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Sapno Ka Saudagar hindi kahaniya


"सपनों का सौदागर"

उसका घर स्कूल के दरवाज़े से ज़रा सा ही दूर था, जब वो सुबह के दक़्त घर में गन्दे हुए बर्तन नल पे बैठ के धोती तो स्कूल जाते हुए बच्चो को जाएदा निहारती और बर्तन कम धोती थी ऐसा उसका रोज़ का नियम था, कुछ बच्चे अपने पापा की ऊँगली पकड़ के स्कूल के दरवाज़े तक जाते कुछ अपने से बड़े भाई-बहनों के साथ, पीछे रंग बिरंगे बैग लदे होते थे, वो रोज़ सुबह बर्तन धोने कम उन्हें देखने जाएदा आया करती थी, रोज़ सुबह उठ कर भैंस को चारा देना बीमार माँ के लिए रोटी बना के देना फिर ढर्तन साफ़ करके वो मैंस को चराने के लिए ले जाती थी, दो स्कूल के आस पास ही भैंस को चराती थी कभी विंडो के पीछे जाकर खड़ी हो जाती, तो कभी अंदर चल रहे गीत को दोहराने लगती, छुट्टी के दक़्त ही वो अपनी भैंस को घर तरफ ले जाती थी क्योंकि उस ठक़्त उसकी सहेलियां जो स्कूल में पड़ती थी वो उसके साथ हुआ करती थीं, एक रोज़ बारिश हो रही थी उस दिन बारिश की वजह से स्कूल की छुट्टी जल्दी हो गयी थी, दो अपने सर पे प्लास्टिक का कट्टा रख कर अपनी भैंस को पकड़ के स्कूल के दरवाज़े के सामने से गुज़र रही थी कि ऐन दकक्‍त पर मैं भी स्कूल के दरवाज़े से तेज़ी की तरफ कार के तरफ बढ़ रहा था कि इतने में उस की भैंस ने कीचड़ में सनी पूंछ मेरे शर्ट पर छाप दी, मैंने आव देखा न ताद उस लड़की को पकड़ कर 2 थप्पड़ मार दिए और बड़बड़ाते हुए कार में जाकर बैठ गया और कार घर ले जाकर खड़ी कर दी पत्नी ने आदत के मुताबिक़ जो सोचा था उस से जाएदा सुना दी थी दसियों सदालों का पिटारा मेरे सर पे दे मारा ( बच्चे तो हो नही, जो शर्ट गन्दी कर के लाये हो, तुम्हे पता है कितनी मुश्किल से साफ़ होगी, वो तो जानदर थी तुम नही बच सकते थे ) उन सब सवालों में एक साल ने मेरे दिमाग पे इतनी तेज़ प्रहार किया कि एक बार को लगा कि आज ज़िन्दगी में जो सीखकर इस मक़ाम पे पहुँचा था सब बेकार हो गया, दूसरे दिन कार की स्पीड थोड़ी जाएदा थी, पता नही क्यों मुझे उस दिन स्कूल जाने की जल्दी थी शायद स्कूल जाने की नही उसके पड़ोस में जो घर था उस घर को देखने की जल्दी थी,



मैं दूर से ही उस घर की तरफ देखता चला आ रहा था बाहार नल पर कोई था, आज पहली ढार देखा था उस घर के तरफ फूस का छप्पर और मिटटी की दीवारों के बीच एक ही दरवाज़ा था, आंगन में थोड़ी सी जगह थी वंही दो भैंस बंधी थी, दिन होते हुए भी घर में अँधेरा सा मालुम होता था, और घर के बाहार जो नल था वंही वो लड़की ढर्तन धो रही थी, मेरे कदम न चाहा कर भी उस झोपडी की तरफ बढ़ने लगे मैं तेज़ी से बढ़ रहे अपने कदमो से अनभिज्ञ था जब नल पे ध्यान दिया तो दो लड़की मुझे देख के खड़ी हो गयी और अपने घर के तरफ आता देख कर डर की वजह से अंदर जाकर छुप गयी, उसकी झोपडी के जितने पास जा रहा था किसी के करहाने की आवाज़ मेरे कानों में घर करती चली जा रही थी कि इतने में मेरा स्कूल में प्रेयर की घण्टी बज गयी और मैं लटका हुआ मुंह लेकर स्कूल में चला आया और दो कराहने की आदाज़ अब भी गूंज रही थी, बच्चों से उस लड़की के ढारे में जानकारी लेकर मैं छुट्टी होने के बाद सीधे बाज़ार गया था ।



आज मैं थोड़ा जल्दी आ गया था स्कूल, मेरे हाथों में 2 जोड़ कपड़ो के पैले और एक स्कूल ढैग, और कुछ किताबें थी, उस घर के तरफ जब बड़ा तो वो लड़की चूल्हे पे बैठी कुछ पका रही थी वो छोटी सी लड़की जिसके हाथों में पँसिल और किताबे होना चाहिए था उस उम्र में उसके हाथ में चिमटा और फूंकनी थी, दो मेरे तरफ देखने लगी एक बार को सहमी लेकिन फिर जब मैं मुस्कृरा कर आगे बढ़ा तो वह भी उठ कर खड़ी हो गयी मैंने दो बैंग और किताबे उसके तरफ बढ़ाई दो उस वक़्त चहक उठी लेकिन अगले ही पल उसकी दो चहक जो आयी थी उसके चेहरे पे वो ग़ायब हो गयी थी, वो मेरा हाँथ पकड़ कर अंदर झोपडी में ले गयी जंहा एक टूटी हुई खटिया पे एक गन्दा सा बिस्तर पड़ा था, और एक अधेड़ उस बिस्तर पे पड़ी कराह रही थी, नज़र मिटटी की ताक में रखी ददाओ की सिसियों पे गयीं जो खाली पड़ी थीं, मैंने देर न करते हुए उसी वक़्त उनसे दवाइयों का पर्चा लिया और अपनी कार की तरफ तेज़ी से दौड़ता हुआ गया स्कूल के प्रेयर की घण्टी भी मेरे कदमो को नही रोक पायी, मैंने पड़ोस के गांव में जो बड़ा मेडिकल था उस से पर्चे पे लिखी दवाई लाकर उस छोटी लड़की को दे दी थी, उस वक़्त की दवा तो मैं अपने हाथ से खिला कर आया था उस दिन से लगातार 7 दिन तक मैंने सुबह की दवाई उस छोटी बच्ची की माँ को अपने हाथों से खिलाई थी, 0-2 दिन में दो अधेड़ उम्र की औरत चलने लगी थी एक महीने बाद जो लड़की भैंस को चराते हुए स्कूल की खिड़की में खड़े होकर गीत गुनगुनाती थी वो अब स्कूल के अंदर खड़े होकर गीत गुनगुनाती है, जो लड़की सुबह के वक़्त बर्तन साफ करते हुए स्कूल जाते हुए बच्चों को देखा करती थी आज दो ख़ुद अपनी माँ का हाथ पकड़ कर स्कूल के दरवाज़े तक जाती थी




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