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umra e daraz maang ke layi thi chaar din hindi shayari

umra e daraz maang ke layi thi chaar din hindi shayari



हिंदुस्तान में मुग़लों के आख़िरी बादशाह थे - बहादुर शाह ज़फ़र। जिन्हें शायरी कहने का भी शौक था कि वह उर्दू अदब के नामों में भी शुमार हो गए। ज़फ़र के कलामों में हर रंग मिलता है, उनके कलाम खूब मशहूर हुए। लेकिन एक ख़ास शेर है जो उनके नाम के साथ जुड़ गया जबकि वह उनका कहा नहीं है। वह शेर कुछ यूं है कि



उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में



असल में इस शेर को सीमाब अकबराबादी ने कहा है। लेकिन क्या कारण रहा कि एक शायर का कहा कलाम किसी दूसरे शायर के नाम के साथ जुड़ गया। दरअसल यह शेर ज़फ़र की ज़िंदगी के बहुत क़रीब महसूस होता है।


प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हार के बाद ज़फ़र के पुत्रों व प्रपोत्रों की हत्या कर दी गयी और उन्हें गिरफ़्तार कर रंगून ले जाया गया। लेकिन उनके मन में हिंदुस्तान बसा हुआ था, वह चाहते थे कि उनकी मौत भी हिंदुस्तान में हो, हालांकि ऐसा हो नहीं सका। वह सोचते रहे कि शायद उन्हें हिंदुस्तान भेजा जाएगा, इसकी उन्हें आरज़ू भी रही और इंतज़ार भी। इसलिए सीमाब का यह शेर उनकी व्यथा को कहता है। इसके अलावा, ज़फ़र ने शेर कहा कि


लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में



कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में



सीमाब के शेर का काफ़िया ज़फर की इन शायरी के काफ़िेये से मिलता है जिससे यह तीनों ही शेर एक ही ग़ज़ल का हिस्सा लगते हैं।


मुहब्बत की गलियों में शायरों के अल्फ़ाज़




हम दिल्ली भी हो आए हैं लाहौर भी घूमे
ऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है
- बशीर बद्र


अजनबी शहरों में तुझ को ढूंढता हूं जिस तरह
इक गली हर शहर में तेरी गली जैसी भी है
- शहज़ाद अहमद


तेरा कूचा तिरा दर तेरी गली काफ़ी है
बे-ठिकानों को ठिकाने की ज़रूरत क्या है
- शाहिद कबीर


सर सलामत लिए लौट आए गली से उस की
यार ने हम को कोई ढंग की ख़िदमत नहीं दी
- फ़रहत एहसास


उस की गली से उठ के मैं आन पड़ा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गई
- जौन एलिया



फिरता रहा गली गली तेरी तलाश में
मालूम तेरे घर का पता क्यूं नहीं हुआ
- जमाल ओवैसी



रूठ गई मंज़िल कैसी
गलियों गलियों भटका हूँ
- आरिफ हसन ख़ान



जब से तू ने ठुकराया
गलियों गलियों भटका हूँ
- आरिफ हसन ख़ान



उस गली में हज़ार ग़म टूटा
आना जाना मगर नहीं छूटा
- मुबारक अज़ीमाबादी



ताल्लुक़ तोड़ कर उस की गली से
कभी मैं जुड़ न पाया ज़िंदगी से
- सिराज फ़ैसल ख़ान

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