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धर्मणा के स्वर्णिम रथ | पाखी को अधर्मी क्यों कहते थें लोग? भाग 1- hindi shayari h


धर्मणा के स्वर्णिम रथ- पाखी को अधर्मी क्यों कहते थें लोग? भाग 1
पाखी को अधर्मी क्यों कहते थें लोग?


धर्मणा के स्वर्णिम रथ- पाखी को अधर्मी क्यों कहते थें लोग? भाग 1
रानी को विदा करते समय ममता ने कहा, ‘‘रानी, अगले हफ्ते से नवरात्र आरंभ हो रहे हैं.





लाख रुपए का खर्च सुन जब ममता विस्मित हो उठीं तो उन के पति किशोरीलाल ने उन्हें समझाया, ‘‘जब बात धार्मिक उत्सव की हो तो कंजूसी नहीं किया करते. आखिर क्या लाए थे जो संग ले जाएंगे. सब प्रभु का दिया है.’’ फिर वे भजन की धुन पर गुनगुनाने लगे, ‘‘तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा…’’ ममता भी भक्तिरस में डूब झूमने लगीं.


हिंदी कहानी पाखी को अधर्मी क्यों कहते थें लोग 
दिल्ली के करोलबाग में किशोरीलाल की साड़ीलहंगों की नामीगिरामी दुकान थी. अच्छीखासी आमदनी होती थी. परिवार में बस एक बेटाबहूपोता. सो, धर्म के मामले में वे अपना गल्ला खुला ही रखते थे.

खर्च करना किशोरीलाल का काम और बाकी सारी व्यवस्था की देखरेख ममता के सुपुर्द रहती. वे अकसर धार्मिक अनुष्ठानों, भंडारों, संध्याओं में घिरी रहतीं. समाज में उन की छवि एक धार्मिक स्त्री के रूप में थी जिस के कारण सामाजिक हित में कोई कार्य किए बिना ही उन की प्रतिष्ठा आदरणीय थी.

अगली शाम साईं संध्या का आयोजन था. ममता ने सारी तैयारी का मुआयना खुद किया था. अब खुद की तैयारी में व्यस्त थीं. शाम को कौन सी साड़ी पहनी जाए… किशोरीलाल ने 3 नई साडि़यां ला दी थीं दुकान से. ‘साईं संध्या पर पीतवस्त्र जंचेगा,’ सोचते हुए उन्होंने गोटाकारी वाली पीली साड़ी चुनी. सजधज कर जब आईना निहारा तो अपने ही प्रतिबिंब पर मुसकरा उठीं, ‘ये भी न, लाड़प्यार का कोई मौका नहीं चूकते.’



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शाम को कोठी के सामने वाले मंदिर के आंगन में साईं संध्या का आयोजन था. मंदिर का पूरा प्रांगण लाल और पीले तंबुओं से सजाया गया था. मौसम खुशनुमा था, इसलिए छत खुली छोड़ दी थी. छत का आभास देने को बिजली की लडि़यों से चटाई बनाईर् थी जो सारे परिवेश को प्रदीप्त किए हुए थी. भक्तों के बैठने के लिए लाल दरियों को 2 भागों में बिछाया गया था, बीच में आनेजाने का रास्ता छोड़ कर.

एक स्टेज बनाया गया था जिस पर

साईं की भव्य सफेद विशालकाय

मूर्ति बैठाईर् गई थी. मूर्ति के पीछे जो परदा लगाया था वह मानो चांदीवर्क की शीट का बना था. साईं की मूर्ति के आसपास फूलों की वृहद सजावट थी जिस की सुगंध से पूरा वातावरण महक उठा था. जो भी शामियाने में आता, ‘वाहवाह’ कहता सुनाई देता. प्रशंसा सुन कर ममता का चेहरा और भी दीप्तिमान हो रहा था.

नियत समय पर साईं संध्या आरंभ हुई. गायक मंडली ने भजनों का पिटारा खोल दिया. सभी भक्तिरस का रसास्वादन करने में मगन होने लगे. बीचबीच में मंडली के प्रमुख गायक ने परिवारजनों के नाम ले कर अरदास के रुपयों की घोषणा करनी शुरू की. ग्यारह सौ की अरदास, इक्कीस सौ की अरदास… धीरेधीरे आसपास के पड़ोसी भी अरदास में भाग लेने लगे. घंटाभर बीता था कि कई हजारों की अरदास हो चुकी थी. जब अरदास के निवेदन आने बंद होने लगे तो प्रमुख गायक ने भावभीना भजन गाते हुए प्रवेशद्वार की ओर इशारा किया.


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सभी के शीश पीछे घूमे तो देखा कि साक्षात साईं अपने 2 चेलों के साथ मंदिर में पधार रहे हैं. उन की अगुआई करती

2 लड़कियां मराठी वेशभूषा में नाचती आ रही हैं. साईं बना कलाकार हो या साथ में चल रहे 2 चेले, तीनों का मेकअप उम्दा था. क्षीणकाय साईं बना कलाकार अपने एक चेले के सहारे थोड़ा लंगड़ा कर चल रहा था. उस की गरदन एक ओर थोड़ी झुकी हुईर् थी और एक हाथ कांपता हुआ हवा में लहरा रहा था. दूसरे हाथ में एक कटोरा था.

उस कलाकार के मंदिर प्रांगण में प्रवेश करने की देर थी कि भीड़ की भीड़ उमड़ कर उस के चरणों में गिरने लगी. कोई हाथ से पैर छूने लगा तो कोई अपना शीश उस के पैरों में नवाने लगा. लगभग सभी अपने सामर्थ्य व श्रद्धा अनुसार उस के कटोरे में रुपए डालने लगे. बदले में वह भक्ति में लीन लोगों को भभूति की नन्हीनन्ही पुडि़यां बांटने लगा.



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सभी पूरी भक्ति से उस भभूति को स्वयं के, अपने बच्चों के माथे पर लगाने लगे. जब कटोरा नोटों से भर जाता तो साथ चल रहे चेले, साईं बने कलाकार के हाथ में दूसरा खाली कटोरा पकड़ा देते और भरा हुआ कटोरा अपने कंधे पर टंगे थैले में खाली कर लेते. और वह कलाकार लंगड़ा कर चलते हुए, गरदन एक ओर झुकाए हुए, कांपते हाथों से सब को आशीर्वाद देता जाता.

भक्ति के इस ड्रामे के बीच यदि किसी को कोफ्त हो रही थी तो वह थी ममता और किशोरीलाल की बहू पाखी. पाखी एक शिक्षित स्त्री थी, जिस की शिक्षा का असर उस के बौद्धिक विकास के कारण साफ झलकता था. वह केवल कहने को पढ़ीलिखी न थी, उस की शिक्षा ने उस के दिमाग के पट खोले थे. वह इन सब आडंबरों को केवल अंधविश्वास मानती थी. लेकिन उस का विवाह ऐसे परिवार में हो गया था जहां पंडिताई और उस से जुड़े तमाशों को सर्वोच्च माना जाता था. अपने पति संबल से उस ने एकदो बार इस बारे में बात करने का प्रयास किया था किंतु जो जिस माहौल में पलाबढ़ा होता है, उसे वही जंचने लगता है.

संबल को इस सब में कुछ भी गलत नहीं लगता. बल्कि वह अपने मातापिता की तरह पाखी को ही नास्तिक कह उठता. तो पाखी इन सब का हिस्सा हो कर भी इन सब से अछूती रहती. उसे शारीरिक रूप से उपस्थित तो होना पड़ता, किंतु वह ऐसी अंधविश्वासी बातों का असर अपने ऊपर न होने देती. जब भी घर में कीर्तन या अनुष्ठान होते, वह उन में थोड़ीथोड़ी देर को आतीजाती रहती ताकि क्लेश न हो.

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 उस की दृष्टि में उस की असली पूजा उस की गोद में खेल रहे मनन का सही पालनपोषण और बौद्धिक विकास था. अपने सारे कर्तव्यों के बीच उस का असली काम मनन का पूरा ध्यान रखना था. कितनी बार उसे पूजा से उठ कर जाने पर कटु वचन भी सुनने पड़ते थे. परंतु वह इन सब की चिंता नहीं करती थी. उस का उद्देश्य था कि वह मनन को इन सब पोंगापंथियों से दूर रखेगी और आत्मविश्वास से लबरेज इंसान बनाएगी.

साईं संध्या अपनी समाप्ति की ओर थी. अधिकतर भजनों में मोहमाया को त्यागने की बात कही जा रही थी. आखिरी भजन गाने के बाद मुख्य गायक ने भरी सभा में अपना प्रचारप्रसार शुरू किया. कहां पर उन की दुकान है, वे कहांकहां जाते हैं, बताते हुए उन्होंने अपने विजिटिग कार्ड बांटने आरंभ कर दिए, ‘‘जिन भक्तों को साईं के चरणों में जाना हो, और ऐसे आयोजन की इच्छा हो, वे इस संध्या के बाद हम से कौंटैक्ट कर सकते हैं,’’ साथ ही, प्रसाद के हर डब्बे के नीचे एक कार्ड चिपका कर दिया जा रहा था ताकि कोई ऐसा न छूट जाए जिस तक कार्ड न पहुंचे.



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सभी रवाना होने लगे कि रानी चाची ने माइक संभाल लिया, ‘‘भक्तजनो, मैं आप सब से अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूं. आप सब समय के बलवान हैं कि ऐसी मनमोहक साईं संध्या में आने का सुअवसर आप को प्राप्त हुआ. मैं ने देखा कि आप सभी ने पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ यह शाम बिताई. साईं बाबा का आशीर्वाद भी मिला. तो बोलो, जयजय साईं,’’ और सारा माहौल गुंजायमान हो उठा, ‘‘जयजय साईं.’’

‘‘रानी की यह बात मुझे बहुत भाती है,’’ अपनी देवरानी के भीड़ को आकर्षित करने के गुण पर ममता बलिहारी जा रही थीं.

रानी चाची ने आगे कहा, ‘‘आप लोगों में से शायद कोई एकाध ऐसा नास्तिक भी हो सकता है जो आज सभा में आए साईं बाबा को एक मनुष्यरूप में देखने का दुस्साहस कर बैठा हो. पर बाबा ऐसे ही दर्शन दे कर हमारी प्यास बुझाते हैं. मैं आप को एक सच्चा किस्सा सुनाती हूं-‘‘गत वर्ष मैं और मेरी भाभी शिरडी गए थे. वहां सड़क पर मुझे साईं बाबा के दर्शन हुए. उन्हें देख मैं आत्मविभोर हो उठी और उन्हें दानदक्षिणा देने लगी. मेरी भाभी ने मुझे टोका और कहने लगीं कि दीदी, यह तो कोई बहरूपिया है जो साईं बन कर भीख मांग रहा है.

‘‘अपनी भाभी की तुच्छ बुद्धि पर मुझे दया आई. पर मैं ने अपना कर्म किया और बाबा को जीभर कर दान दिया. मुश्किल से

20 कदम आगे बढ़े थे कि मेरी भाभी को ठोकर लगी और वे सड़क पर औंधेमुंह गिर पड़ीं. साईं बाबा ने वहीं न्याय कर दिया. इसलिए हमें भगवान पर कभी शक नहीं करना चाहिए. जैसा पंडितजी कहें, वैसा ही हमें करना चाहिए.’’

सभी लोग धर्म की रौ में पुलकित हो लौटने लगे. रानी को विदा करते समय ममता ने कहा, ‘‘रानी, अगले हफ्ते से नवरात्र आरंभ हो रहे हैं. हर बार की तरह इस बार भी मेरे यहां पूरे 9 दिन भजनकीर्तन का प्रोग्राम रहेगा. तुझे हर रोज 3 बजे आ जाना है, समझ गई न.’’

‘‘अरे जिज्जी, पूजा हो और मैं न आऊं? बिलकुल आऊंगी. और हां, फलों का प्रसाद मेरी तरफ से. आप मखाने की खीर और साबूदाना पापड़ बांट देना. साथ ही खड़ी पाखी सब देखसुन रही थी. पैसे की ऐसी बरबादी देख उसे बहुत पीड़ा होती. स्वयं को रोक न पाई और बोल पड़ी, ‘‘मां, चाचीजी, क्यों न यह पैसा गरीबों में बंटवा दिया

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