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Zameen shayari collection World earth day 2020 ज़िंदगी की मजबूरियों पर शायरों के अल्फ़ाज़






किसी की बात कोई बद-गुमाँ न समझेगा
ज़मीं का दर्द कभी आसमाँ न समझेगा
- इमाम आज़म

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए 
जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए 
-अल्लामा इक़बाल

ज़मीन की कोख ही ज़ख़्मी नहीं अंधेरों से 
है आसमाँ के भी सीने पे आफ़्ताब का ज़ख़्म 
- इब्न-ए-सफ़ी


ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़ 
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम 
- अज्ञात

फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी
अब न कहना ज़मीन बंजर है
- साबिर

रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना था 
ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया 
- परवीन शाकिर

ज़मीं की गोद में इतना सुकून था 'अंजुम'
कि जो गया वो सफ़र की थकान भूल गया
- अंजुम ख़लीक़

अगर है इंसान का मुक़द्दर ख़ुद अपनी मिट्टी का रिज़्क़ होना 
तो फिर ज़मीं पर ये आसमाँ का वजूद किस क़हर के लिए है 
- ग़ुलाम हुसैन साजिद

'ज़फ़र' ज़मीं-ज़ाद थे ज़मीं से ही काम रक्खा 
जो आसमानी थे आसमानों में रह गए हैं 
- ज़फ़र इक़बाल

ये आप हम तो बोझ हैं ज़मीन का
ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए
- नासिर काज़मी

ज़मीन हाँपने लगती है इक जगह रुक कर
मैं उस का हाथ बटाता हूँ रक़्स करता हूँ
- अंजुम सलीमी

नई ज़मीन नया आसमाँ बनाते हैं 
हम अपने वास्ते अपना जहाँ बनाते हैं 
-ख़्वाजा जावेद अख़्तर

ज़मीन बेच के तारे बसाना चाहते हैं 
ये कौन लोग ख़लाओं में जाना चाहते हैं 
-बुशरा बख़्तियार ख़ान

ज़मीन ले के वो आए तो घर बनाया जाए 
खड़े हैं देर से हम लोग ईंट गारे लिए 
-शकील आज़मी



ज़िंदगी की मजबूरियों पर शायरों के अल्फ़ाज़




ज़िंदगी है अपने क़ब्ज़े में न अपने बस में मौत
आदमी मजबूर है और किस क़दर मजबूर है
- अहमद आमेठवी


आप की याद में रोऊं भी न मैं रातों को
हूं तो मजबूर मगर इतना भी मजबूर नहीं
- मंज़र लखनवी

तेरी मजबूरियां दुरुस्त मगर
तू ने वादा किया था याद तो कर
- नासिर काज़मी


इतना तो समझते थे हम भी उस की मजबूरी
इंतिज़ार था लेकिन दर खुला नहीं रक्खा
- भारत भूषण पन्त

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता
- बशीर बद्र


चलो हम भी वफ़ा से बाज़ आए
मोहब्बत कोई मजबूरी नहीं है
- मज़हर इमाम

कभी मजबूर कर देना कभी मजबूर हो जाना
यही तेरा वतीरा है यही तेरी सियासत है
- ग़ुलाम हुसैन साजिद


एक ही शख़्स को चाहो सदा
ये कैसी मजबूरी है
- बिल्क़ीस ख़ान

हम अपना ग़म भूल गए
आज किसे देखा मजबूर
- नासिर काज़मी


इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊं
वगरना यूं तो किसी की नहीं सुनी मैं ने
- जौन एलिया




धरती और अम्बर पर दोनों क्या रानाई बाँट रहे थे
फूल खिला था तन्हा तन्हा चाँद उगा था तन्हा तन्हा
- ग्यान चन्द

जग में आ कर इधर उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा
- ख़्वाजा मीर दर्द

कैसे मानें कि उन्हें भूल गया तू ऐ 'कैफ़'
उन के ख़त आज हमें तेरे सिरहाने से मिले
- कैफ़ भोपाली

माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है
आज अपने साथ अपना जनम दिन मनाया है
- अंजुम सलीमी

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