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Mai Fir Har Gaya Hindi Kahanimai मैं फिर हार गया - Hindi Shayarih

मैं फिर हार गया
मैं फिर हार गया


कई बार इंसान के पास पैसे कम होते हैं लेकिन उनके जीवन में खुशियां इतनी ज्यादा होती कि पैसे उन सबके सामने फिके पर जाते हैं.



मैं फिर हार गया: भाग 1
ऑफिस में अमित को बेस्ट सीइओ का अवार्ड जितने के लिए लगातार शुभकामनाएं मिल रही थी . उन्हें अपने बचपन के दिन याद आ रहे थे.
अरशद हाशमी




“सर, एक बार फिर से बेस्ट सीईओ का अवार्ड जीतने पर आप को लखलख बधाइयां,” औफिस में साथ काम करने वाले हरविंदर ने अमित को गले लगाते हुए कहा, तो वहां मौजूद सभी लोगों ने तालियों से अमित का अभिवादन किया.

 “थैंक्यू वैरी मच.  आप सभी की शुभकामनाएं मेरे लिए बहुत माने रखती हैं.  आप सब के सहयोग से ही मैं लगातार दूसरी बार यह अवार्ड जीत पाया हूं.  थैंक्स अगेन,”  अमित ने सभी सहकर्मियों का आभार प्रकट करते हुए कहा.

 “सर, खाली थैंक्यू से काम नहीं चलेगा.  पार्टी देनी होगी,” राकेश ने हंसते हुए कहा तो सभी लोग ‘पार्टी…पार्टी’ चिल्लाने लगे.

 “हां, क्यों नहीं.  जब और जहां आप सब कहें,”  अमित ने भी हंसते हुए जवाब दिया.

 “सर, बुर्ज खलीफा में एक बड़ा अच्छा इटालियन रेस्टोरेंट है.  उस से अच्छा इटालियन खाना पूरे दुबई में कहीं नहीं मिलेगा,”  नवेद ने एक रेस्टोरेंट का नाम सुझाया.

 “हां, मैं भी वहां जा चुका हूं.  वाकई वह दुबई का नंबर वन रेस्टोरेंट है,” वर्मा जी ने नवेद से सहमति जताते हुए कहा.

 “फिर तो पार्टी वहीं होनी चाहिए.  वैसे भी, हमारे अमित सर हर बात में नंबर वन हैं तो पार्टी भी नंबर वन रेस्टोरेंट में होनी चाहिए,”  यासिर ने उंगली से एक नंबर का इशारा करते हुए कहा तो सब के साथसाथ अमित भी हंसने लगा.

 “सही में. सर,  यू आर द बेस्ट एंड नंबर वन,”  पन्नेलाल ने अमित की तारीफ करते हुए कहा.

 “सर, आप तो स्कूल कालेज में भी हमेशा नंबर वन रहे होंगे,” आबिद ने कहा तो अमित की हंसी को मानो ब्रेक लग गया.  एकदम से उस को राहुल की याद आ गई.

 राहुल.  अमित के पूरे जीवन में एकमात्र ऐसा व्यक्ति जो कभी उस से आगे निकला हो.  वह भी एकदो बार नहीं, पूरे 4 साल वह क्लास में पहले नंबर पर आता रहा और अमित दूसरे नंबर पर. फिर पूरे दिन अमित का मन खिन्न सा रहा.  रहरह कर उस को अपने स्कूल और राहुल की याद आती रही.  रात को बिस्तर पर लेटने के बाद भी नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी.  ऐसा लग रहा था मानो कल की ही बात हो जब वह पहली बार दिल्ली पब्लिक स्कूल आया था.  8वीं कक्षा तक की पढ़ाई उस ने देहरादून के सब से मशहूर दून पब्लिक स्कूल से की थी.  उस के पापा बड़े सरकारी अफसर थे और उन का ट्रांसफर दिल्ली हो गया तो अमित को भी देहरादून से दिल्ली आना पड़ा.

 बचपन से अमित पढ़नेलिखने में बहुत अच्छा था और हमेशा ही क्लास में फर्स्ट आता था.  स्कूल के सारे टीचर उस से बहुत खुश थे.  मनुज सर ने तो भविष्यवाणी कर दी थी कि अमित एक महान वैज्ञानिक या इंजीनियर बनेगा.

 9वीं क्लास में रिजल्ट आने से पहले ही अमित को पूरा विश्वास था कि वह यहां भी फर्स्ट आएगा, लेकिन जब उस ने रिजल्ट देखा तो उस को मानो एक झटका सा लगा.  उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आ रहा था कि वह क्लास में दूसरी पोजीशन पर था.  क्लास में ज्यादा किसी से बात न करने वाला राहुल फर्स्ट आया था. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बिजनौर जैसे छोटे शहर से आया राहुल कभी उसे पछाड़ कर फर्स्ट आ सकता है.

 अब तो मानो अमित पर एक जनून सा छा गया.  भले ही इस बार राहुल तुक्के से फर्स्ट आ गया हो लेकिन अगली बार वह उस को अपने आसपास भी नहीं आने देगा.  अमित ने पढ़ाई में अपनी पूरी ताकत लगा दी.  10वीं की परीक्षा में उस ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया, लेकिन नतीजा वही निकला.  राहुल न केवल क्लास में बल्कि स्कूल के साथसाथ पूरे देश में फर्स्ट आया था और अमित सेकंड.

 अमित के मम्मीपापा उस की सफलता पर बेहद खुश थे, लेकिन अमित तो दुनिया का सब से दुखी इंसान बना हुआ था.  पूरे दिन वह अपने कमरे से बाहर नहीं निकला.  उस के मम्मीपापा ने उस को बहुत समझाया कि सेकंड आना कोई विफलता नहीं है, लेकिन अमित पर इन सब बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा.  अब उसे, बस, एक ही बात कचोट रही थी कि वह राहुल से पीछे कैसे रह गया.

 एक बार फिर से अमित ने अपनेआप से वादा किया कि वह इस बार जरूर फर्स्ट आएगा.  वह फिर से पढ़ाई में डूब गया.  अगले 2 साल अमित ने सबकुछ भुला दिया, दोस्त, मूवीज, क्रिकेट, सबकुछ.  उस का एक ही लक्ष्य था, क्लास में फर्स्ट आना.  लेकिन प्रकृति को तो कुछ और ही मंजूर था. न सिर्फ 11वीं बल्कि 12वीं क्लास में भी राहुल ही फर्स्ट आया था और अमित सेकंड.  अमित बुरी तरह टूट चुका था.  99 प्रतिशत से भी ज्यादा अंक लाने के बाद भी वह दुखी था. कई बार उस के मन में स्वयं को समाप्त कर लेने का विचार आया, लेकिन मम्मीपापा का ध्यान आते ही उस ने ऐसा कुछ भी करने का विचार त्याग दिया.






मैं फिर हार गया: भाग 2
अमित से मिलकर राहुल को बहुत अच्छा लग रहा था वह पुरानी बातों को छोड़कर आगे की बात कर रहे थें.



पर अच्छी बात यह थी कि उस का चयन देश के सब से प्रतिष्ठित आईआईटी में हो गया था. फर्स्ट न आने की अपनी असफलता को एक बुरा स्वप्न समझ कर वह आईआईटी चला गया और वहां हर साल वह पूरे आईआईटी में फर्स्ट आता रहा.  बाद में वह उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चला गया. और फिर वहीं उस को एक बड़ी कंपनी में शानदार नौकरी भी मिल गई.  अब वह कंपनी के दुबई औफिस का हेड था.  लगभग हर महीने वह किसी देश के टूर पर होता.  आज सबकुछ तो था अमित के पास.  पत्नी, प्यारा सा बेटा, बंगला, गाड़ियां, और बड़ा सा बैंक बैलेंस, लेकिन फिर भी उस के दिल में एक शूल था, राहुल.

 आज इतने दिनों बाद उस को राहुल की याद आ गई, तो मन विचलित हो गया.  क्या कर रहा होगा राहुल?  किसी बड़ी कंपनी में ऊंची पोस्ट पर होगा या अपनी कोई कंपनी खोल ली होगी?

 अपने स्कूली दिनों को याद करतेकरते पूरी रात बीत गई लेकिन अमित की आंखों में नींद कहां थी.  फर्स्ट न आ पाने की अपनी असफलता उस को अपनी हार जैसी लग रही थी.  ऐसे में उस के दिमाग में यह विचार भी आया कि वह स्कूल में भले ही राहुल को हरा न पाया हो लेकिन कामयाबी की इस दौड़ में वह जरूर राहुल को हराएगा.

 सुबह होतेहोते उस ने फैसला कर लिया था कि इस बार भारत जा कर वह राहुल को ढूंढ़ निकालेगा और उस को एहसास दिला देगा कि असल में अमित ही नंबर वन है.

 फिर अगले कुछ दिनों में अमित दिल्ली में था.  उस के मातापिता कभी दिल्ली में तो कभी उस के साथ दुबई में रहते थे.  डिफेन्स कौलोनी में अपने शानदार बंगले को देख कर अमित को अनायास ही राहुल का ध्यान आ गया.  उस के दोस्त कहते थे कि ऐसा शानदार बंगला पूरी दिल्ली में कहीं नहीं है.  अगर राहुल के पास ऐसा बंगला होता तो उन को जरूर पता होता.  अमित को अपनी पहली जीत का आभास सा हुआ तो उस के होंठों पर एक विजयी मुसकान फैल गई.

 अगले कुछ दिनों में अमित ने अपने सभी क्लासमेट्स को एक पार्टी देने का प्लान बनाया.  दिल्ली के सब से महंगे पांचसितारा होटल में उस ने पार्टी का प्रबंध किया था.  काफी सारे लोग आए, लेकिन राहुल नहीं आया.  उस का क्लासमेट फैसल इसी होटल में जनरल मैनेजर था.  उसी ने बताया कि राहुल अपने शहर बिजनौर में ही रह कर किसी स्कूल में टीचर बन गया है.

 “स्कूल टीचर,” अमित ने एक व्यंग्यात्मक हंसी बिखेरी.

 यह जान कर कि राहुल किसी छोटे से स्कूल में टीचर है, अमित उस से मिलने के लिए बेचैन ही हो उठा.  अब तो अपनी हार का बदला लेने का अवसर उस को साफसाफ नजर आ रहा था.

 अगले दिन ही अमित ने अपनी बीएमडब्लू निकाली और बिजनौर की तरफ चल दिया.  राहुल का स्कूल ढूंढ़ने में उसे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई.  वह स्कूल के गेट पर पहुंचा तो वौचमैन से राहुल के बारे में पूछा. वौचमैन ने अमित को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, ““बिलकुल, यहीं तो काम करते हैं हमारे राहुल सर. आप कौन हैं वैसे?”

 सवाल के जवाब में अमित ने कुछ सोचते हुए कहा, ““हम एक ही स्कूल के हैं.””

 ““अरे, आप राहुल सरजी के दोस्त हैं. आइए न, मैं ले चलता हूं आप को उन तक.””

 ““नहींनहीं, मैं इंतजार कर कर लूंगा, कोई बात नहीं,” अमित ने कहा और वह वहीं खड़ा हो कर स्कूल की छुट्टी होने का इंतजार करने लगा.

 दोपहर बाद स्कूल की छुट्टी हो गई और थोड़ी देर बाद राहुल भी स्कूल से बाहर आता दिखाई दिया.  साधारण से कपड़े पहने राहुल अपनी स्कूटी पर बैठा ही था कि अमित उस के सामने आ गया.

 “हाय राहुल.  कैसे हो?  पहचाना?”  अमित ने राहुल की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा.

 महंगे सूटबूट पहने अमित को एक क्षण के लिए तो राहुल पहचान ही नहीं पाया.

 “अरे यार, मैं अमित.  हम लोग डीपीएस में साथ पढ़ते थे,” अमित ने राहुल को याद दिलाते हुए कहा.

 “अरे, अमित,  तुम यहां?  सौरी इतने दिनों बाद देखा तो एकदम से पहचान नहीं पाया,”  राहुल ने अमित का हाथ अपने हाथों में लेते हुए बड़ी खुशी से कहा.

 “वह मैं जरा अपनी कंपनी के काम से चांदपुर आया था.  फैसल ने बताया था तुम आजकल बिजनौर में ही होते हो, तो सोचा मिलता चलूं,” अमित ने ‘अपनी कंपनी‘ पर जोर देते हुए कहा. राहुल बात का जवाब देता, उस से पहले ही उस का फोन बज उठा.

 राहुल ने फोन उठा लिया और ‘हैलो’ कहते ही रुक कर सुनने लगा और फिर बोला, ““सब ठीक है यहां, तुम बताओ,” फिर रुक कर कहा, ““हां, तुम मेल भेज दो मैं आगे फौरवर्ड कर दूंगा.”

 अमित राहुल की बात ध्यान से सुन रहा था, बोला, ““स्कूल का काम?”

 “”अरे नहीं, एक स्टूडेंट हैं सिंगापुर में रहता है, प्रोफेसर है. जिस कालेज में वह पढ़ाता है वहां एक हिन्दी के प्रोफेसर के लिए जगह खाली है उसी के लिए पूछ रहा था. मैं हिन्दी के प्रोफेसर को मेल सेंड करने की बात कर रहा था.”

 “”अच्छा,”” अमित ने कहा.

 पिछली छोड़ी हुई बात को आगे बढ़ाते हुए राहुल ने कहा, ““यहां आ कर तुम ने बहुत अच्छा किया.  चलो, बाकी बातें घर चल कर करेंगे.”

  राहुल अमित से मिल कर बहुत खुश नजर आ रहा था.

 “अरे, भाभी को परेशान करने की क्या जरूरत है. चलो, आज तुम्हें किसी फाइवस्टार होटल में लंच कराता हूं,” अमित के दिल को धीरेधीरे बड़ा आनंद आ रहा था.

 “परेशानी कोई नहीं है.  और यहां बिजनौर में तुम्हें कोई फाइवस्टार होटल नहीं मिलेगा,”  राहुल ने हंसते हुए कहा.





मैं फिर हार गया: भाग 3
अमित बार-बार राहुल को दुबई जानें की बात कर रहा था लेकिन राहुल अपने छोटे से परिवार के साथ संतुष्ट था.





“अरे यार, तुम्हारे घर तक मेरी गाड़ी चली भी जाएगी या नहीं?” अमित ने व्यंग्य का एक और तीर फेंका.

“हां, यह प्रौब्लम तो है.  चलो, तुम्हारी गाड़ी मैं अपने एक मित्र के घर खड़ी करा दूंगा. उस का घर पास ही है,” राहुल अमित के व्यंग्य को समझ नहीं पाया.

“”अच्छा, चलो आओ, बैठो, चलते हैं,” अमित ने अपनी नई कार की ओर अहंकार से देखते हुए कहा.

“”लेकिन मेरा स्कूटर…चलो छोड़ो, इसे बाद में ले जाऊंगा.””

अमित और राहुल कार में बैठे और आगे बढ़ गए. रास्ते में राहुल और अमित स्कूल के क्लासमेट्स की बातें कर रहे थे कि बगल में पुलिस की गाड़ी चलती दिखाई दी. गाड़ी से एक पुलिस वाले ने राहुल की तरह हाथ हिलाया तो राहुल ने अमित को कार साइड में रोकने के लिए कहा. पुलिस की गाड़ी भी साथ में आ कर रुक गई. गाड़ी में से 2 पुलिस वाले बाहर निकले. उन में एक ठाटबाट वाला सीनियर इंस्पेक्टर और एक हवलदार था. दोनों ने राहुल को देखा और कहा, ““नमस्ते, राहुल सर.””

““कैसे हो, बहुत दिन बाद मिले हो,”” फिर अमित का परिचय कराते हुए कहा, ““ये मेरे दोस्त हैं अमित, विदेश में बड़ी कंपनी में उच्च अधिकारी हैं.”

“”नमस्ते,”” सीनियर इंस्पेक्टर ने अमित से कहा और फिर राहुल की तरफ मुखरित हो कर बोला, “”सर, बेटे का एडमीशन आप के स्कूल में कराना है, सोचा, एक बार खुद ही आप से कह कर सुनिश्चित कर लूं कि आप ही उसे पढ़ाएंगे. आप ने मुझे पढ़ालिखा कर यहां तक पहुंचा दिया है, तो मेरे बेटे को भी आप से सीखने का मौका मिले, इस से ज्यादा अच्छा और क्या हो सकता है.””

“”अरे, तुम मुझे यह कौल कर के कह देते,” राहुल ने कहा.

““बिलकुल नहीं, ऐसा अनादर कैसे कर सकता हूं मैं. मैं तो कल आने वाला था आप से मिलने, पर आप आज ही दिख गए.””

““अच्छा, चलो यह भी सही ही हुआ.”

कुछ देर घरबार की बात कर राहुल अमित के साथ वापस कार में बैठ गया.अमित ने सब ध्यान से सुना और राहुल का इतना आदर देख कर थोड़ा चौंका भी.

राहुल के दोस्त की गली में जब अमित की लंबीचौड़ी व महंगी कार पहुंची तो लोगों की नजरें भी कार के साथसाथ चलने लगीं. अमित के चहरे पर अत्यंत खुशी के भाव उभरने लगे थे. कार राहुल के दोस्त के घर से बाहर निकली तो लोग और बच्चे “नमस्ते राहुल सर”” कहते हुए आनेजाने लगे. अमित ने कार खड़ी की और राहुल के साथ उस के घर की तरफ बढ़ने लगा.

“मैं तो सोच रहा था, तुम किसी बड़ी कंपनी में इंजीनियर बन गए होगे. यह तुम टीचर कहां बन बैठे,”  पैदल चलतेचलते अमित ने राहुल से कहा.

“मैं तो हमेशा से टीचर ही बनना चाहता था,” राहुल ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

“अच्छा, अगर टीचर ही बनना था तो यह फटीचर स्कूल ही रह गया था.  तुम कहो तो अमेरिका या इंग्लैंड में किसी से बात करूं.  यों चुटकियों में तुम्हारा चयन करा दूंगा. या कहो तो दिल्ली या दुबई में एक स्कूल ही खुलवा देता हूं.  दोस्तों के लिए इतना तो कर ही सकता हूं.” अमित ने बड़े गर्व के साथ राहुल से कहा.

“अरे भाई, मैं भी इसी स्कूल में पढ़ चुका हूं.  हां, स्कूल की बिल्डिंग जरूर पुरानी है लेकिन यहां की पढ़ाई पूरे जिले में सब से अच्छी मानी जाती है.” अपने स्कूल के बारे में बताते हुए राहुल की आंखों में एक चमक सी थी.

“और तुम्हारे औफर के लिए धन्यवाद, लेकिन मैं यहीं खुश हूं,” राहुल ने मुसकराते हुए कहा तो अमित को थोड़ी निराशा सी हुई.

“लेकिन इस छोटे से शहर में रह कर तुम कितनी तरक्की कर पाओगे?  अपना नहीं तो अपने बच्चों के बारे में सोचो.  कल उन को भी किसी बड़े शहर जाना ही होगा.  मेरी मानो तो मेरे साथ दुबई चलो.  चाहो तो मेरी कंपनी में जौब कर लेना या फिर तुम्हें किसी स्कूल में सेट करा दूंगा,” अमित ने राहुल को समझाने की कोशिश की.

राहुल के घर जाने तक गली के कई लोग राहुल को ‘नमस्ते सर’ कहते सत्कार व्यक्त करने लगे. अमित के साथ कभी ऐसा नहीं हुआ था. राहुल के प्रति लोगों के इस प्रकार के सत्कारभाव को देख वह थोड़ा सकुचाया.

एक आदमी अपने बेटे को ले कर जा रहा था और राहुल को देख, रुक कर कहने लगा, ““अरे सर, कैसे हैं आप. सब बढ़िया तो है न?”

“”हां, सब ठीक है, आप बताइए.””

““हम भी बहुत अच्छे हैं. यह पिंकू जब से आप की क्लास में गया है, इतना तेज हो गया है कि हर समय गणित के जाने कैसेकैसे प्रश्न पूछने लगता है, हम तो कान पकड़ लेते हैं,” कह कर वह आदमी हंसने लगा. उसे देख राहुल भी हंस दिया.

अमित यह सब देखसुन असमंजस में पड़ गया. क्या उसे कभी इतना सम्मान, इतना प्यार मिला है लोगों से? वह जहां काम करता है वहां तो जिस की जेब में जितने बड़े नोट हैं उतनी ही बड़ी उस की इज्जत है या कहें उतना ही लोग उसे भाव देते हैं. यहां तो राहुल के साधारण होने पर भी लोग जहां देखते उस के आगेपीछे लग जाते. वह तो किसी को इस तरह का कोई लाभ भी नहीं पहुंचा सकता जिस के लालच में लोग ये सब करते हों. जिस तरह राहुल के छात्रों ने उसे याद रखा है और रख रहे हैं, क्या ऐसा कोई है जो अमित को याद रखेगा?

अमित यह सब सोच ही रहा था कि चलतेचलते राहुल का घर भी आ गया.  2 कमरों का छोटा सा घर था, लेकिन सबकुछ बड़ा व्यवस्थित और साफसुथरा था.

“ये हैं मेरे स्कूल के मित्र अमित.  विदेश में रहते हैं.  आज कितने ही सालों के बाद मिले हैं.  जल्दी से कुछ खाना खिलवाओ,”  राहुल ने अमित का परिचय अपनी पत्नी से कराते हुए कहा.

राहुल की पत्नी ने झटपट गर्मागर्म रोटी और सब्जी परोस दी.  अमित ने इतना स्वादिष्ट खाना कई वर्षों बाद खाया था.

“सच कह रहा हूं भाभीजी,  इतना स्वादिष्ट खाना मैं ने शायद पूरे जीवन में कभी नहीं खाया,” अमित ने दिल से खाने की तारीफ करते हुए कहा.

खाने के बाद अमित ने फिर से राहुल को दुबई चलने का औफर दे डाला.  इस बार राहुल थोड़ा गंभीर हो कर बोला, “यह सच है कि मैं बहुत ही मामूली पगार पर काम कर रहा हूं और मेरा घर भी छोटा सा है, लेकिन जो चीज मुझे यहां रोकती है वह है मेरी आत्मसंतुष्टि.  बचपन से ही मैं एक टीचर बनना चाहता था.  एमएससी और पीएचडी करने के बाद देशविदेश से मुझे कई औफर आए, लेकिन मैं ने अपने शहर के इस स्कूल को ही चुना क्योंकि मैं अपने शहर के लिए कुछ करना चाहता था.

“जानते हो, पहले यहां 10 में से एक छात्र ही इंजीनियरिंग या मेडिकल कालेज में एडमीशन ले पाता था.  मैं अपनी तारीफ नहीं कर रहा लेकिन पिछले 10 सालों में मेरे स्कूल से  50 बच्चे मेडिकल और 100 से ज्यादा बच्चे इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश ले चुके हैं.  इन बच्चों की सफलता मुझे वह खुशी और आत्मसंतुष्टि देती है जो शायद किसी कंपनी का सीईओ बनने पर भी नहीं मिलती.  और अगर अपना मन खुश है तो चाहे बिजनौर में रहो या बेंगलुरु या फिर बोस्टन, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता.  और फिर यहां मेरी पत्नी और बच्चे भी खुश हैं. मुझे और क्या चाहिए.”   राहुल के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि की चमक थी.

और दूसरी तरफ अमित हैरान था.  उस को याद आ रही थी अपनी तनावभरी जिंदगी, न सेहत का ध्यान न परिवार संग बिताने के लिए समय.  कभीकभी तो उस को अपने बेटे के साथ डिनर किए हफ्तों बीत जाते.  छुट्टी के नाम पर साल में 2-4 दिन परिवार को कहीं विदेश घुमा लाता, उस में भी उस का फोन लगातार बजता रहता.  नौकरों के हाथों से बना खाना खाखा कर वह बचपन के स्वादिष्ट खानों का स्वाद ही भूल चुका था. इतनी कम उम्र में ही उस को हाई ब्लडप्रेशर और हलकी शुगर भी हो गई थी.

सामने दीवार पर राहुल, उस की पत्नी और उन के बेटे की तसवीर लगी थी.  सब कितने खुश नजर आ रहे थे.  वहीं दूसरी तरफ उस को अपनी पत्नी से लड़ने तक की फुरसत नहीं थी.  बेटे के स्कूल में क्या चल रहा है, उस को पता ही नहीं.  मम्मीपापा साल में कुछ दिन उस के साथ रहने आते तो उन से भी, बस, थोड़ीबहुत ही बातचीत हो पाती.

अब उस को लग रहा था कि राहुल तो कभी रेस में था ही नहीं, वह तो खुद अपनेआप से ही रेस लगा रहा था, और बारबार अपनेआप से ही हार रहा था.

“मैं फिर हार गया,”  अमित के मुंह से निकल गया.”कुछ कहा तुम ने,” राहुल ने उस को सवालिया नजरों से देखा.”कुछ नहीं,” अमित ने मुसकराते हुए कहा. अब उस को अपनी हार पर कोई दुख नहीं था.




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