॉर्न फ्लेक्स की ओर कम और अपने मोबाइल की तरफ अधिक था जिसमें वह अपने मित्रों से बात करने में लीन थी।



फिलहाल वह कॉलेज में पढ़ती थी और फैशन डिजाइनर बनना चाहती थी लेकिन उसके मम्मा और डैड का विचार था कि उनके खानदान में किसी लड़की ने आज तक नौकरी नहीं की थी इसलिए उसे भी नहीं करनी चाहिए थी। अर्पिता के बहुत ज़िद्द करने पर कमल ने अपनी कृटनीतिक चाल का प्रयोग करते हुए उसे यह बेकार की ज़िद्द छोड़ने पर एक नई कार लेकर देने का दादा किया था। उसे अपनी अमीरी का घमण्ड विरासत में मिला था। इस समय वह "कार या करियर' दाली


ज़िद्द करने पर कमल ने अपनी कूटनीतिक चाल का प्रयोग करते हुए उसे यह बेकार की ज़िद्द छोड़ने पर एक नई कार लेकर देने का दादा किया था। उसे अपनी अमीरी का घमण्ड विरासत में मिला था। इस समय वह 'कार या करियर' दाली कश्मकश में उलझी हुई थी जिसका हल वह दोस्तों से एसएमएस के ज़रिये पूछ रही थी। ऊपर से उसके कानों में उड़ती- उड़ती खबर पड़ी थी कि उसके मम्मा-डैड उसकी शादी के लिए अपने जितने या अपने से ज्यादा अमीर और प्रतिष्ठित खानदान में जल्दी करवाने के इच्छुक थे और ऐसा परिवार ढूँढने का प्रयास भी शुरू कर चुके थे। उसे अपना करियर बनाने का सपना टूटता नज़र आने लगा था। इसी खीझ में आजकल उसका गुस्सा घर के नौकरों पर उतरने लगा था (और उतरता भी किस पर?) तुनकमिजाज़ तो वह पहले से ही थी और अब तो बेचारे नौकरों की शामत आ गई थी।


सब अपने-अपने तनाद में बिना एक-दूसरे पर ध्यान दिए चुपचाप नाश्ता कर रहे थे लेकिन उसमें से खा कोई भी नहीं रहा था। तभी रैना खानदान के सपूत और कमल और किरण की पहली संतान राहुल रना ने प्रवेश किया।


“गुड मॉर्निंग डैड! गुड मॉर्निंग मम्मा! गुड मॉर्निंग अप्पू!*, राहुल मुस्कुराते हुए सन्नाटे को तोड़ते हुए डैड की बाईं ओर ३ कुर्सियाँ छोड़कर पसर गया। अब महौल यह था कि चारों एक साथ होकर भी दूर-दूर ही बैठे थे और दो भी इस प्रकार कि एक-दूसरे का सामना न करना पड़े। यह दूरी उनकी एक-दूसरे से भावनात्मक दूरी को भी प्रदर्शित कर रही थी।


"मुझे अप्पू मत कहो!" अर्पिता ने दाँत पीसते हुए राहुल को घूर कर कहा। लेकिन राहुल की 'सुप्रभात' का जवाब किसी ने भी नहीं दिया था। तभी कुक ने राहुल के सामने प्लेट में सैंडविच परोस दिया और दूध का गिलास भी रख दिया।


“डैड! कब आए जापान से?" राहुल ने उत्तेजित होते हुए पूछा। "कल रात ही आया हूँ।" कमल ने अपनी नज़र अभी भी अखबार से नहीं हटाई थी।



“कैसा रहा सफ़र? मस्त?", उसने एक जिज्ञासु बच्चे की तरह पूछा। राहुल वहाँ के बारे में बहुत कुछ जानना चाहता था। “हाँ। जापानी कम्पनी निवेश करने को तैयर है। अगले महीने ही डील साइन हो जाएगी," कमल ने अखबार में डूबे हुए ही कहा। राहुल को यह जदाब सुनकर निराशा हुई क्योंकि 'मस्त' शब्द से राहुल का मतलब मौज-मस्ती और सैर-सपाटे से था


और कमल का मतलब सिर्फ़ व्यापार से। राहुल दीप्ति से कल की मुलाकात वाली घटना यह सोचकर सुनाने ही वाला था कि सब इतने सालों बाद उसके बारे में जानकर खुश होंगे लेकिन तभी १ बम फूटा।


"क्या तुमने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी का फॉर्म भरा?", कमल ने इस बार अखबार से नजर हटाते हुए राहुल को देखकर पूछा। वह बहुत दिनों बाद उसे देख रहे थे। राहुधशल को लगा कि मानो फौज पूरी तैयारी के साथ हमले करने वाली थी। यह देखकर उसे हथियार डालने को मजबूर होना पड़ा।


“नो डैड", उसने नज़र चुरा कर सिर झुका लिया। "आज ही भरो और अहमदाबाद में नया प्रोजेक्ट लॉन्च हो रहा है। उसे तुम ही देखोगे।" पिता की आज्ञा सुनकर राहुल ने अनमने ढंग से हाँ में सिर हिलाया। कमल ने इतना कहकर अखबार रखा और दफ्तर की तरफ निकल पड़े। उसके पीछे


श्रीमती रना और अर्पिता भी बारी-बारी उठकर चल दी। मगर राहुल के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी थी। दह आराम से सैंडविच चबाते हुए इस बात पर मुस्कुरा रहा था कि आज फिर दीपू से मुलाकात होगी।


वो मज़ा कहाँ वस्ल-ए-यार में, लुत्फ़ जो मिला इंतज़ार में


तक़दीर किसे, कब, कहाँ और कैसे किसी से मिलदा दे जुदा कर दे, कोई नहीं जानता। कहते हैं कि इंसान अगर कुछ भी करने की ठान ले तो दह काम होकर रहता है लेकिन कुछ चीज़ें उसके बस से बाहर की होती है। जब उसका इन सब पर बस नहीं चलता तो वह इसे तकदीर का नाम देकर तसल्ली कर लेता है। ज़िन्दगी के दरख़्त को हरा-भरा रखने के लिए अपनेपन के पानी और जज्बातों की खाद की बहुत ज़रूरत होती है, तभी वह समाज रूपी बगीचे में अपनी पहचान बनाए रख सकता है, अपनी जड़ें जमाए रख सकता है।


राहुल और दीप्ति के बीच जब इसी अपनेपन के बीज का अंकुर फूटा ही था कि तकदीर इन्हें एक-दूसरे से अचानक ही दूर ले गई और जब दोनों एक-दूसरे की धुँधली यादों को दिल की अलमारी में बन्द कर चुके थे तो तकदीर ने ही उन्हें फिर से करीब ला कर खड़ा कर दिया।


कश्मकश सिर्फ दीप्ति के मन में ही थी बल्कि राहुल भी हैरत में था। एक अजीब-सी बेचैनी थी लेकिन उसके दिल का हाल दीप्ति से अलग था। अपनों के बीच अपनेपन को तरसते राहुल के दिल की तपती ज़मीन पर दीप्ति पानी की एक तेज़ धारा न सही लेकिन एक रिमझिम फुहार से कम ना थी।



आज राहुल के चेहरे पर एक रौनक सी घर कर गई थी और कदमों में रदानगी थी लेकिन जिसे मिलने को ठह बेचैन था, उसका दीदार अभी तक उसे नहीं हुआ था। उसे अपने बचपन की दोस्त किस्मत से ही मिली थी। उसके बचपन की तस्वीरों में ४-५ तस्वीरें दीप्ति के साथ भी थी जिसने उसके मन में दीप्ति की यादों को जिन्दा रखा था। यही दजह थी कि वह दीप्ति का चेहरा भुला नहीं पाया था और कुछ कोशिश के बाद ही उसे पहचान गया था।


ठह तेज़ी से उसकी क्लास की तरफ बढ़ने लगा। उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब वह किसी बहाने से अपनी क्लास से निकल कर उसकी क्लास के सामने उसे इशारे से बुलाया था और वह टीचर से बचकर उसे जाने का इशारा करती थी। उन दिनों को याद करके राहुल के होंठों पर बरबस ही मुस्कुराहट आ गई। वह यह जानने के लिए उत्सुक था कि क्या दीप्ति आज भी वैसा ही करने दाली थी। उसने बाहर से ही क्लास में झाँकना शुरू किया लेकिन दीप्ति उसे कहीं नज़र नहीं आई। अचानक उसकी नज़र दीप्ति की सहेली पर पड़ी। पता नहीं क्या सोच कर राहुल ने उसकी तरफ हाथ से इशारा कर दिया। वह लड़की प्रिया ही थी। कल की घटना की वजह से वह पहले ही घबराई हुई थी और अब जब उसने राहुल को ऐसा करते हुए देखा तो वह और डर गई। कंगाली में आटा गीला वाली बात यह थी कि आज दीप्ति भी उसके साथ नहीं थी। दीप्ति उसकी सहेली तो थी ही लेकिन जिस तरह से वह उसे मुश्किल परिस्थितियों और ऐसे लोगों से ढचाती थी, कभी-कभी प्रिया को लगता था जैसे वह उसका भाई हो। लेकिन आज उसका भाई उसके साथ नहीं था।


आखिरी लेक्चर खत्म होते ही प्रिया ने उधर देखा तो राहुल वहाँ नहीं था। उसकी साँस में साँस आई। उसने सोच ही लिया था कि आज ठह दीप्ति को उस लड़के की इस हरकत के बारे में बताएगी। उसके बाद दीप्ति को जो सही लगे दह करेगी। दीप्ति के साथ न होने से दह घबरा ज़रूर गई थी लेकिन यह उसकी खुशी का भी एक कारण था। हालांकि प्रिया उसे बहुत सी बातें बत्ती थी लेकिन कुछ राज़ उसने सबसे छुपा कर रखे थे। अगर यह राज़ दीप्ति को पता चल जाता तो उसकी शामत निश्चित थी।


प्रिया के गुलाबी होठों पर एक खुफिया मुस्कुराहट और काजल लगी आँखों में एक चमक थी। उसने कॉलेज के ही पार्क में पहुँच कर जब मोबाइल निकाला तो एक नम्बर देखकर क्यारी में लगे फूलों से ज़्यादा महक उसके खुद से आने लगी। इस महक ने उसका डर भगा कर ध्यान उस व्यक्ति की ओर लगा दिया जिसे वह अभी कॉल करने वाली थी। यह काम वह दीप्ति के सामने बिल्कुल नहीं कर सकती थी। प्रिया अभी वह नम्बर मिलाने ही दाली थी कि उसे पीछे से किसी ने पुकारा और इसी घबराहट में उसका मोबाइल नीचे गिर गया।


"हैलो" प्रिया ने घबराते हुए तेज़ी से पीछे मुड़कर देखा तो राहुल को खड़ा था। उसे देखकर वह ऐसे चौंक गई जैसे चोर पकड़े जाने के समय चौंकता है। मगर अगले ही पल हिम्मत बटोर कर बोली, “ऐ मिस्टर, कल से पीछा क्यों किए जा रहे हो मेरा? मार खाने का इरादा है क्या?" दीप्ति के साथ रह कर लफंगों को सीधा करना वह भी अच्छी तरह जान गई थी।


"मैं तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा था। मैं तो तुम्हारी सहेली का... मेरा मतलब की मैं पीछा नहीं कर रहा था।” राहुल को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे।



दीप्ती का नाम सुनकर प्रिया को कुछ धक्का लगा। पहली बार किसी लड़के ने पीछा किया और वह भी उसका नहीं बल्कि उ की सहेली का जिसे लड़कों में कोई रुचि ही नहीं थी। यह जान कर उसका गुस्सा फूट पड़ा, "तुम्हें शर्म नहीं आती लड़कियों की पीछा करते हुए? मैं तुम्हारी शिकायत करूँगी।”प्रिया को इस तरह बोलता देख और छात्र भी उधर देखने लगे जिससे राहुल घबरा गया है लेकिन उसने धैर्यपूर्वक प्रिया को समझाना कि वह कल दीप्ति की किताब वापस करने आया था और दीप्ति उसके बचपन की दोस्त थी लेकिन इतने सालों ढाद मिलने के कारण वह उसे कल ही पहचान पाई थी।


“मैं कैसे मान लूँ कि तुम सच बोल रहे हो?", प्रिया ने राहुल से बेरुखी से पूछा। वह अभी भी उसकी बात का यकीन नहीं कर पाई थी।


"तुम दीप्ति को बुलाओ और पूछ लोकि मैं सच बोल रहा हूँ या नहीं", राहुल ने पूरे आत्म-विश्वास के साथ कहा तो प्रिया के तेवर ढीले पड़ गए।


“लेकिन वह तो आज आई नहीं" प्रिया ने कुछ नर्म लहज़ा अपनाते हुए कहा। "तो तुम उसे कॉल कर लो। अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।" राहुल भी हार मानने वालों में से नहीं था।


“तुमने मेरा मोबाइल नीचे गिरा दिया। अब यह चल नहीं रहा है", प्रिया ने रुआंसी होते हुए अपने मोबाइल को चलाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा। उसे बच्चों जैसी शक्ल बनाते देख कर राहुल को हँसी आ रही थी लेकिन वह किसी तरह खुद को काबू किए हुए था।


दीप्ति सुबह उठी तो उसने देखा कि ८ बज चुके थे और उसकी मॉम बुटीक जाने के लिए तैयार हो रही थी। रातभर ठीक से सो न पाने की वजह से उसे सुस्ती महसूस हो रही थी और बदन भी दर्द कर रहा था। वह उठ कर अंगड़ाई लेती हुई अपने स्टडी टेबल के पास पहुँची तो उसे वही किताब नज़र आई जिसे लौटाने राहुल उसके पीछे आया था। राहुल का ध्यान आते ही उसे अनजानी सी ख़ुशी ने घेर लिया और बेख्याली में उसके नर्म गुलाबी होंठों पर मुस्कान आ गई। लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा गंभीर हो गया और दो एकदम से सीधी खड़ी हो गई। उसे रात में खुद से किया हुआ वादा याद आ रहा था कि वह राहुल से दूर ही रहेगी। काम मुश्किल था लेकिन दिल पर पत्थर रखकर करना ही पड़ना था।


"आज मेरा बच्चा बहुत देर से उठा। तबियत तो ठीक है?" कमरे में प्रवेश करते हुए उसकी नानी ने उसे ख्यालों से निकाले हुए पूछा।


“गुड मॉर्निंग नानी माँ", कहती हुई दीप्ति नानी से लिपट गई। नानी ने उसके माथे पर यह जानने के लिए हाथ रखा कि कहीं उसे बुखार तो नहीं लेकिन उसे मुस्कराता देख कर नानी ने राहत की साँस ली और दीपू का माथा चूम लिया।


नानी दीप्ति की बहुत अच्छी दोस्त थी और मार्गदर्शक भी। दीप्ति अपनी नानी के गले लग गई। यूँ तो उनके बीच ऐसा प्यार आम बात थी लेकिन नानी उसके दिल की बात झट से समझ जाती थी। शायद इसे ही उम्र का तजुर्बा कहते हैं।


"क्या हुआ बेटा?" नानी ने कंधे से लगी हुई दीप्ति के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।


“कुछ भी नहीं नानी माँ। आज कॉलेज जाने का मूड नहीं है", दीप्ति ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा लेकिन उसकी उदास आँखों ने उसके दिमाग में मची उथल-पुथल की चुगली नानी से कर दी।


"कोई बात नहीं बेटा। तुम आज मेरे साथ घर पर ही रहना", नानी ने उसे दुलारते हुए कहा।



दीप्ति तो इसलिए कॉलेज नहीं जाना चाहती थी ताकि राहुल का सामना न करना पड़े। हालांकि यह कोई स्थाई हल नहीं था लेकिन कम से कम आज तो वह अपने दिल को समझा सकती थी। लेकिन अगर वह नानी के पास रहती तो ठह ढातों ही बातों में सारा राज़ उगलवा लेती।


दीप्ति नानी को राहुल के बारे में बताने से नहीं डर रही थी। वह तो सरी बाट कल राट को ही बाटा चुकी थी। बल्कि वह तो ख़ुद इस कश्मकश में थी वह अपनी उलझन कैसे बताए? वह देर रात तक अपने दिल और दिमाग में सुलह करवाने में लगी रही लेकिन जब बात न बनी तो उसने यह सोचकर हथियार डाल दिए कि इन दोनों को जो करना है करते रहे। पहले तो वह एक मूक दर्शक की तरह दिल और दिमाग की रस्साकशी देखती रही और फिर थक कर अपना ध्यान वहाँ से हटा लिया था।


“नानी माँ! मैं सोच रही थी कि आज मॉम के साथ बुटीक चली जाऊँ। काम नहीं आता तो क्या? उनकी थोड़ी बहुत मदद ही कर दूँगी" उसे नानी के सठालों से बचने का इससे सरल उपाय नहीं मिला था।


“मेरा बेटा सच में ढड़ा हो गया है। चलो फिर जल्दी तैयार हो जाओ। मैं तुम्हारे लिए नाश्ता बनाती हूँ", नानी ने प्यार से दुलारते हुए कहा। "सुमन! आज दीपू तुम्हारे साथ जाएगी", नानी दीप्ति की माँ को पुकारती हुई बाहर निकल गई।


नाश्ता करने के बाद दीप्ति ने तैयार होकर जब जब खुद को अपने में निहारा तो अपने उन ख्यालों पर हँसी आ गई जो अन्दर घमासान मचाए हुए थे। वह बाकी लड़कियों जैसी बिलकुल नहीं दिखती थी। उसने मेकअप कभी नहीं किया था तो उसे खुद पता नहीं था कि ठह सुन्दर थी या नहीं। फिर भला राहुल उसे क्यों देखता? उसने पास पड़े मॉम के दुपट्टे से अपना सिर ढका और जब फिर से आइने में देखा तो दह खुद को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। उसने मायूस होकर तुरन्त उसे हटा लिया था।


उसकी आधी समस्या तो यूँ ही हल हो गई थी। उसका मानना था कि अगर वह ऐसे ही पहनावे में राहुल के सामने जाएगी तो वह उसे उस नज़र से नहीं देखता और धीरे-धीरे खुद ही दूरी बना लेगा।


जल्दी से नाश्ता करके वह मॉम के साथ बुटीक पहुँच गई। दहाँ उसके करने लायक कुछ भी नहीं था लेकिन दह मॉम को काउंटर पर बिठा कर खुद हर काम भाग-भाग कर कर रही थी। सुमन दीपू को काम करते देख खुशी से फूली नहीं समा रही थी लेकिन उसे यह नहीं पता था कि दीपू स्वयं को इप्ली इसलिए जानबूझ कर व्यस्त रखे हुई थी ताकि अपने सपनों का बचा-खुचा किला गिरने का दर्द उसके चेहरे पर न आ जाए।


“दीपू बेटा इधर आना", सुमन ने काउंटर से ही पुकारा। “जी मॉम", कहती हुई वह अपनी मॉम के सामने खड़ी हो गई। सुमन ने आइलाइनर से बाएं गाल पर एक हल्का सा काला टीका लगा दिया ताकि उसे ज़माने की नज़र न लगे। आज मॉम


उस पर कुछ ज़्यादा ही ममता दिखा रही थी। किसी भी रिश्ते की नींव दो ही चीज़ों पर खड़ी होती है - प्यार और बिश्वास। यही प्यार उन तीनों औरतों को आपस में बाँधे हुए था।


दोपहर हो चुकी थी और सारा स्टाफ लंच कर रहा था। दीप्ति को भी भूख लगने लगी थी। इतने में ही उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आई। उसने हैरान होते हुए कॉल सुनी की प्रिया की घढराई हुई आवाज़ उसे सुनाई दी, "हैलो दीप्ति? वह कल वाला लड़का कह रहा है कि वह तुम्हारा दोस्त है और तुम्हारा नम्बर माँग रहा है। मैंने नहीं दिया। क्या करूँद?"


“प्रिया? यह किसका नम्बर है?” दीप्ति ने उसकी बात को अनसुना करते हुए कहा। “उसी लड़के का। मेरा मोबाइल गिर कर बन्द हो गया था तो उसने मुझे अपने नम्बर से कॉल करने दी", प्रिया ने मासूमियत से जदाब दिया।


दीप्ति को समझ नहीं आया कि वह क्या जवाब दे लेकिन उसके मुँह से गुस्से में यही निकला, “तुम सचमुच बेवकूफ हो या कोई कोर्स किया है? उसके मोबाइल से कॉल करके पूछ रही हो कि नम्बर दे दूँ?"



प्रिया के दिमाग की ट्यूबलाइट तब जली जब सारी दुनिया में सूरज निकल चुका था लेकिन अब हो भी क्या सकता था? दीप्ति का नम्बर राहुल के मोबाइल में आ ही चुका था। प्रिया बेवकृफ़ नहीं थी मगर भोली-भाली थी, तभी लोगों की बातों में जल्दी आ जाती थी वर्ना पढ़ाई में तो वह टॉपर थी और ९०% से कम अंक नहीं लाती थी लेकिन दुनियादारी के मामले में बुदधू थी। भोलापन एक दो धारी तलवार की तरह होता है जिसकी एक धार अपनी तरफ भी होती है जिससे खुद का गला भी कट सकता है। प्रिया भी आत्मघाती रूप से भोली थी और दीप्ति उसकी म्यान थी।


“सॉरी!” प्रिया ने इतनी मासूमियत से रुआंसी हो कर कहा कि दीप्ति को उस पर दया आ गई। वह समझ चुकी थी कि उसकी भोली-भाली सहेली को राहुल ने अपना शातिर चाल से बेवकृफ़ बनाया था।


“हैलो दीपू! तुम आज कॉलेज नहीं आई। मुझे चिन्ता हो गई था।" अगली आवाज़ उसी की थी जिससे वह भागना चाहती थी। “हम वो .... कुछ काम था", दीप्ति का गुस्सा अब शान्त हो चुका था और अब उसकी जगह घबराहट ने ले ली थी।


“शुक्र है! मैं तो घढरा ही गया था। मुझे तुमसे मिलना है। आज शाम को मिल सकती हो?", राहुल की आवाज़ से लग रहा था कि उसे कोई ज़रूरी बात करनी थी। उसकी आठाज़ सुनकर दीप्ति आगे कुछ बोल नहीं पा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह हाँ करे या न।




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