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बेपनाह - Bepanah Written - By Vikarm Sharma Sifar | hindi kahani Bhag 11 to 12 - hindishayarih

बेपनाह - Bepanah Written - By Vikarm Sharma Sifar Part 11- 12

बेपनाह - Bepanah Written - By Vikarm Sharma Sifar

बैपनाह भाग-११ परिवर्तन प्रकृति का नियम है। हम चाहें या न चाहें, परिवर्तन तो होकर ही रहता है लेकिन यह परिदर्तन अच्छा है या बुरा, कई बार हमारी मानसिकता पर निर्भर करता है। परिदर्तन के परिणाम सकारात्मक होंगे या नकारात्मक, यह तो तब पता चलता है जब हम इन परिदर्तनों का उपयोग अपनी समझ के हिसाब से किसी दिशा में करते हैं। पानी बहता हुआ ही अच्छा लगता है। हालांकि उफ़नती जवानी और पूरे वेग से बहता हुआ पानी किसी के रोके नहीं रुकते और हर बांध को तोड़ कर ही आगे बढ़ते हैं मगर यह ध्यान देना भी आवश्यक है कि दोनों गन्दगी की ओर न जाएं। अगर ऐसा हो जाए तो दोनों की पवित्रता समाप्त हो जाती है। दोनों के अन्दर एक बदबू बस जाती है जिसे चाह कर भी साफ नहीं किया जा सकता।



दीप्ति रात को बिस्तर पर लेटी हुई उन दोनों घटनाओं को सोच कर के परेशान हुई जा रही थी जो शाम में उसके साथ एक के बाद एक घटी थीं। एक का सम्बन्ध उसके अतीत से था और दूसरी का वर्तमान से। पहली को तो वह चाह कर भी नहीं बदल सकती थी। अगर वो घटना उसके जीदन में न घटी होती तो शायद वह ऐसी न होती जैसी वह आज थी। वह तो अब उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहती थी। लेकिन दूसरी घटना उसके लिए किसी तेज़ बिजली के झटके से कम नहीं थी। प्रिया से उसे ऐसी उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। उसे आश्चर्य था कि प्रिया के जीवन में कोई लड़का था जिसके बारे में उसने बताया तक नहीं था। शायद उसे इसी बात का गुस्सा था।



दूसरी ओर दीप्ति को डर भी था कि प्रिया किसी गलत लड़के की संगत में न फंस गई हो। प्रिया का भोलापन ही उसके लिए खतरनाक हो सकता था। कोई भी उसकी अच्छाई और मासूमियत का फायदा उठा सकता था। उसकी जगह कोई और लड़की होती तो दीप्ति को फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन प्रिया को वह अपनी दोस्त कम और छोटी बहन ज़्यादा मानती थी। उसकी सुरक्षा दीप्ति की ज़िम्मेदारी बनती थी। उसे तकलीफ भी हो रही थी कि प्रिया ने उससे यह बात छुपा कर रखी थी। सबसे पहले तो उसे यह पता करना था कि वो लड़का था कौन? वह स्वयं उस लड़के से मिलकर तसल्ली करना चाहता थी कि क्‍या वो उसके लिए सच में ठीक था। उसने निर्णय किया कि वह प्रिया से सुबह इस बारे में बात करेगी किन्तु इस चिन्ता की हालत में उसे नींद नहीं आ रही थी।



सुबह जल्दी उठकर वह तैयार हो गई और प्रिया के घर की तरफ चल पड़ी। परीक्षा के बाद अभी कॉलेज में क्लासेस शुरू नहीं हुई थी इसलिए दीप्ति को प्रिया से मिलने उसके घर ही जाना पड़ता था।



दीप्ति जब प्रिया के घर पहुँची तो वह कहीं जाने के लिए तैयार हो रही थी। उसकी मम्मी ने बताया कि दह उसके ही घर जाने दाली थी। दीप्ति ने जब प्रिया की ओर देखा तो उसका चेहरा उतरा हुआ था जिससे वह समझ गई कि प्रिया उसी लड़के से मिलने जाने वाली थी लेकिन दीप्ति के आने से उसकी सारी योजना चौपट हो गई थी।



"कहाँ रहती हो आजकल?" दीप्ति ने बनावटी मुस्कान हाँठों पर लाते हुए पूछा। “घर पर ही रहती हूँ यार। बोर हो गई हूँ यहीं पडे-पडे", प्रिया ने आह भरते हुए कहा तो दीप्ति उसके झूठ से मन ही मन जल उठी लेकिन अभी भी उसकी मुस्कान ने होंठों का साथ नहीं छोड़ा था।



"अच्छा? कल शाम कहाँ थी?", दीप्ति ने उसके बेडरूम का दरवाजा अन्दर से बन्द करते हुए पूछा। वह नहीं चाहती थी कि उनका वार्तालाप कोई और सुने। उसकी आँखों में लाली थी और आवाज़ में सख्ती। “दो मैं... मम्मी के साथ शॉपिंग पर गई थी", प्रिया ने नज़र फिराते हुए कहा ताकि उसकी आँखों से उसका झूठ दीप्ति न पढ़ ले।




"अच्छा? कहाँ? कया लिया? दिखाना तो", दीप्ति ने एकदम से सवालों के गोले दागते हुए पूछा तो प्रिया घढरा गई। उसके पास इन सवालों का कोई जवाब ही नहीं था।



"दो... क्कु... कुछ पसन्द ही नहीं आया।" प्रिया से बहाना बनाते नहीं ढन रहा था। उसकी बात गले से अटकती हुई निकली और उसके माथे पर पसीने की ढूँदें साफ झलक रही थी। दीप्ति के हॉठ व्यंग्यात्मक रूप से मुस्कुरा रहे थे। उसके अन्दर का ज्वालामुखी फटने को तैयार था लेकिन उसका लावा प्रिया को पिघलाना नहीं चाहता था।



"शर्म तो नहीं आती न झूठ बोलते हुए?" दीप्ति ने डाँटते हुए पूछा लेकिन वह भूल गई थी कि दह सच में प्रिया की बड़ी बहन नहीं थी बल्कि एक दोस्त ही थी। दोस्ती जितनी मर्ज़ी गहरी हो लेकिन वह सीमाओं में बँधी होती है। यह बात सब रिश्तों में लागू होती है।



प्रिया अब जवाब देने की हालत में नहीं थी। न तो उसे पूरी बात समझ में आ रही थी और न ही दीप्ति का व्यवहार। दीप्ति प्रिया के सामने बिल्कुल साफ बात करती थी। उसके सामने बात को घुमाना पसन्द नहीं था। “चलो सीधी बात करते हैं। वो लड़का कौन था?” इस बार प्रहार सीधा और घातक था जो प्रिया को चारों खाने चित्त करने को पर्याप्त था।



“"कक्‌... कौन लड़का? किसकी बात कर रही हो?" प्रिया के चेहरे का रंग उड़ गया। घबराहट में वह उठ खड़ी हुई और दीप्ति की तरफ पीठ कर ली।



“वही बाइक वाला जिसके पीछे चिपक कर बैठी हुई थी।” दीप्ति उठ कर उसके सामने आ गई। वह उसकी आँखों मे देखना चाहती थी। प्रिया की धड़कन रुक गई और दिमाग सुन्न पड़ गया। उसे अब बस यही याद था कि कल शाम को उस लड़के के साथ जाते हुए उसे लगा था जैसे किसी ने पुकारा हो। पहले तो वह बुरी तरह से चौंक गई थी लेकिन किसी को पास न पाकर और अपना चेहरा छिपा हुआ जानकर वह इसे अभी तक अपना भ्रम ही समझ रही थी। मगर अब वह जान गई थी कि वो आवाज़ दीप्ति की ही थी। अब कुछ नहीं हो सकता था। प्रिया पकड़ी जा चुकी थी।



“दो... मैं...", प्रिया से जवाब देते नहीं बन रहा था। दिमाग उस समय काम कर रहा होता तब कोई बहाना बनाती। फिर भी उसने हिम्मत करके झूठी हँसी हँसते हुए कहा, "ओह! वो? आकाश... मेरा अच्छा दोस्त है और... कम्प्यूटर क्लास में स्स्साथ ही है।" प्रिया की जुबान लड़खड़ा गई और शब्द अटक कर निकले। यह उसका झूठ पकड़ने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण था।



“सच? लेकिन जिस तरह तुम उससे चिपकी हुई थी, वह तो दोस्त से कुछ ज्यादा ही लग रहा था।" दीप्ति इस शब्द-बाण से प्रिया तिलमिला उठी लेकिन अपने अन्दर की ज्वाला को भड़कने से रोकने का अंतिम प्रयास किया। “दह बहुत अच्छा लड़का है", अब प्रिया पहली बार सच का सामना डट कर करती हुई बोली। उसकी आँखों में आशा की चमक थी कि दीप्ति उसकी बात को समझ जाएगी।



“तुमने मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाई? और वह अच्छा है या नहीं यह तुम्हें केसे पता? सब पहले-पहल अच्छा बनने का ही ढोंग करते हैं। तुम्हें अच्छे-बुरे की पहचान तो बिल्कुल नहीं है। बेदकूफ कहीं की", दीप्ति गुस्से में बिफर पड़ी लेकिन उसे नहीं पता था कि उसके ये शब्द उसी के लिए कितने आत्मघाती सिद्ध होंगे। प्रिया यह अपमान सहन न कर सकी।


“ज़रूरी नहीं कि तुम्हें हर बात बताई ही जाए। तुमने मुझ पर हमेशा अपनी मर्ज़ी थोपी है। मेरे भी कुछ अरमान हैं। मैं भी चाहते हूँ कि कोई मुझे प्यार करे।" प्रिया में इतनी हिम्मत पता नहीं कहाँ से आ गई थी जिसे देखकर दीप्ति के तेवर ढीले पड़ गए।


“मेरा दो मतलब....." दीप्ति ने नर्म पड़ते हुए कहा लेकिन प्रिया अपने और अपने प्यार के अपमान से भड़क उसी थी।



"तुम्हारा क्या मतलब था और क्या नहीं, सब अच्छी तरह समझ रही हूँ। ऐसा मत करो, वहाँ मत जाओ, इससे मत मिलो, उससे बात मत करो। हद होती है यार। इतनी पाढन्दी तो मुझ पर मेरे माता-पिता ने कभी नहीं लगाई। तुम जो यह दिखादा करती हो न कि तुम्हें मेरी बहुत फिक्र है, यह सब नाटक करना बन्द करो। तुम्हारी बातों से ईर्ष्या साफ झलकती है।*, प्रिया झल्ला कर एकदम से फट पड़ी। न जाने कब का गुस्सा उसने आज दीप्ति पर उतारा था। उसके मुँह में जो आया वह बोले जा रही थी।


अक्सर हम किसी के सामने सच कहने से डरते हैं लेकिन जब क्रोध अपनी चरम-सीमा तक पहुँचता है तो सच शब्दों के हथगोले बनकर सामने ठाले पर धमाका करते हैं। दीप्ति को अभी भी प्रिया की ईर्ष्या दाली बात समझ नहीं आई थी और वह प्रश्नात्मक चेहरे से उसे देख रही थी। प्रिया भी अब साफ शब्दों में दीप्ति पर वार कर रही थी।


"तुम्हें क्या लगता है कि मुझे दिखाई नहीं देता? तुम राहुल के साथ जो भी करो, वो ठीक और मैं हर बार गलत? हमेशा राहुल के साथ चिपकी रहती हो। यह तो ग़नीमत है कि वह तुम्हें घास नहीं डालता दरना तुम्हारा बस चले तो उसकी गोद में जाकर बैठ जाओ। ठह तुम्हें देखे भी क्यों? कभी हुलिया देखा है तुमने अपना?" पहले सब तो ठीक था लेकिन राहुल का नाम प्रिया की बातों में इस तरह से आना उसके लिए एक सदमा ही था। वह बर्फ के पुतले की तरह जम गई। उसे प्रिया से ऐसी उम्मीद नहीं थी।


“बहुत हुआ प्रिया। अब बर्दाश्त नहीं करूँगी", दीप्ति भी तेज़ स्वर में बोली लेकिन अब दोनों के दिमाग का तापमान बढ़ गया था।


प्रिया पहले ही दीप्ति के आने के कारण सुबह आकाश से ना मिल पाने के दुःख में डूबी हुई थी। इस दजह से और फिर दीप्ति के इस तरह उसके व्यक्तिगत जीदन में दखल से उसे गुस्से में इतना लाल-पीला कर दिया था कि वह क्या-क्या बोल गई उसे स्वयं भी ध्यान न रहा। दीप्ति से यह सब सहन न हुआ और वह पाँव पटकती हुई बाहर चली गई। प्रिया की मम्मी ने दोनों का झगड़ा सुन तो लिया था लेकिन इस झगड़े का कारण नहीं जान पाई थी और प्रिया उन्हें बताने वाली भी नहीं थी।


गुस्से का जवालामुखी जब फूटता है तो उसका लावा आस-पास की हर खूबसूरत चीज़ को निगल जाता है और उसके पीछे सिर्फ तबाही का मंज़र ही बचता है। प्रिया पर उस समय नए-नवेले इश्क़ का फ़ितूर सवार था जिसके चक्कर में उसने दीप्ति को खरी-खोटी सुना दी थी।


प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें इन्सान को अच्छे-बुरे, अपने-पराए, मान-अपमान का होश नहीं रहता किन्तु यह बात स्वयं तक ही रहे तो अच्छा है। जब प्यार का नशा सिर पर चढ़ कर बोलता है तो घमण्ड बन जाता जिसकी आग में जलने दाला और जलाने वाला, दोनों तड़पते तो हैं ही, हर रिश्ता भी भस्म हो जाता है।



अब उसे दीप्ति की ज़रूरत ही कहाँ थी क्योंकि दीप्ति और उसकी सोच अलग-अलग मंज़िल की तरफ जाने दाले दो रास्ते थे। प्रिया को अब इसका बस एक ही नुक्सान नज़र आ रहा है कि अब वह दीप्ति के बहाने आकाश से नहीं मिल सकती थी। दोनों सहेलियों के रिश्ते में एक ऊँची दीवार खड़ी हो गई थी।


दीप्ति भी गुस्से में प्रिया के घर से निकल तो आई थी लेकिन उसे प्रिया से इस बात की उम्मीद नहीं थी। वह प्रिया के व्यवहार पर आश्चर्यचकित थी। वह सारा दिन दोनों में हुए झगड़े और प्रिया के व्यवहार के ढारे में सोचती रही। शाम को जब राहुल की कॉल आई तो उसे समय का आभास हुआ। उसने राहुल को प्रिया और अपने झगड़े के बारे में तो बताया लेकिन उसने उन दोनों के बारे में जो कहा था, दो बताने की हिम्मत न कर सकी।


कुछ दिन बाद राहुल उस लड़के के ढारे में सब कुछ पता कर चुका था। वही हुआ जिसका दीप्ति को डर लगा हुआ था। वह लड़का अच्छा नहीं था। अमीर लड़कियों को प्यार के जाल में फाँसना और उनके जिस्म और दौलत से खेलना उसका शौक था। भोली-भाली लड़कियाँ उसका पसन्दीदा शिकार थीं और सोने का अण्डा देने वाली मुर्गियाँ थीं। भले ही उन्हें बिस्तर तक लाने में उसे बहुत मेहनत करनी पड़ती थी लेकिन उस पर दौलत की बरसात ऐसी ही लड़कियाँ करती थी। शायद वह उन लड़कियों को ढाद में ब्लैकमेल भी करता था। लेकिन शायद इस बार प्रिया को लेकर उसके इरादे कुछ ज़्यादा खतरनाक थे।


राहुल को यह सब ढातें कहाँ से पता चली, यह न तो उसने दीप्ति को बताया और न ही उसने पूछा। वह तो पहले ही चिन्तित थी। दीप्ति को राहुल पर पूरा भरोसा था। दह अब राहुल को देखती थी तो उसे प्रिया की उस दिन दाली बातें याद आ जाती थीं और वह सोचने को मजबूर हो जाती थी कि क्या राहुल के लिए उसका मन अभी भी वही सोच रहा था।


भले ही दीप्ति प्रिया के घर से उस दिन गुस्से में निकल आई थी और अब तक न उसने प्रिया से सम्पर्क किया था और न ही प्रिया ने उससे, परन्तु वह फिर भी उसका भला सोचती थी और उसी के लिए चिन्तित थी।


इन सब बातों से बेखबर प्रिया को दीप्ति से झगड़े का दुःख तो था लेकिन वह उसकी तरफ से लापरवाह हो चुकी थी। अब उसे आकाश के अलादा कुछ भी नहीं सूझता था। दीप्ति जैसी दोस्त की कमी आकाश पूरी कर चुका था। अब उसे किसी और की ज़रूरत भी कहाँ थी? प्यार भले ही अन्धा होता है लेकिन इन्सान प्यार में दिमाग से अन्धा नहीं होना चाहिए। प्रिया आकाश की इतनी दीवानी हो चुकी थी कि यदि उसे कोई उसके प्रेमी की सच्चाई बताता, तो भी दह उसकी बात का भरोसा नहीं करती।


प्रिया एक दोपहर को घर से किसी बहाने निकल कर आकाश के लिए उपहार खरीद रही थी। अगले दिन आकाश का जन्मदिन था। वह उस दिन को यादगार बनाना चाहता थी लेकिन आकाश उपहार में प्रिया को बिस्तर पर लाना चाहता था और इसके लिए उसने लाख मिन्नतें करके उसे मना भी लिया था।


प्रिया एक दोपहर को घर से किसी बहाने निकल कर आकाश के लिए उपहार खरीद रही थी। अगले दिन आकाश का जन्मदिन था। वह उस दिन को यादगार बनाना चाहता थी लेकिन आकाश उपहार में प्रिया को बिस्तर पर लाना चाहता था और इसके लिए उसने लाख मिन्नतें करके उसे मना भी लिया था।


प्रिया अभी उपहार खरीद कर दुकान से बाहर निकल कर सड़क पर पहुँची ही थी कि एक वैन उसके बिल्कुल सामने आकर रुकी। इससे पहले कि दह कुछ समझ पाती, वैन का दरवाज़ा खुला और उसमें से एक आदमी तेज़ी से निकला। उसका मुँह काले कपड़े से ढका हुआ था। उसने आते ही प्रिया के चेहरे पर हाथ रखते हुए अन्दर खींच लिया। अन्दर बैठे एक और नकाबपोश व्यक्ति ने उसे फुर्ती से दबोच लिया और पहला दाला व्यक्ति वैन की ड़ाइदिंग सीट पर बैठ कर उसे भगा ले गया।


सब कुछ इतनी तेज़ी से हुअ० कि प्रिया चिल्‍लाना तो दूर कुछ समझ भी नहीं पाई। उसे सब एक सपने जैसा लग रहा था लेकिन कुछ देर बाद उसने अपने होश सम्भाले तो आभास हुआ कि उसका अपहरण हो चुका था।


बेपनाह भाग-१२

ज़िन्दगी लुका-छुपी के खेल के जैसी है। जब खुद छुपती है तो लाख ढूँढो, पता ही नहीं चलता कि किस नुक्कड़ पर क्या छुपाए बैठी है। बस अचानक से सामने आकर चौंका देती है। किसी के नफ़े-नुक्सान की इसे क्या परवाह? इसीलिए कहते हैं कि कदम बढ़ाते हुए, शब्द बोलते हुए और चाल चलते हुए सोच लेना चाहिए क्योंकि ज़िन्दगी की राह पर यू-टर्न नहीं होता।


“बचाओ!!! बच.....", प्रिया जैसे ही मदद के लिए लोगों को पुकारने लगी तो दैन में बैठे दुबले-पतले नकाबपोश ने एक लम्बा-सा चाकू उसके चेहरे के बिल्कुल पास कर दिया जो प्रिया को पास से और भी बड़ा लगने लगा। उसकी चमक और तीखी धारदार नोक देख कर उसे इसके पैनेपन का अन्दाज़ा हो चुका था। उसकी मदद के लिए लगाई गई गुहार बीच में ही दब गई।



प्रिया को अपनी आँखों के सामने मौत ताण्डव करती हुई नज़र आने लगी। उसे आभास हो चुका था कि अगर उसकी आदाज़ निकली तो यह चाकू उसकी सुराहीदार गर्दन की बारीक नीली नसों को आराम से काट देगा। इसलिए मौत के तेज़ धारदार रूप को देख कर उसकी साँस अटक गई और अपने गले को गीला करते हुए दह धूक गटक कर वहाँ एक कोने में दुढक गई। उसकी आँखों में डर साफ़ नज़र आ रहा था। उसका दिल किया कि वह अभी रो दे लेकिन चाकू अभी भी उसके सामने लहरा रहा था जिसका इतना खौफ था कि उसके आँसू तक सूख गए थे।


ठह यही सोच-सोचकर परेशान हुई जा रही थी कि बदमाश उसके पापा से कितनी फिरौती माँगेंगे? क्या उसके पापा इतने पैसों का प्रबन्ध कर पाएंगे? अगर न कर पाए को क्या ये बदमाश सचमुच उसे मार देंगे? और अगर उन्होंने उसके साथ कुछ किया तो? खौफ की एक लहर प्रिया के जिस्म में ऊपर से नीचे तक दौड़ गई और दह सीट के एकदम किनारे पर सिमट कर बैठ गई और अपनी डरी हुई छोटी-छोटी आँखों से, जो कि काजल लगा होने पर बड़ी दिख रही थी, सब देखने लगी।


प्रिया के हाथ में अभी भी वह उपहार था जो उसने कल आकाश को देना था। इसीलिए तो वह बाज़ार आई थी मगर उसे क्या पता था कि उसके साथ यह होने वाला था। हालाँकि प्रिया थोड़ा बहुत कराटे जानती थी मगर इतना साहस कहाँ से लाती कि हथियारबन्द दुश्मन का निह॒त्थे ही सामना करे। वह बेचारी तो बैठी हुई अपने भाग्य को कोस रही थी कि काश वह दोपहर में बाहर ना निकलती लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका था। इस मुश्किल घड़ी में उसे दीप्ति की याद आ रही


थी। उसे भरोसा था कि ऐसे हालात में दीप्ति उसे बचाने के लिए जान का जोखिम लेने से भी पीछे न हटती। उसका चेहरा सामने आते ही आँसूओं का बाँध पूरी तरह भले ही न टूटा लेकिन हल्की सी नमी झलक आई और वह सुबक पड़ी।



प्रिया को दीप्ति के साथ बिताए दो खूबसूरत दिन याद आने लगे थे। कितनी खुश थी वह उस दोस्ती से। फिर अचानक क्या हो गया जो दीप्ति उससे जलने लागी? प्रिया अभी भी उस झगड़े का कारण दीप्ति को ही मान रही थी। दीप्ति से आकाश और उसका प्यार बर्दाशत नहीं हो रहा था।


दैन अब खुली सड़क पर आ चुकी थी। भीड़-भाड़ से दूर इलाक़ा देख कर उस दुबले-पतले व्यक्ति ने चाकू एक तरफ करते हुए अपने चेहरे से कपड़ा हटा लिया। प्रिया ने जब उसका चेहरा देखा तो लगा जैसे किसी ने उसे लोहे की कुर्सी से बाँध कर उसमें बिजली का करंट छोड़ दिया हो। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा भी हो सकता था। वह उसकी तरफ देखकर कर चिल्लाई, "तुम?"


उसके सामने वह दुबला-पतला व्यक्ति कोई और नहीं दीप्ति ही थी। एक तरफ से प्रिया ने थोड़ी राहत की साँस ली कि उसका बदमाशों ने अपहरण नहीं किया था। मगर अगले ही पल उसे महसूस हुआ कि जितना उसने सोचा था, हालात तो उससे भी मुश्किल थे।


प्रिया को अब लगने लगा था कि उसका अपहरण फिरौती के लिए नहीं हुआ था बल्कि दीप्ति उससे उस दिन का बदला लेना चाहती थी। हो सकता था बदमाश उसके पापा से फिरौती लेकर दाद में उसे छोड़ भी देते लेकिन यहाँ तो अब उसका परिणाम सिर्फ मौत ही थी। उसे नहीं पता था कि दीप्ति अपना बदला लेने के लिए इस हद तक जा सकती थी। तभी दीप्ति से नज़र चुरा कर बाहर की तरफ देखा तो वैन मथुरा रोड पर थी। प्रिया पहले ही हैरान परेशान थी। इतने समय में उन दोनों में कोई बात नहीं हुई। दीप्ति बस उसे घूरे जा रही थी।


प्रिया को समझ नहीं आ रहा था कि दीप्ति उसे इस जगह क्यों लाई थी। उसे तो बस यही समझ आ रहा था कि आज वह पचास किलो की लड़की थोड़ी देर में लाश में बदलने वाली थी। तभी प्रिया को ख्याल आया कि वहाँ समीप ही चिड़ियाघर भी था। उसने बिना कुछ सोचे ही भोलेपन से पूछा, "तुम मुझे चिड़ियाघर ले जा रहे हो?"


उसने इतनी मासूमियत के साथ पूछा कि दीप्ति बहुत मुश्किल से अपने हँसी सम्भालते हुए बोली, "हाँ, तुम्हें पिंजरे में बन्द करना है ताकि तुम उस बन्दर से दूर रहो।" गुस्से में दीप्ति का जवाब सुनकर वैन का ड़ाइवर खिलखिला कर हँस पड़ा। प्रिया का ध्यान अभी तक दीप्ति पर ही था लेकिन जब उसने दूसरे व्यक्ति को देखा तो वह राहुल था। प्रिया भौच्चकी रह गई।


इससे पहले कि प्रिया अभी कुछ कहती या समझती, राहुल ने वैन रोक दी। दे पुराने किले के पास पहुँच चुके थे। दीप्ति ने एक रस्सी से प्रिया के हाथ पीछे की ओर बाँधने चाहे लेकिन राहुल ने उसे मना कर दिया। फिर स्वयं ही उसकी कलाई को मज़बूती से पकड़ लिया। उसकी पकड़ से प्रिया को दर्द तो नहीं हो रहा था लेकिन उससे हाथ छुड़ाना मुश्किल था। प्रिया को इतना भरोसा तो हो गया था कि दीप्ति उसे मारने नहीं दाली थी लेकिन आखिर दे दोनों उसे वहाँ क्यों लाए थे, यह बात समझ नहीं पा रही थी। इस रहस्य को जानने के लिए वह चुपचाप उनके साथ चलने लगी थी।


दीप्ति उन दोनों के पीछे खड़ी थी और उसने प्रिया की पीठ पर सबसे छुपा कर चीज़ टिका रखी थी जिससे प्रिया समझ गई थी कि ज़रूर वह चाकू ही था। अब तो वह आदाज़ भी नहीं निकाल सकती थी। कुछ देर यूँ ही खड़े रहने के बाद राहुल के मोबाइल की घण्टी बजी जिसे सुनकर उसने दीप्ति को एक तरफ चलने का इशारा किया।


दीप्ति और राहुल प्रिया को किले की ओर ना ले जा कर नीचे झील की तरफ बढ़ने लगे जहाँ न के बराबर ही लोग जाते थे। अब प्रिया को सन्देह हो रहा था कि दे दोनों उसे यहाँ मारने ही लाए थे। उसकी धड़कन और तेज हो गई। दीप्ति तो चाहे बदले की आग में अन्धी हो चुकी थी लेकिन उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि राहुल जैसा लड़का भी ऐसा निकलेगा।


वे तीनों दबे पाँद चलते हुए एक जगह रुक गए। राहुल ने प्रिया का हाथ छोड़ दिया था और चुप रहने का इशारा किया। दीप्ति ने भी उससे दूरी बना ली थी। उस वीराने में प्रिया ने देखा कि एक लड़का-लड़की एक-दूसरे को चूम रहे थे। वह यह सब देखकर झेंप गई लेकिन अगले ही पल जब दे दोनों अलग हुए तो मानो प्रिया के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। वह लड़का उसका प्रेमी आकाश था।



प्रिया को चक्कर आने लगे। उसे ऐसा लगा कि उसकी टाँगें जवाब दे रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह चुपके से रोए, उस पर चिल्लाए या वहाँ से भाग जाए। उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े। वह रोना चाहती थी लेकिन राहुल ने उसके मुँह पर हाथ रख कर उसे आवाज़ न निकालने को कहा। वह अब सिसकियाँ लेने लगी थी। दीप्ति ने उसका कन्धा थपथपा कर उसे सांत्वना देने का प्रयास किया और साथ ही इशारे से समझाया कि वह उन दोनों का आगे का वार्तालाप सुने।


"आओ चलें। मैंने होटल में कमरा बुक कर लिया है। आज की रात तुम्हें जी भर कर प्यार टूँगा।" आकाश की बातों में हदस की लार टपकती साफ दिख रही थी।


“नहीं रजत! यह सब शादी से पहले नहीं", उस लड़की ने आकाश के हाथों को अपने शरीर पर रेंगने से रोकते हुए गिड़गिड़ाते हुए कहा।


“जान! ये सब दकियानूसी बातें हैं। पुराने विचारों वाली। आज तो लिव-इन भी एक आम-सी बात है। मैं चाहता हूँ कि हम शादी से पहले एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझ लें। और फिर मैं तुमसे कई बार कह भी चुका हूँ कि हम जल्दी ही शादी कर लेंगे। आज इसे मेरे जन्मदिन का उपहार ही समझ लो।" इतना कह कर आकाश ने उस लड़की को अपने और पास खींच लिया।


"सभी लड़कियों को इसी तरह की बातों से अपने जाल में फँंसाते हो?", प्रिया ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे अपनी तरफ मोड़ा। आकाश हैरान होकर उसकी तरफ घूमा ही था कि एक ज़ोरदार सनसनाता हुआ थप्पड़ उसके गालों पर लहराता हुआ उंगलियों की छाप छोड़ता हुआ निकला।


“यह क्या बदतमीज़ी है?", आकाश गुस्से में लाल होते हुए बोला।

“ये बदतमीज़ी नहीं, जन्मदिन का तोहफा है। आज इसके साथ जन्मदिन मना रहे हो। कल मेरे साथ मनाने की योजना है। कितने जन्मदिन मना चुके हो? शादी भी सबसे करोगे?" प्रिया के तेदर बता रहे थे कि अब दह रुकने वाली नहीं थी। दीप्ति और राहुल अपनी जगह पर खड़े सब देख रहे थे। आखिर उसने प्रिया को इतना बड़ा धोखा जो दिया था। उसका बदला उसे स्वयं लेना था।


“यह सब क्या है रजत? यह क्या कह रही है?" दूसरी लड़की भी भुनभुनाई और उसका गिरिेबान पकड़ कर झकझोरने लगी।


"ओह! तो तुमने इसे अपना नाम रजत बताया है और मुझे आकाश। और कितने नाम हैं तुम्हारे?" प्रिया ने इस बार अपना सैंडल उतार लिया। उसकी भीगी पलकों से काजल बिखर गया था और अब आँखें आग बरसा रही थीं।


“यय... ये तुम क्या बोल रही हो? मैं तत... तुम्हें जानता भी नहीं।" आकाश ने लड़खड़ाती जुबान में कहा लेकिन उसका झूठ पकड़ा जा चुका था। इससे पहले कि वह और कुछ कह पाता, उस लड़की ने उसके बाल नोचने शुरू कर दिए और किसी तरह नीचे गिरा कर उस पर प्रहार करने लगी। प्रिया भी पूरे वेग से उसके मुँह पर सैंडल से दार कर रही थी जिससे उसके मुँह से खून निकलने लगा। अचानक हुए हमले से वह स्तब्ध था।


कुछ सम्भलने के बाद आकाश ने उन दोनों को स्वयं पर भारी पड़ता देख कर पलटवार किया। उसने पहले तो उस लड़की को दो थप्पड़ लगाते हुए दूर धकेला और फिर प्रिया को अकेला पाकर उसका गला दबाने लगा। प्रिया का दम घुटने लगा और आँखें ढाहर आने लगी। तभी आकाश पर पीछे से दीप्ति ने ज़ोरदार प्रहार किया जिससे वह आऔँधे मुँह गिर पड़ा। पहले से ही उसका चेहरा चोटिल था और अब इस प्रहार से वह कराह उठा। उसे तो लगा था कि वहाँ उन तीनों के अलावा कोई और नहीं था लेकिन दीप्ति रणचण्डी बनकर न जाने कहाँ से प्रकट हो गई थी। उसके लिए आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसने दीप्ति को आज तक इससे पहले देखा तक नहीं था। वह समझ नहीं पाया कि आखिर वह क्‍यों इस सब में कूद पड़ी थी। दीप्ति ने उसकी टाँगों के ढीच में लात जमा दी जिससे वह धराशायी हो गया। अब उस पर तीन तरफ से लातों से दार हो रहे थे।


आकाश ने बहुत हिम्मत करके तीनों लड़कियों को धकेला और दीप्ति को पकड़ कर दूर फैंक दिया। हल्की-फुल्की दीप्ति ढलान से लुढ़कती हुई नीचे गिरी और उसका पाँव एक बड़े से पत्थर से टकराया जिससे उसकी चीख निकल गई।


राहुल अब तक इसे लड़कियों का प्रतिशोध समझ कर दूर से ही सब देख रहा था लेकिन जब आकाश ने दीप्ति को चोट पहुँचाई तो वह सह न सका और उस पर चढ़ बैठा। आकाश अभी तक लड़कियों की मार से घायल अवश्य हुआ था लेकिन मुकाबला करने की हिम्मत बाकी थी। राहुल जैसे गठीले बदन वाले के घूँसे सहना उसके लिए असम्भव था। अब उसके पास दो ही रास्ते थे। या तो राहुल के हाथों परलोक सिधार जाए या किसी तरह वहाँ से भागे। उसे दूसरा तरीका ही जमा और बड़ी हिम्मत करके वहाँ से भागने लगा। प्रिया ने उसे पत्थर मारा और वहीं खड़ी होकर चीखने लगी। दूसरी लड़की भी पत्थर लेकर आकाश के पीछे भाग गई। राहुल ने अपनी सौँसों को काबू किया और प्रिया की ओर बढ़ा। प्रिया अब भी चीख रही थी। राहुल ने उसके पकड़ा और सीने से लगा कर चुप कराने लगा। सहारा पाकर वह हिम्मत हार गई और जो आँसू उसने कब से सम्भाल कर रखे थे, उनका बाँध टूट गया। राहुल उसे सीने से लगा चुप करने को कह रहा था जबकि प्रिया का पूरा दर्द आँखों में उमड़ आया था।


प्यार जितना सुकून देता है, उससे ज़्यादा तकलीफ़ बेदफ़ाई देती है। यह एक ऐसा ज़ख्म देती है जो समय के साथ चाहे ठीक हो भी जाए मगर एक बदनुमा निशान हमेशा व्यक्ति की आत्मा पर लगा रहता है। बेवफाई से उठने वाली टीस का अन्दाज़ा सिर्फ़ वही लगा सकता है, जिसके साथ यह हुई हो।


तभी दीप्ति ने कराहते हुए पूरी आत्मीयता से पुकारा "राहुल !!!"

दीप्ति अभी भी ज़मीन पर अपना पाँव पकड़ कर ढैठी हुई थी। राहुल के लिए दह समय बहुत मुश्किल भरा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह प्रिया को हौसला दे या दीप्ति को सम्भाले। लेकिन जैसे ही प्रिया ने उसे देखा, वह अपना दुःख भूल कर उसकी तरफ लपकी।


उन दोनों के बीच सब गिले-शिकवे मिट चुके थे। प्रिया को पछतावा हो रहा था। वह कितनी गलत थी। उसने कितना कुछ

कहा था उस दिन दीप्ति से लेकिन आज उसी ने उसकी जान बचाई थी। परन्तु अभी शोक मनाने का समय नहीं था। उसने दीप्ति को बाहों का सहारा देते हुए उठाना चाहा लेकिन उठा न पाई। तभी राहुल ने प्रयास किया लेकिन उठकर भी दीप्ति

चल नहीं पा रही थी। शायद उसका पैर टूट गया था।

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