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अगर आपको कहानी पढ़ने के शौकीन है तो आज मैं आपके लिए अजीब दास्तान सुलक्षणा अरोड़ा की कहानी लाया हूँ
अजीब दास्तान: भाग 1




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सुलक्षणा अरोड़ा


धारावाहिक कहानी: अजीब दास्तान
‘‘जिस दिन मैं ने सेल्वी को बताया कि मैं ने सारी प्रौपर्टी तुम्हारे नाम कर दी है उसी दिन से उस ने झगड़ा करना शुरू कर दिया था.


अजीब दास्तान: भाग 1
ऐसी परिस्थितियों को झेलतेझेलते लीना भी कठोर बन गई थी. वह अब बातबात में रोने वाली लीना नहीं थी. उस ने वासन की इस प्रतिक्रिया को भी सहज रूप से स्वीकार कर लिया था. उस ने मन में निश्चय किया था कि वह वासन को फिर कभी इस घर में वापस नहीं आने देगी.





कुछ महीनों से लीना महसूस कर रही थी कि उस का पति वासन कुछ बदल सा गया है. पहले, हफ्ते में 2 दिन टूर करता था पर अब हफ्ते में 5 दिन बाहर रहता था. पूछने पर बोलता कि तुम और बच्चे इतना आरामदायक जीवन जी रहे हो, उस के लिए मुझे अधिक काम करना पड़ रहा है. लीना उसे सच मान लेती क्योंकि उसे वासन पर पूरा विश्वास था. टूर से जब वासन वापस आता तो बच्चों के लिए ढेरों उपहार और उस के लिए 2-4 सुंदरसुंदर साडि़यां लाता. उपहार देते समय वासन अपना मनपसंद वाक्य बोलना न भूलता, ‘आई लव माई फैमिली’. ऐसे में वासन पर शक करने की कोई गुुंजाइश ही नहीं थी.

पर आज जब मंगला ने कालेज से वापस घर आ कर पूछा, ‘‘आजकल डैडी का कोई और घर भी है क्या? मेरी एक सहेली ने मुझे आज बताया कि मेरे डैडी कोडमबक्कम में रहते हैं. मैं उस सहेली से लड़ बैठी पर वह अपनी बात की इतनी पक्की थी कि मैं चुप हो गई. अब मैं आप से पूछ रही हूं कि क्या यह सच है?’’ मंगला की इन बातों ने लीना को झकझोर दिया. लीना तो जैसे नींद से जागी हो. लीना के मन में वासन को ले कर कहीं न कहीं ऐसी बात थी पर वह वासन की प्यारभरी बातों में भूल जाती थी. लेकिन आज यह शक सच में बदलता नजर आ रहा था. वह बोली, ‘‘डैडी घर आएंगे तभी सच का पता चलेगा.’’

‘‘मां, इस से पहले ही हम सचाई का पता लगा सकते हैं. उस सहेली का पता मुझे मालूम है. हम वहां चलते हैं,’’ और दोनों मांबेटी कोडमबक्कम जाने के लिए निकल पड़ीं.

वहां जा कर उस बिल्ंिडग में रहने वाले लोगों के नाम वहां लगे बोर्ड पर पढ़े. वासन का नाम वहां नहीं था. वे लौट आईं. 5 दिन बाद जब वासन वापस आया तो परिवार वालों के लिए ढेरों तोहफे लाया. लीना घर में अकेली थी. बच्चे कालेज गए हुए थे. लीना ने आते ही उसे सामने बिठाया और बोली, ‘‘हम लोगों को कब तक गिफ्ट दे कर बहलाओगे? अब मैं सचाई जानना चाहती हूं.’’


‘‘कौन सी सचाई?’’

‘‘अब भी भोले बन रहे हो तुम. क्या जानते नहीं हो कि मैं क्या पूछ रही हूं?’’

‘‘हां, मैं सेल्वी के साथ रहता हूं. हम ने अलग फ्लैट लिया हुआ है. पर यह भी सच है कि मेरा परिवार तो यही है. आई लव माई फैमिली.’’

इतना सुनते ही लीना स्तब्ध रह गई. वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि वासन सेल्वी के साथ रह रहा है सेल्वी उन के सब से करीबी दोस्त राजन की पत्नी थी. वह भी सेल्वी को बहुत अच्छी तरह से जानती थी. लीना जानती थी कि राजन और सेल्वी के बीच बहुत झगड़े होते थे. दोनों की शादी घर वालों ने जबरदस्ती करवाई थी. सेल्वी अपने ही मामा के साथ शादी नहीं करना चाहती थी पर उस की नानी, जो बहुत पैसे वाली थी, अपनी बेटी की बेटी को ही बहू बनाना चाहती थी. उन की जाति में मामा ही पहला उम्मीदवार होता है. बड़ों की जोरजबरदस्ती से विवाह तो हो गया था पर विवाह के बाद सेल्वी का जीवन नारकीय हो गया था. सेल्वी राजन को पति के रूप में कभी स्वीकार नहीं कर पाई. ऐसे में वासन और लीना ही दोनों के झगड़े निबटाते थे. इस दौरान वे दोनों कब करीब आ गए, पता ही नहीं चला.

सेल्वी के पति राजन को खबर थी पर वह अपने गम में शराबी बन चुका था. दिनरात शराब पी कर धुत पड़ा रहता था. ऐसे में वासन और सेल्वी ने एक नया आशियाना बना लिया था. दोनों ने एकसाथ रहना शुरू कर दिया था. पिछले 7 महीने से दोनों एकसाथ एक ही फ्लैट में रह रहे थे और वासन अधिक समय सेल्वी के साथ ही गुजारता था. घर में टूर का बहाना बनाना बहुत आसान था. पर आज जब रहस्य खुल ही गया था तो वासन बोला, ‘‘हां, मैं सेल्वी के साथ रहता हूं. उसे मेरी जरूरत है. वह बहुत दुखी है पर मैं ने तुम्हें और बच्चों को तो किसी भी बात की कमी नहीं होने दी है.’’


‘‘पर अब यह सब नहीं चलेगा. तुम्हें आज ही फैसला लेना होगा कि तुम सेल्वी के साथ रहना चाहते हो या हमारे साथ,’’ लीना क्रोध में बोली.

‘‘एक बार फिर सोच लो.’’

‘‘सोच लिया, मुझे अपने बच्चों का भविष्य देखना है. तुम्हारी इस जीवनशैली का जवान होते बच्चों पर क्या असर पड़ेगा? मैं यह सहन नहीं कर सकती.’’

‘‘तो ठीक है, मैं चला जाता हूं,’’ और वासन अपनी अटैची उठा कर घर से बाहर निकल गया.

लीना जोर से चिल्लाई, ‘‘अब कभी वापस मत लौटना, तुम्हारे लिए यहां जगह नहीं है.’

वासन के जाने के बाद लीना चुप बैठ गई. उस ने स्वयं को कभी भी इतना असहाय नहीं पाया था. वासन को शराब की लत तो बहुत पहले से थी. उस लत को वह किसी प्रकार सहन करती थी. वासन का आधी रात के बाद नशे की हालत में घर लौटना उस ने अपनी आदत में शामिल कर लिया था. पर बच्चों के लिए वह सांताक्लौज जैसा था जो उन्हें उपहारों से लादता रहता था. बच्चों को इस के अलावा वासन से कुछ भी प्राप्त नहीं होता था. उस के पास समय नहीं था बच्चों से बात करने का या उन की कोई समस्या सुलझाने का. वह तो यह भी नहीं जानता था कि बच्चे कौन से कालेज में जाते हैं और क्या पढ़ते हैं. पैसा दे कर ही उस की जिम्मेदारी पूरी हो जाती थी.

ऐसी परिस्थितियों को झेलतेझेलते लीना भी कठोर बन गई थी. वह अब बातबात में रोने वाली लीना नहीं थी. उस ने वासन की इस प्रतिक्रिया को भी सहज रूप से स्वीकार कर लिया था. उस ने मन में निश्चय किया था कि वह वासन को फिर कभी इस घर में वापस नहीं आने देगी. जिस आदमी ने इतनी आसानी से रिश्ता तोड़ लिया हो, ऐसे आदमी के लिए वह न रोएगी और न झुकेगी. मंगला और शुभम ने जब डैडी के लिए पूछा तो लीना ने बिना कुछ भी छिपाए सबकुछ बता दिया. वह बोली, ‘‘अब तुम्हारे डैडी यहां कभी नहीं आएंगे. अब वे अलग घर में सेल्वी आंटी के साथ रहते हैं, अब तुम लोग भी उन का नाम इस घर में मेरे सामने कभी नहीं लोगे. उन के बिना हम अच्छी तरह से जीएंगे. तुम लोग अपनी पढ़ाई करो और मेरा सपना पूरा करो. मंगला को डाक्टर बनना है और शुभम को इंजीनियर बनना है.’’






अजीब दास्तान: भाग 2
वासन फोन कर के शुभम के घर पहुंच गया था, आदतन उपहारों से लदा हुआ. शुभम की पत्नी और उस के बेटे के लिए ढेर सारे उपहार, बहू के लिए हीरे के टौप्स और पोते के लिए महंगे खिलौने.





मां की आवाज की दृढ़ता को सुन कर दोनों बच्चे चुप हो गए थे. वे जानते थे कि मां जो भी बोल रही हैं वह ठीक है. अब उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखना है और मेहनत कर के मां के सपने को पूरा करना है.एक हफ्ते के अंदर ही वासन वापस आया था. उसे दरवाजे पर देख कर लीना ने उसे अंदर आने को नहीं कहा. वह ही बोला, ‘‘बस, 1 मिनट के लिए तुम से बात करनी है, मैं नहीं चाहता कि तुम्हें किसी प्रकार की कोई तकलीफ हो या बच्चों की प ढ़ाई में कोई कमी आए,’’ इतना कह कर उस ने अपनी प्रौपर्टी के सारे कागजात लीना को सौंप दिए, उस ने अपनी सारी प्रौपर्टी लीना और बच्चों के नाम कर दी थी.उस के जाने के बाद लीना ने सारे कागज देखे, 1 एकड़ जमीन और 3 फ्लैट वासन ने परिवार के नाम कर दिए थे. उस ने फौरन अपने एक एडवोकेट चाचा को फोन मिलाया और सब बताया. चाचाजी ने सलाह दी कि वासन को फोन कर के कोर्ट में  बुलाओ और विधिवत सारे कागज लो. लीना ने ऐसा ही किया.

दूसरे दिन वासन को कोर्ट में आने को कहा. लीना के कहे अनुसार ठीक समय पर वासन वहां पर हाजिर था. जज के सामने विधिवत सारी प्रौपर्टी लीना और बच्चों की हो गई.

जज ने वासन से पूछा, ‘‘तुम ने अपने लिए कुछ नहीं रखा?’’

वासन बोला, ‘‘मैं बहुत अच्छा कमाता हूं. मैं और प्रौपर्टी बना लूंगा. लीना को तो बच्चों को पढ़ाना है और उन के विवाह भी करने हैं, इसलिए उसे सब चीज की जरूरत है. ‘आई लव माई फैमिली’.’’ वही डायलौग उस ने कोर्ट में भी दोहरा दिया था. उस से यह पूछने वाला कोई नहीं था कि फैमिली को प्यार करते हो तो उन्हें क्यों छोड़ा?


Sulakshan Arona Ki Kahani
जीवन अपनी रफ्तार से चलने लगा. धीरेधीरे सब रिश्तेदारों और दोस्तों को भी पता लग गया कि वासन अब दूसरी औरत के साथ रहता है पर लीना के साथ तलाक नहीं हुआ है. लोग आ कर लीना को बताने की कोशिश करते कि उन्होंने वासन को एक औरत के साथ देखा पर लीना सभी को चुप करा देती कि उसे वासन के बारे में कुछ भी नहीं सुनना है. उस ने वासन का अध्याय ही अपनी जीवनरूपी पुस्तक से फाड़ कर फेंक दिया था. 7 साल बीत गए. मंगला अब डाक्टर बन चुकी थी और आस्ट्रेलिया में प्रैक्टिस कर रही थी जबकि शुभम इंजीनियर बन अमेरिका में रह रहा था. लीना ने अपना कैटरिंग का काम सफलतापूर्वक चलाया हुआ था. दोनों बच्चों के विवाह में वासन को निमंत्रणकार्ड भेजा गया और वह आया भी. बेटी की शादी में तो उस ने पूरा खर्चा उठाया और कन्यादान भी किया. पर लीना ने पलट कर कभी वासन की खोजखबर नहीं ली. वह आत्मसम्मान से भरी हुई थी.


तब, एक दिन फिर वासन ने दरवाजे की घंटी बजाई. लीना ने दरवाजा खोला तो वासन को खड़े पाया. वह स्वयं ही बोला, ‘‘अंदर आने को नहीं कहोगी?’’

‘‘हां, आ जाओ.’’

अंदर आ कर वासन आराम से सोफे पर बैठ गया था. चारों ओर नजर दौड़ा कर कमरे का मुआयना किया और फिर लीना की ओर देख कर बोला, ‘‘सिर्फ बाल सफेद हुए हैं पर तुम वैसी ही दिखती हो.’’

‘‘काम की बात करो, क्यों आए हो?’’

‘‘मुझे शुभम का फोन नंबर और पता चाहिए. मैं अगले हफ्ते स्पेन जा रहा हूं. वहां से अमेरिका जाऊंगा. उस से मिलने का मन कर रहा है. सुना है उस का बेटा बहुत तेज है.’’

लीना ने फोन नंबर और पता दे दिया. वह उठ कर चला गया. लीना ने तुरंत शुभम को फोन मिलाया और बोली, ‘‘तुम्हारे डैडी आए थे और तुम्हारा फोन नंबर व पता ले गए हैं.’’

‘‘आने दो उन्हें, मैं उन्हें दिखा दूंगा कि उन के बिना भी मैं यहां तक पहुंच सकता हूं. आप चिंता मत करो, मैं उन्हें ठीक से देख लूंगा.’’

वासन फोन कर के शुभम के घर पहुंच गया था, आदतन उपहारों से लदा हुआ. शुभम की पत्नी और उस के बेटे के लिए ढेर सारे उपहार, बहू के लिए हीरे के टौप्स और पोते के लिए महंगे खिलौने. वासन से बातों में कोई भी नहीं जीत सकता था. वह बातें करने में माहिर था. उस ने बहू आभा से बातें कीं और पोते आशु के साथ खूब खेला. जब आभा ने खाना बना कर खिलाया तो उस की तारीफ के पुल बांध दिए. आशु को बहुत प्यार किया. वह 3 दिन उन के घर में रहा और सब के दिलों में अपनी जगह बना कर ही निकला. शुभम भी पिता से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा. उस ने मां को फोन किया, ‘‘डैडी जैसे आज हैं वैसे पहले क्यों नहीं थे?’’


‘‘बेटा, अब तुम बड़े हो गए हो. अच्छेबुरे की पहचान कर सकते हो. तुम जैसा चाहो वैसा संबंध अपने डैडी के साथ रख सकते हो. मैं बीच में नहीं आऊंगी.’’

अमेरिका से लौट कर वासन फिर से लीना के घर गया. वह बोला, ‘‘बहुतबहुत धन्यवाद. मुझे अपनी बहू और पोता बहुत अच्छे लगे. शुभम को भी तुम ने अच्छे संस्कार दिए हैं. वह भी मेरे साथ बहुत अच्छी तरह पेश आया. मैं तो डरतेडरते गया था कि कहीं तुम ने मेरे प्रति उस के मन में जहर न भर दिया हो.’’

‘‘मैं ने कभी भी कोई बात बच्चों के साथ नहीं की, मुझ में इतनी दूरदर्शिता तो थी कि मैं भविष्य के लिए तुम्हारी राह मुश्किल न करूं.’’

‘‘लीना, तुम बहुत अच्छी हो, जब मैं ने जाना चाहा तब भी तुम ने कोई हंगामा खड़ा नहीं किया था.’’

‘‘हंगामा खड़ा कर के मुझे क्या मिलता? केवल जगहंसाई, तुम्हें तो जाना ही था, सब के सामने कमजोर बनना मुझे पसंद नहीं. मुझे अपने बच्चों के लिए मजबूत रहने की जरूरत थी.’’

‘‘सच में तुम बहुत अच्छी हो. अब भी तुम ने नहीं पूछा कि क्या मैं अकेला हूं या कोई और भी साथ में है.’’

‘‘मुझे अब तुम से कोई संबंध नहीं रखना है, तुम किसी के साथ रहो या अकेले, मुझे फर्क नहीं पड़ता है.’’








अजीब दास्तान: भाग 3
बड़ी बहन ने जब आवाज लगाई तो वह वर्तमान में लौट आई. बड़ी बहन से उस का अकेलापन देखा नहीं जा रहा था. वह अकसर उसे सलाह देती, ‘‘अब तो सारी उमर बीत गई




‘‘जिस दिन मैं ने सेल्वी को बताया कि मैं ने सारी प्रौपर्टी तुम्हारे नाम कर दी है उसी दिन से उस ने झगड़ा करना शुरू कर दिया था. वह उस फ्लैट को, जिस में हम रह रहे थे, अपने नाम करवाना चाहती थी पर जिस दिन उसे यह पता चला कि उस फ्लैट में भी मैं ने तुम्हारा नाम साथ में रखा है, उस दिन तो उस का असली रूप सामने आ गया. अब वह मेरे साथ नहीं रहना चाहती. इस बीच, राजन ने भी तलाक के पेपर भेज दिए थे. उसे दोनों तरफ से ही अपनी नैया डूबती नजर आई, इसलिएवह फिर राजन के पास लौट गई थी. आखिर, वह उस का मामा भी था.’’

Ajeeb Dastaan Sulakshan Arona Ki Hindi
इतना कह कर वासन खामोश हो गया था. उस के चेहरे पर गंभीरता आ गई थी पर पर्सनैलिटी में अभी भी स्मार्टनैस बाकी थी. उस का पहनावा, बोलना, चलना बहुत प्रभावशाली था. इन्हीं सब को देख कर तो लीना ने उस से विवाह किया था.

विवाह के बाद ही लीना जान पाई थी कि सब बाहर का दिखावा है. वह एक नंबर का शराबी और चेनस्मोकर था. लीना को शराब और सिगरेट की गंध से भी नफरत थी. उसे शादी के बाद अपनी पहली रात याद आई जब भोर होने पर शराब और सिगरेट की गंध से भभकता हुआ वासन कमरे में आया था. उस के चेहरे के भावों को देख कर बोला था, ‘मेरे पास से बदबू आ रही हो तो बाहर जा कर सो जाओ. यह मेरा कमरा है.’ इतना कहतेकहते वह बिस्तर पर गिर कर सो चुका था. लीना की सारी भावनाएं तहसनहस हो चुकी थीं. उस के बाद तो यह रोजमर्रा की बात हो गई थी. उस ने अपने घर जा कर अपने मांबाबा को यह सब कभी नहीं बताया. वह अपने बूढ़े मांबाबा को दुखी नहीं करना चाहती थी. उस ने यह बात बाहर भी किसी को नहीं बताई. उस में आत्मसम्मान की भावना बहुत अधिक थी. वह औरों की सहानुभूति का पात्र नहीं बनना चाहती थी. उसे अपनी समस्या से खुद ही लड़ना था.


2 माह ऐसे ही बीत गए. वासन ने उसे कभी पत्नी की नजर से नहीं देखा. स्त्रीत्व का इतना घोर अपमान. लीना सहन नहीं कर पाई थी. उस ने ही पत्नीधर्म निभाने की पहल की थी. लीना को अब जीने के लिए कोई तो आधार चाहिए था. वासन जाने किस मिट्टी का बना था. उस ने लीना की इस पहल को भी बिना किसी भावना के स्वीकार कर लिया था. जिस दिन लीना को पता लगा कि वह गर्भवती है उस ने वासन को नकार दिया था. वासन को तो कभी लीना की चिंता थी ही नहीं. उस ने तो अपनी मां को खुश करने के लिए विवाह किया था. उस की मां लीना को गर्भवती जान कर खुश हो गई और उस की देखभाल में जुट गई. समय पर मंगला पैदा हुई.

समय बीतता गया, फिर इसी प्रकार शुभम भी पैदा हुआ. अब दोनों बच्चों की देखभल में लीना ऐसी रमी कि वह वासन की ओर से बिलकुल लापरवा हो गई. वासन के औफिस में जब भी कोई पार्टी होती, वह लीना को ले कर जाता. लीना हमेशा सजधज कर जाती. उस के औफिस में सब लीना से बहुत प्रभावित होते थे. तब वासन को भी बहुत गर्व होता और वह बोलता, ‘आई लव माई फैमिली, आई एम अ फैमिलीमैन.’राजन का घर में आनाजाना भी शुरू हो गया था. दोनों बचपन के दोस्त थे. शादी के बाद सेल्वी का भी आनाजाना शुरू हो गया था. सेल्वी की शादी की दास्तान तो और भी दुखभरी थी. वे लोग बेंगलुरु में रहते थे. औफिस की ओर से वासन हफ्ते में 2 बार बेंगलुरु जाता था. इन सब के बीच कब सेल्वी और वासन के बीच नजदीकियां बढ़ गईं, लीना नहीं जान पाई.

एक फैमिलीमैन ने अपनी फैमिली को छोड़ कर सेल्वी के साथ रहना शुरू कर दिया. दोनों एक फ्लैट में एकसाथ रहते थे. सेल्वी पीने में भी वासन का साथ देती थी. दोनों की खूब जमती थी. सेल्वी की किसी बात ने वासन को सचेत कर दिया था. वासन ने जब सेल्वी को बताया कि उस ने अपना सबकुछ लीना के नाम कर दिया है तो उस के रंग बदलने लगे. और वासन के प्रौपर्टी देने के काम ने स्वयं को उस की नजरों में नीचे नहीं गिरने दिया था, उस ने कभी भी बच्चों को उस के विरुद्ध नहीं किया था. एक दिन फिर से वासन आया. उस की आवाज सुन कर लीना अतीत से वर्तमान में लौट आई. उस ने मंगला का फोन नंबर और पता मांगा. वह आस्ट्रेलिया जाने वाला था. लीना ने उस से कहा, ‘‘मंगला के यहां ध्यान से जाना. वहां दामाद का मामला है. दामाद के मातापिता भी उसी शहर में अलग रहते हैं. वह पूरा परिवार ही डाक्टरों का परिवार है.’’


‘‘तुम चिंता मत करो. मैं जानता हूं कि मुझे किस प्रकार बात करनी है.’’

आस्ट्रेलिया जा कर वासन मंगला के घर गया. दामाद दामोदर और नाती श्रेय से मिला. उन दोनों के ऊपर भी वासन का जादू चल गया. दामाद को तो उस ने अपने ज्ञान से आकर्षित कर लिया था. वासन को आर्थिक मामलों की बहुत जानकारी थी. दामोदर के पास पैसा था पर उसे निवेश करने का ज्ञान नहीं था. ससुर का अनुभव उस को रास आ गया था. नाती को तो उस ने उपहारों से लाद दिया था. उस के साथ बाहर लौन में क्रिकेट भी खेला. घर में अकेला रहने वाला बच्चा अपने साथखेलने वाले नाना को पा कर बोल उठा था, ‘ग्रैंड पा, आप हमारे साथ ही रह जाओ.’

मंगला पिता के पास नहीं आई. उस ने मां को दुख उठाते देखा था. वह इतनी आसानी से सबकुछ नहीं भूल सकती थी.

आस्ट्रेलिया से लौट कर वासन फिर लीना के पास आया. उस ने फिर से लीना को धन्यवाद दिया और बोला, ‘‘तुम बहुत अच्छी मां हो, तुम ने मंगला को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं. बहुतबहुत धन्यवाद.’’

‘‘इस की जरूरत नहीं है. मैं ने अपना कर्तव्य निभाया है. मेरे बच्चे ही मेरा सबकुछ हैं.’’

कुछ देर तक बातचीत करने के बाद वासन वहां से चला गया.

लीना ने फोन पर मंगला को भी वही सलाह दी जो उस ने बेटे शुभम को दी. वे दोनों अपनी समझ के अनुसार अपने पिता के साथ रिश्ता रखने के लिए आजाद थे.

इधर, कुछ दिनों से लीना के मन में यूरोप घूमने की इच्छा बलवती हो उठी थी. बच्चों के पास समय नहीं था और अकेले वह जाना नहीं चाहती थी. दोनों बच्चों ने योजना बनाई और मांपिता के लिए 2 टिकटें भेज दीं. दोनों ने फोन पर मां को बोला, ‘इस से अच्छा मौका और इस से अच्छा गाइड आप को दोबारा नहीं मिलेगा.’


इस बार लीना स्वार्थी बन गई और अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए उस ने वासन के साथ जाने की बात स्वीकार कर ली. जब यह बात वासन को पता चली तो उस ने मना नहीं किया. कुछ ही दिन पश्चात दोनों यूरोप ट्रिप के लिए निकल पड़े. वासन ने तो बहुत बार वहां का चक्कर लगाया हुआ था, इसलिए वह बहुत अच्छा गाइड बना. सब होटलों के रजिस्टरों में वेमिस्टर और मिसेज वासन के नाम से ही जाने गए. बस, लीना ही जानती थी कि वे दोनों केवल जानकार थे इस से अधिक और कुछ नहीं. उस के मन के जख्म इतने गहरे थे कि वे अभी भी रिसते थे.

यूरोप घूम कर जब वे दोनों वापस आए तो अड़ोसपड़ोस व रिश्तेदारों के मन में यह उत्सुकता थी कि क्या वे फिर से साथ रहने लगेंगे? पर ऐसा नहीं हुआ. लीना ने अपनी बहन के साथ ही रहना जारी रखा. हां, अब वासन फोन पर अकसर बात करने लगा.


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आज लीना का जन्मदिन था. वासन ने फोन किया और बोला, ‘‘हैपी बर्थडे माई फेयर लेडी.’’

लीना ने थैंक्यू कह कर फोन रख दिया. फिर से उसे अतीत की बातें याद आने लगीं, शादी के बाद उस का पहला जन्मदिन आया. मां ने सुबह ही वासन से बोला, ‘आज बहू को बाहर ले जाना.’लीना शाम से ही सजधज कर तैयार बैठी थी. वह बाहर किसी होटल में जा कर भोजन करना चाहती थी. शाम रात में ढल गई और रात भोर में पर वासन नहीं आया. जब आया तो एक बार भी लीना की ओर नहीं देखा और न ही कोई बात की. उस  की बेरुखी देख कर वह अंदर तक जल गई थी.

बड़ी बहन ने जब आवाज लगाई तो वह वर्तमान में लौट आई. बड़ी बहन से उस का अकेलापन देखा नहीं जा रहा था. वह अकसर उसे सलाह देती, ‘‘अब तो सारी उमर बीत गई, वह भी बूढ़ा हो गया है. उसे माफ कर दे, उसे अपने पास बुला ले या फिर तू ही उस के पास चली जा.’’ ‘‘नहीं, मैं दोनों ही बातें नहीं कर सकती. उस ने अपने कर्मों से ही अपना जीवन बिगाड़ा है. उसे अपने कर्मों की सजा तो मिलनी ही चाहिए.’’


दोनों के जन्मदिन में केवल 10 दिन का अंतर था. दोनों ही जीवन के 75 साल पूरे कर चुके थे. वासन आज भी सब के सामने यही बोलता, ‘आई एम अ फैमिलीमैन. आई लव माई फैमिली’, पर लीना की नजर में यह स्लोगन मात्र था. वासन बस, रटारटाया नारा दोहरा देता था पर वह ही जानता था कि उस ने जो भी किया हो, किसी भी राह पर भटका हो, उस का परिवार उस के दिमाग में रहा. जबजब बच्चों ने पढ़ाई में अच्छा किया उस की छाती गर्व से फूली. जबजब समाज में लीना की तारीफ हुई वह खुशी से झूम उठा. आज भी उस का परिवार ही उस के लिए सबकुछ है. दोनों की दास्तान भी अजीब दास्तान बन गई. वे दोनों रेल की पटरियों की तरह समानांतर चलते रहे पर कभी मिल नहीं पाए.




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