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Hindi Kahani Nadaniyan Read Full Latest Story नादानियां: भाग 1

Hindi Kahani Nadaniyan Read Full Latest Story नादानियां: भाग 1
Nadaniyan Read Full Latest Story



दिन मालती जब रचना के कमरे में चाय-नास्ता लेकर गई, तो देखा रचना बिछावन पर लेटी छटपटा रही है.  पूछने पर बताया कि उसे मासिक धर्म आया है इसलिए पेट में दर्द हो रहा है.  दर्द के मारे रात भर वह सो भी नहीं पाई. रचना को अक्सर ऐसा होता है.



नादानियां: भाग 1
निखिल की तो नवाबी और बढ़ गई है.  जब देखो,‘रचना चाय बनाओ, रचना पकौड़ी बनाओ.  रचना आज खाने में पिज्जा बनाना. रचना ये, रचना वो. अरे, मैं क्या कोई नौकरनी हूँ इनसब की जो इनके हुक्म बजाती रहूँ.
मिनी सिंह





अपने पीठ पीछे तकिया टिकाये पलंग के किनारे बैठी रचना आराम सेमैगज़ीन पढ़ रही थी.  बड़ा सुकून मिल रहा था उसे अपनी मन-पसंद मैगज़ीन पढ़ते हुए.   वरना, तो रोज उसे कहाँ समय मिल पाता था .  सुबह हड़बड़ी में ऑफिस निकल जाती थी और फिर रात के 8 बजे ही घर वापस आती थी.  थक कर इतना चूर हो जाती कि फिर कहाँ उसे कुछ पढ़ने लिखने का मन  होता था.  एक संडे की छुट्टी में घर-बाहर के ही इतने काम होते थे कि मैगज़ीन पढ़ना तो दूर, झाँकने तक का समय नहीं मिल पाता था उसे.  अखबार वाला हर महीने का मैगज़ीन दे जरूर जाता था, पर वह उलट-पुलट कर देख भर लेती थी.  लेकिन अब जब इस लॉकडाउन मेंउसे घर में रहने का मौका मिला है,तोवह सारे मैगज़ीन पढ़ लेना चाहती है.

लेकिन निखिल उसे पढ़ने दे तब न .  कब उसे परेशान किए जा रहा है.  कुछ-कुछ लिख कर कागज के बॉल बना-बना कर उस पर फेंक रहा है, ताकि वह डिस्टर्ब हो जाए और पढे ही न. इस बार फिर निखिल ने उस पर कागज का बॉल बनाकर फेंका तो वह तिलमिला उठी.

“निखिल………..चीखते हुए रचना बोली, “क्या है तुम्हें ?क्यों मुझे परेशान कर रहे हो ?एक और बॉल फेंका न तो बताती हूँ. “ लेकिन निखिल को तो आज बदमाशी सूझी थी, सो उसने फिर रचना के ऊपर कागज का बॉल फेंका. “प्लीज, निखिल, पढ़ने दो न मुझे.  वैसे भी मुझे कुछ पढ़ने-लिखने का समय नहीं मिल पाता है और अभी मिला है तो तुम मुझे परेशान कर रहे हो.  मैं तो कहती हूँ तुम भी पढ़ने की आदत बना लो, अच्छा टाइम पास हो जाएगा और कुछ सीखने को भी मिलगे.  ये लो”  एक मैगज़ीन उसकी तरफ बढ़ते हुए रचना बोली.

लेकिन निखिल कहने लगा, “हुम्म……… ये औरतों वाली मैगज़ीन मैं नहीं पढ़ता.  होते ही क्या हैं इसमें? सिर्फ औरतों की बातें. “


“औरतों वाली? अरे, इसमें तुम पुरुषों के लिए भी बहुत कुछ होता है, पढ़ कर देखों तो”  रचना के जिद करने पर निखिल ने मैगज़ीन ले तो लिया, पर उलट-पुलट कर यह बोलकर रख दिया कि उसे कुछ समझ नहीं आता और वैसे भी पढ़ना उसे कुछ खास पसंद नहीं है.  “हाँ,सही बात है. तुम्हें तो सिर्फ मोबाइल चलाना और फालतू के वीडियो देखना अच्छा लगता है, है न ?देखती नहीं हूँ क्या कैसे दिन भर मोबाइल में आँख गड़ाए रहते हो. फालतू के वीडियो देख-देखकर ‘ही ही ही’ करते रहते हो . मोबाइल एडिक्ट हो गए हो तुम, मोबाइल एडिक्ट. “

“और तुम किताबी क्रीड़ा नहीं बन गई हो. जब देखों कोई न कोई किताब लेकर बैठ जाती हो.  कब से बोल रहा हूँ चाय बनाओ, पर  तुम हो की, तुम्हें तो पढ़ने से ही फुर्सत नहीं मिल रही है.  अरे, है क्या इस किताब में, कोई ख़जाना?” खीजते हुए निखिल बोला, तो तुनक कर रचना बोल पड़ी.

“हाँ, ख़जाना ही समझा लो, पर तुम जैसे उल्लू को यह बात समझा नहीं आएगी.  पढ़ना मुझे कोई खास पसंद नहीं है………..यही कहा था न तुमने ?” मुंह चिढ़ाते हुए रचना बोली, तो निखिल गुर्राया ! “ऐसे घूरो मत, चाय पीनी है, जाकर खुद बना लो, मैं नहीं बनाऊँगी समझे ?” बोलकर वह फिर किताब में घुस गई.  सोच लिया उसने, वह बिल्कुल चाय बनाने नहीं उठेगी. ‘अरे, सुबह से काम कर के अभी तो बैठी हूँ, फिर भी किसी को चैन नहीं है.  हर समय कुछ न कुछ  चाहिए हीं इन्हें.   अच्छा था जो ऑफिस जाती थी.  भले थक जाती थी, पर इतना काम तो नहीं करना पड़ता था घर का.  सोचा था लॉकडाउन में खूब सोऊंगी, पढ़ूँगी.  लेकिन यहाँ तो घर कामों से ही फुरसत नहीं मुझे.  सब घर में हैं, तो सब को कुछ न कुछ चाहिए ही होता है और ये निखिल की तो नवाबी और बढ़ गई है.  जब देखो,‘रचना चाय बनाओ, रचना पकौड़ी बनाओ.  रचना आज खाने में पिज्जा बनाना. रचना ये, रचना वो. अरे, मैं क्या कोई नौकरनी हूँ इनसब की जो इनके हुक्म बजाती रहूँ ?’अपने मन में ही सोच रचना भुनभुना उठी और किताबों में फिर से आँख गड़ा दिया कि तभी उसके सिर पर एक कागज का बॉल आकर गिरा.  देखा तो निखिल शरारती अंदाज में मुस्कुरा रहा था.


“निखिल………मैं ने कहा न मैं कोई चाय-वाय नहीं बनाने वाली. तुम जीतने भी तंग कर लो मुझे मैं नहीं उठने वाली यहाँ से . तुम जाओ खुद ही चाय बना लो. “

“मुझसे चाय अच्छी नहींबनती रचना, नहीं तो क्या बना नहीं लेता” बहाने बनाते हुए निखिल बोला, “अच्छा एक काम करते हैं.  चलो, हम लूडो खेलते हैं.  जो हारा वह चाय पकौड़े बनाएगा.  बोलो, मंजूर ?”

“हुंम………..कुछ सोचते हुए रचना बोली, “अच्छा चलो मंजूर, पर शर्त याद रखना ? और हाँ, जीतूगी तो मैं ही” हँसते हुए रचना ने किताब बंद की और शुरू हो गया लूडो के खेल.

जैसे-जैसे खेल बढ़ता जा रहा था रचना जीत की तरफ बढ़ती जा रही थी. वहीं निखिल को अपनी हार साफ नजर आने लगी थी. ‘कहीं हार गया तो चाय-पकौड़े बनाने पड़ेंगे.  रचना खिल्ली उड़ाएगी सो अलग’  यह सोचकर निखिल बेईमानी पर उतर आया और जीतने के लिए उसने बेईमानी शुरू कर दी, जिससे खेल में वह आगे और रचना पीछे जाने लगी.  निखिल को बेईमानी करते देख रचना तिलमिला उठी और उसने खेल पलट दिया.

खेल पलटते देख निखिल आगबबूला हो उठा ! क्योंकि वह  खेल जीतने ही वाला था, मगर रचना ने उस पर पानी फेर दिया.  “क्यों……..क्यों खेल बिगाड़ा तुमने?” लगभग चीख पड़ा निखिल.

“क्योंकि……….क्योंकि तुम बेईमानी कर रहे थे. “ बोलते हुए रचना ने निखिल को ठेल दिया और लूडो के भी दो टुकड़े कर डाले.

“क्या की बेईमानी मैंने, हूं?” कह कर निखिल ने भी रचना को एक धक्का दे दिया.  फिर क्या था तिलमिलाई सी उसने भी उसे ऐसा कस कर धक्का मारा की वह जाकर दूर लुढ़क गया.  एक छोटी सी बात पर दोनों के बीच लड़ाई शुरू हुई तो दोनों ‘तू तू मैं मैं’ पर उतर आएं.  बेटे-बहू के कमरे से हल्ला-गुल्ला की आवाजें सुनकर जब मालती दौड़ी आई तो देखादोनों जुद्दम-जुद्दी लड़ें जा रहे थे.  कोई किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं. मालती ने पूछा भी‘अरे, क्या हुआ, क्यों लड़ रहे हो तुम दोनों इस तरह से?’मगर उन्हेंलड़ने से फुर्सत मिले तब तो मालती की बात सुनें. हार कर मालती वहाँ से यह सोचकर खिसक गई कि यह पति-पत्नी के बीच का मामला है,अपने ही सुलझ लेंगे.   मगर उनकी लड़ाई तो बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ती चली गई जैसे राई का पहाड़.  दोनों एक-दूसरे पर उंगली उठाने लगें, एक-दुसरे की गलतियाँ गिनवाने लगें, एकदूसरे के परिवार को कोसने लगें और जाने वे एकदूसरे पर क्या-क्या अनाप-शनाप दोषारोपण लगाने लगें थे.  लग रहा था दोनों एक दूसरे की जान ही ले लेंगे.  अगर बीच में मालती ना आती, तो शायद कोई अनहोनी जरूर ही जाती आज.


“अरे, क्या हो गया तुम दोनों को…………..पागल हो गए हो क्या?” बेटे बहू की हरकतों ने मालती को चिल्लाने पर मजबूर कर दिया. “क्यों इस तरह से आपस में लड़ रहे हो बच्चे की तरह? और बहू,ये तुम्हारा मायका नहीं, ससुराल है, समझा नहीं आता ? एक बच्चे की तरह लूडो खेलती हो और फिर झगड़ा करते शर्म नहीं आती? क्या यही संस्कार दिये हैं तुम्हारे माँ-बाप ने ? क्या अच्छे घरों की बहू-बेटियाँ ऐसे करती हैं ? आसपड़ोस सुनेंगे तो क्या कहेंगे ?” सास की बात सुनकर  रचना की त्योरियों पर और बल पड़ गये .  झुंझुलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी.  दहके भी क्यों न, कोई भी लड़की अपने लिए कुछ भी बर्दाश्त कर लेगी, मगर कोई उसके माँबाप के बारे में कुछ कहें, तो कोई कैसे सहन कर सकता है.





नादानियां: भाग 2
मालती रचना को समझा-बूझकर उसका गुस्सा शांत करना चाह रही थी.  निखिल से वह माफी मांगवाने को भी तैयार थी.   मगर रचना कुछ सुने तब तो. मालती को यह सोचकर धकधकी उठ रही थी




“अच्छा…… तो आपको अपने बेटे की गलती नहीं दिखी, मगर मेरी दिख गई, क्योंकि मैं पराए घर की हूँ इसलिए ? और संस्कार आपने कैसे दिये हैं अपने बेटे को ? बेईमानी करने की?”रचना की बात पर मालती का मुंह खुला का खुला रह गया ! रचना अपनी सास का हमेशा से आदर करती आई थी.  लेकिन आज उसके ऐसे तेवर देख वह आवक रह गई ! मालती भी अपनी बहू को बेटी से कम प्यार नहीं करती थी. वह तो गुस्से से उसके मुंह अपशब्द निकल गये, वरना,कभी वह उसे कुछ उल्टा-सीधा नहीं बोलती थी. हालांकि, अपने बेटे को भी उसने डांटा, फिर भी रचना को लग रहा है कि मालती ने उसके साथ पक्षपात किया. बेटे की लगती को तो नजरंदाज कर दिया और सारी गलती बहू के सिर मढ़ दी.

रचना को बुरा मानते देख मालती ने उसे समझना चाहा कि वह इस घर की बहू है.  घर की इज्जत है, अगर वही इस तरह से व्यवहार करेगी, तो लोग क्या कहेंगे ? मगर रचना कहने लगी कि वह उसे समझाने के बजाय अपने बेटे को समझाये, तो ज्यादा बेहतर होगा. रचना को अपनी माँ से बहस लगाते देख, निखिल का पारा और चढ़ गया.

बोला,“देखो, देखो माँ, कैसे आपसे भी मुंह लगा रही है ये .  धक्का दिया इसने पहले मुझे .  छोटी सी बात को इतना बड़ा बना दिया और घर में  बवाल मचा दिया. और तेवर तो देखों इसके ? खबरदार जो मेरी माँ से बत्तमीजी की तो! “ उंगली दिखाते हुए निखिल बोला, तो कस कर उसने उसकी उंगली मरोड़ दी और बोली।

“खबरदार अपने पास रखों, समझे और आगे से उंगली-टिंगली मत दिखाना मुझे, नहीं तो तोड़ दूँगी।  और तुमने, तुमने क्या किया ? एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी……..तुमने धक्का नहीं दिया मुझे, बल्कि ज्यादा ज़ोर से दिया और मुझे चोट लगते-लगते बची? और मेरे माँबाप पर क्यों गए ? मेरे माँबाप क्या हैं मेरे लिए और उन्होंने मुझे कैसे संस्कार दिये हैं, यह मुझे तुम सब से जानने की जरूरत नहीं है, समझे ?” अपनी सास की तरफ देखते हुए रचना बोली.  “और एक बात जान लो, मैं कोई तुम्हारी दासी-पोसी नहीं हूँ.  तुम्हारे टुकड़ों पर नहीं पलती हूँ जो तुम्हारी धौंस सहूँगी .  मैं खुद इतना कमा लेती हूँ की मुझे तुम्हारे पैसों की कोई जरूरत नहीं है.  तुम्हारे पैसों की जरूरत होगी तुम्हारे परिवार को” रचना की बात पर निखिल तिलमिला उठा और कस कर एक तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया. एक तो वैसे ही उसने उसकी उंगली मरोड़ दी तो दर्द हो रहा था, ऊपर से बकवास पर बकवास किए जा रही थी तो कितना सहता वो? लगा दिया एक तमाचा।


लेकिन यह बात रचना के बर्दाश्त के बाहर हो गया. क्रोध के मारे उसका मुंह लाल हो गया।  उसने भी जो सामान सामने पड़ा था, उठाकर निखिल की ओर ज़ोर से फेंका। निखिल ने हाथ आगे कर रोक लिया, वरना उसका सिर तो फटना ही था आज.  मालती को समझ नहीं आ रहा था कि करें ? कैसे रोकें इनके झगड़े को ?दोनों के झगड़े की आवाजें सुन आसपड़ोस के लोग भी कान लगा कर सुनने लगें.  अब लोगों की तो आदत ही होती मज़ा लेने की.  किसी के घर झगड़ा हुआ नहीं, पहुँच जाते हैं तमाशा देखने.  मालती जितना दोनों को शांत करने का प्रयास कर रही थी,  मामला उतना ही बिगड़ता जा रहा था.  रचना कहने लगी कि वह निखिल के खिलाफ हिंसा का केस करेगी. बतलाएगि पुलिस को की कैसे उसके पति ने उसे मारा-पीटा, उस पर जुल्म किया.  और निखिल कह रहा था कि कौन डरता है पुलिस से.  बुलाओ पुलिस को.  दिखाऊँगा कि कैसे रचना ने उसे अपने नाखून से नोच डाला है.  धक्का दिया और सिर भी फोड़ने जा रही थी,यह भी वह पुलिस को बताएगा. ‘अरे, पुरुष एक थप्पड़ भी चला दे, तो हिंसा हो जाता है और औरत नोच-खसोट ले,पति का सिर फोड़ दे, तो कुछ नहीं?’ दोनों के चिल्लम-चिल्ली से लग रहा था मालती के दोनों कान फट कर उड़ जाएंगे. उसने अपने दोनों हाथ से कान दबा लिए. लेकिन आवाज फिर भी रुक नहीं रहे थे.

गुस्से से फनफनाई रचना 112 नंबर पर कॉल करने ही जा रही थी कि मालती ने उसके हाथ से फोन छीन लिया और घर की इज्जत की दुहाई देने लगी. मालती के हाथ जोड़ने पर रुकी थी वह, मगर उसका फैसला बदला नहीं था. उसका गुस्सा तो अब भी सातवें आसमान पर विराजमान था.  कहने लगी,‘लॉकडाउन टूटते ही वह निखिल पर हिंसा का केस करेगी.  जेल भिजवा कर रहेगी उसे. फोन कर वह अपने मायके वालों को सब कुछ बताना चाहती थी, लेकिन इस लॉकडाउन में वह कर भी क्या सकते थे, सिवाय परेशान होने के ? इसलिए उन्हें न बताना ही उसे सही लगा.


क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भाँति कांपती हुए वह अपने कमरे में जाकर अंदर से दरवाजा लगा लिया। क्योंकि वह निखिल का मुंह भी नहीं देखना चाहती थी.  मजबूरन निखिल को सोफ़े पर सोना पड़ा, पर एक तो गर्मी ऊपर से मच्छर उसे सोने भी नहीं दे रहा था.  काट-काट कर उसका बुरा हाल किए हुए था.  गुस्सा आ रहा था उसे खुद पर, की क्यों उसने ऐसी लड़की को अपनी जीवन संगनी बनाया जो बातबात पर उससे लड़ती-झगड़ती रहती है ?‘नहीं, अब मैं भी नहीं रह सकता ऐसे तुनकमिजाजी लकड़ी के साथ.  छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनकर घर मे हँगामा कर देती है.  हाँ, मैंने बेईमानी की, तो क्या हो गया ? बचपन में भी करता था तो क्या हो गया ? बड़ा पुलिस की धमकी दे रही है ! पुलिस से वे लोग डरते हैं जो गलत करते हैं और मैंने कोई गलती नहीं की, यह मैं जनाता हूँ . ?देखो, उसके नाखून के निशान अभी हैं मेरे हाथ पर, तो क्या यह हिंसा नहीं हुआ ? कितना खून निकल आया था मेरा, काश फोटो खींच लेता, तो पुलिस को दिखाता, फिर देखता पुलिस किसे जेल भेजती है.  वैसे, जेल भी चला जाऊँ तो ठीक, कम से कम इस औरत से दूर तो रहूँगा’अपने आप में ही सोचते-सोचते निखिल की आँखें जाने कब लग गई.

उधर मालती के पैरों के नीचे से जमीन सरकने लगी थी. सोच कर ही वह कांप रही थीकि अगर बहू ने पुलिस में कम्पलेन कर दिया तो क्या होगा ?माँ-बेटे को जेल तो होंगी हीं, सालों की कमाई इज्जत भीमिट्टी में मिल जाएगी. लोग हसेंगे सो अलग.

किसी तरह मालती रचना को समझा-बूझकर उसका गुस्सा शांत करना चाह रही थी.  निखिल से वह माफी मांगवाने को भी तैयार थी.   मगर रचना कुछ सुने तब तो. मालती को यह सोचकर धकधकी उठ रही थी कि कल अगर उसके दरवाजे पर पुलिस आ गई और  सारी बात मुहल्ले की औरतों को के सामने आ गई, तो क्या होगा ?‘वह तो खुश ही होंगी . उनकी आत्मा तो कब से हमारे घर के बारे में कुछ ऐसा-वैसा सुनने को बेचैन है.  इस मुहल्ले में कुछ ऐसी कुटिल महिला भी हैं, जो मुझसे, मेरी बहू से जलती हैं, क्योंकि सुंदरता के साथ मेरी बहू कमाऊ जो है. मुझे मान-सम्मान भी देती है, जो उनकी बहुए नहीं देती हैं उन्हें, तो ईर्ष्या तो होगी ही न ? मेरी बहू गाड़ी से ऑफिस आती जाती है, तो कैसे सब देख जल-भून जाती हैं.  जानती हूँ हाल-चाल पूछने के बहाने आकर मेरा दिल और जलाएगी.  इन दुष्टटिनियों को हमारी बेबसी पर ताली बजने का मौका मिल जाएगा.  आखिर जलती जो हैं वे लोग मुझसे’सोचते-सोचते जाने कब मालती की भी आँखें लग गई.


इधर रचना का गुस्सा अभी भी उफान पर था.  गुस्से में एक तो खाया नहीं जाता है और खाली पेट गुस्सा और बढ़ता जाता है.  कई बार मालती खाने की थाली ले कर आई भी, पर रचना ने उसे दरवाजे से ही लौटा दिया था, यह बोलकर कि उसे भूख नहीं है.  जब भूख लगेगी, खुद ही खा लेगी.

रचना और निखिल एक कंपनी में साथ काम करते थे. दोस्ती के बाद दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए और फिर धीरे-धीरे उनका प्यार परवान चढ़ने लगा.  जब उनका एक दिन भी न मिलना उन्हें बेचैन करने लगा, तो दोनों ने शादी करने का फैसला ले लिया.  रचना के माता-पिता को तो कोई समस्या नहीं थी इस रिश्ते से, मगर मालती अपने एकलौते बेटे का विवाह किसी गैर जातिय लड़की से नहीं करना चाहती थी.  मगर बेटे के प्यार के आगे वह झुक गई और जब वह रचना से मिली, तो उसके अच्छे व्यवहार ने उसे और पिघला दिया.  जरा कड़क स्वभाव की रचना दिल की कितनी अच्छी है यह बात शादी के कुछ दिनों बाद ही मालती को मालूम पड़ गया.




नादानियां: भाग 3
मालती जब रचना के कमरे में चाय-नास्ता लेकर गई, तो देखा रचना बिछावन पर लेटी छटपटा रही है.  पूछने पर बताया कि उसे मासिक धर्म आया है इसलिए पेट में दर्द हो रहा है.




यह बात निखिल भी जानता था कि रचना ‘शॉर्ट-टेंपर लड़की है.  उसे जल्दी गुस्सा आ जाता है.  लेकिन उसकी यही आदत शादी के बाद निखिल को बुरी लगने लगी थी.  उनके बीच बातचीत बंद हुए आज चार दिन हो चुके थे.  घर अजीब सा लगने लगा था.  एक तो लॉकडाउन में वैसे ही सब उदास-उदास लग रह था, ऊपर से घर का ऐसा माहौल, मालती को और बिचलित कर रहा था.  वह माहौल को हल्का करने की कोशिश कर रही थी, पर कोई झुकने को तैयार नहीं था.  माँ के समझाने पर, अगर निखिल रचना से बात करने की कोशिश भी करता, तो वह अपना मुंह दूसरी तरफ फेर लेती और कहती कि गलती हो गई उससे निखिल से शादी करने का फैसला लेकर.  और निखिल का गुस्सा फिर बढ़ जाता.  बात सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा था.

उस दिन मालती जब रचना के कमरे में चाय-नास्ता लेकर गई, तो देखा रचना बिछावन पर लेटी छटपटा रही है.  पूछने पर बताया कि उसे मासिक धर्म आया है इसलिए पेट में दर्द हो रहा है.  दर्द के मारे रात भर वह सो भी नहीं पाई. रचना को अक्सर ऐसा होता है, इसलिए वह पेट दर्द की दवाई रखती है, पर दवाई खत्म हो गई है और लॉकडाउन में लाए कैसे?  निखिल को जब पता चला कि पेट दर्द के कारण रचना रात भर सो नहीं पायी, तो वह भी छटपटा उठा.  रचना को लेकर उसके मन में जो गुस्सा था, वह पल भर में काफ़ुर हो गया.  तुरंत निखिल दवाई लाने घर से निकल गया. यह भी नहीं सोचा उसने कि पुलिस उसे रोकेगी या डंडे बरसाएगी.  इधर मालती रचना के सिर अपने गोद में लेकर सहलाने लगी ताकि उसे नींद आ जाए.  मालती के प्यार भरे स्पर्श से कुछ ही पलों में रचना की आँखें लग गई.  कुछ घंटे बाद जब उसकी आँखें खुली तो देखा मालती उसके सिहरने बैठी है. और निखिल बाहर से ही ताक-झांक कर रहा है।


“माँ……….आ आप……

“कुछ नहीं बेटा, अब तुम्हारा पेट दर्द कैसा है ? देखो निखिल दवाई भी ले आया जाकर.  लेकिन पहले कुछ खा लो, फिर दवाई खाना” बोलकर मालती एक माँ की तरह ‘कौर कौर’ कर उसे खिलाने लगी.  दवाई लेकर रचना सोने की फिर कोशिश करने लगी, पर नींद नहीं आ रही थी.  उसके आँखों से टप-टप कर आँसू बहे जा रहे थे.  उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था कि अगर वह चाहती तो बात खत्म हो सकती थी, पर वह जान-बूझकर रबर की तरह बात को खींचती चली गई.

माँ समान अपनी सास को भी उसने कितना कुछ सुना दिया.  यहाँ तक की पुलिस में जाने की भी धमकी दे दी.  यह भी नहीं सोचा कि कभी उसने बहू-बेटी में फर्क नहीं किया, फिर भी उन पर पक्षपात का इल्जाम लगा दिया. ‘अरे, वो तो बड़ी हैं, पर मैं छोटी होकर उनके संस्कार पर उंगली उठाकर क्या सही किया ? नहीं मुझे माँ जी से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी.  कितनी पागल थी मैं जो पुलिस को फोन करने जा रही थी!  अपने घर की इज्जत को चौराहे पर नीलाम करने जा रही थी ? ऐसा कैसे करने जा रही थी मैं ! खुद मेरे ही माँ-पापा मेरी इस गलती के लिए कभी माफ नहीं करते मुझे. और किस पति-पत्नी के बीच झगड़ें नहीं होते ? इसका मतलब यह तो नहीं कि पुलिस को फोन का हिंसा का केस कर दें ?और गलती मेरी भी तो कम नहीं थी . मैंने भी तो निखिल को कितना कुछ सुना दिया और यहाँ तक की……….. यहाँ तक की उसे अपने लंबे नाखून से भी नोच डाला.  कितना खून बहा देखा मैंने, फिर भी मुझे उस पर दया नहीं आई. अगर वह अपना हाथ आगे न करता, तो उसका सिर तो फूट ही गया होता, फिर सी लॉकडाउन में………………. हाय……. क्या हो गया था मुझे ? कौन सा भूत सवार हो गया था मेरे सिर पर ?”अपने गुस्से पर गुस्सा आने लगा था रचना को अब. “और वह जरा सी मेरे पेट दर्द के लिए दवा लाने दौड़ पड़ा, वह भी इस लॉकडाउन में?  ये मेरी नादानियाँ नहीं तो और क्या है.


‘नहीं, मुझे जाकर उनसे अपनी गलती की माफी मंगनी चाहिए’ अपने मन में ही सोच जैसे ही रचना कमरे से बाहर आई,देखा, एक कोने में बैठी मालती सुबक रही थी. वह निखल को कह रही थी कि गलती उसकी ही है उसने ही रचना को गुस्सा दिलाया तभी वह गरम हो गई होगी.  वरना, दिल की बुरी नहीं है वह.  और अगर ऐसे ही करना है, तो वह कहीं चली जाएगी, नहीं रहेगी इस घर में . तभी मालती की नजर रचना पर पड़ी तो हाथ जोड़ कर वह कहने लगी, “बहू, मैं क्षमा चाहती हूँ जो तुम्हें कुछ कह दिया तो” बोलते हुए जब मालती के आँखों से आँसू टपके तो रचना का रहा-सहा गुस्सा भी उन आंसुओं में बह गया.  अपनी सास का हाथ अपने हाथों में लेकर वह खुद भी रोने लगी.  सास बहू दोनों रोने लगी.  मन का मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है.




निखिल को भीअब अपनी गलती का एहसास होने लगा था. पर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी रचना के समीप जाने की.  उसे लगा कि उसने जान-बूझकर रचनाके गुस्से को भड़काया है.  क्योंकि वह तो घर के काम निपटाकर पढ़ने बैठी थी.  मगर उसने ही मधु मक्खी के छत्ते में हाथ डाला. तो गुस्सा तो आयेगा ही न.  क्या चाय वह खुद जाकर नहीं बना सकता था? आखिर वह उसकी पत्नी है, कोई नौकरनी तो नहीं, जो हर वक़्त उसकी हुक्म बजाती रहेगी ? इस लॉकडाउन में आम इंसान से लेकर सेलिब्रिटीज तक अपनी पत्नियों की घर के काम में हाथ बटा रहे हैं, तो मैं कौन सा बड़ा लाट साहब हूँ जो कुछ कर नहीं सकता ?’

“हूं…….. सही सोच रहे हो बेटा और सिर्फ लॉकडाउन में ही नहीं, बल्कि हमेशा तुम घर-बाहर के कामों मे अपनी पत्नी की मदद करोगे” बेटे की मन की बात पढ़ते हुए मालती बोली, तो निखिल चौंक पड़ा कि उन्हें कैसे पता चला कि वह यही सब सोच रहा था ? “क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ.  बचपन में जब कोई तुम्हारी तोतली भाषा नहीं समझ पाता = था, मैं समझ जाती थी कि तुम क्या कहना चाह रहे हो या तुम्हें क्या चाहिए” मालती की बातों पर जहां निखिल हंस पड़ा वहीं रचना भी खिलखिला कर हंसने लगी.  लेकिन जैसे ही निखिल पर नजर पड़ी, मुंह बिचका दिया और कमरे में चली गई.  कुछ देर बाद वह भी कमरे में गया कि लेकिन अब भी उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी रचना से कुछ कहने की.


देखा तो आसमान में चाँद खूब चमक रहा था.  अपनी रौशनी से वह धरती को चमका रहा था, लेकिन दूर से. निखिल ने एक भरपूर नजर चाँद पर डाला और एक लंबी सांस भरते हुए बोला,‘आज रात चाँद बिल्कुल आप जैसा है………..वही खूबसूरती…….. वही नूर………वही गुरूर और वही आपकी तरह दूर……… बोलकर उसने रचना को कस कर अपनी बाहों पर भर लिया ताकि वह कितना भी कोशिश कर ले, निकल न पाए.  वैसे, निकालना तो वह भी नहीं चाह रही थी, इसलिए अपने पति के आगोश में वह समाती चली गई और फिर पूरे कमरे मे अंधेरा छाह गया.

अपने बेटे बहू के कमरे से हंसने-खिलखिलाने की आवाज सुनकर मालती ने संतुष्टि भरी सांस ली और मन ही मन हँसते हुए बोली. ‘ मेरे नादान बच्चे. नादानियाँ गई नहीं इनकीअभी तक.’

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एक दिन अचानक दीदी के पत्र ने सारे राज खोल दिए थे. अब समझ में आया क्यों दीदी ने लिखा था कि जिंदगी में कभी किसी को अपनी कठपुतली मत बनाना और न ही कभी खुद किसी की कठपुतली बनना. Hindi Kahani Ek Din Achanak लता दीदी की आत्महत्या की खबर ने मुझे अंदर तक हिला दिया था क्योंकि दीदी कायर कदापि नहीं थीं. फिर मुझे एक दिन दीदी का वह पत्र मिला जिस ने सारे राज खोल दिए और मुझे परेशानी व असमंजस में डाल दिया कि क्या दीदी की आत्महत्या को मैं यों ही व्यर्थ जाने दूं? मैं बालकनी में पड़ी कुरसी पर चुपचाप बैठा था. जाने क्यों मन उदास था, जबकि लता दीदी को गुजरे अब 1 माह से अधिक हो गया है. दीदी की याद आती है तो जैसे यादों की बरात मन के लंबे रास्ते पर निकल पड़ती है. जिस दिन यह खबर मिली कि ‘लता ने आत्महत्या कर ली,’ सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि यह बात सच भी हो सकती है. क्योंकि दीदी कायर कदापि नहीं थीं. शादी के बाद, उन के पहले 3-4 साल अच्छे बीते. शरद जीजाजी और दीदी दोनों भोपाल में कार्यरत थे. जीजाजी बैंक में सहायक प्रबंधक हैं. दीदी शादी के पहले से ही सूचना एवं प्रसार कार्यालय में स्टैनोग्राफर थीं. लता

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  Hindi kahani big brother बड़े भैया-भाग 1: स्मिता अपने भाई से कौन सी बात कहने से डर रही थी जब एक दिन अचानक स्मिता ससुराल को छोड़ कर बड़े भैया के घर आ गई, तब भैया की अनुभवी आंखें सबकुछ समझ गईं. अश्विनी कुमार भटनागर बड़े भैया ने घूर कर देखा तो स्मिता सिकुड़ गई. कितनी कठिनाई से इतने दिनों तक रटा हुआ संवाद बोल पाई थी. अब बोल कर भी लग रहा था कि कुछ नहीं बोली थी. बड़े भैया से आंख मिला कर कोई बोले, ऐसा साहस घर में किसी का न था. ‘‘क्या बोला तू ने? जरा फिर से कहना,’’ बड़े भैया ने गंभीरता से कहा. ‘‘कह तो दिया एक बार,’’ स्मिता का स्वर लड़खड़ा गया. ‘‘कोई बात नहीं,’’ बड़े भैया ने संतुलित स्वर में कहा, ‘‘एक बार फिर से कह. अकसर दूसरी बार कहने से अर्थ बदल जाता है.’’ स्मिता ने नीचे देखते हुए कहा, ‘‘मुझे अनिमेष से शादी करनी है.’’ ‘‘यह अनिमेष वही है न, जो कुछ दिनों पहले यहां आया था?’’ बड़े भैया ने पूछा. ‘‘जी.’’ ‘‘और वह बंगाली है?’’ बड़े भैया ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए पूछा. ‘‘जी,’’ स्मिता ने धीमे स्वर में उत्तर दिया. ‘‘और हम लोग, जिस में तू भी शामिल है, शुद्ध शाकाहारी हैं. वह बंगाली तो अवश्य ही

Famous Love Shayari Of These Five Noted Urdu Poet होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते

  Bashir badr shayari  बशीर बद्र की नज़्मों में मोहब्बत का दर्द समाया हुआ है। उनकी शायरी का एक-एक लफ़्ज़ इसका गवाह है। Bashir badr shayari     होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी आंखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते मोहब्बत के शायर हैं जिगर मुरादाबादी इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है सिमटे तो दिल-ए-आशिक़, फ़ैले तो ज़माना है हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है रोने को नहीं कोई हंसने को ज़माना है ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे एक आग का दरिया है और डूब के जाना है     जिगर मुरादाबादी शायरी     वो हुस्न-ओ-जमाल उन का, ये इश्क़-ओ-शबाब अपना जीने की तमन्ना है, मरने का ज़माना है अश्क़ों के तबस्सुम में, आहों के तरन्नुम में मासूम मुहब्ब