World पर्यावरण Day 2020: Shayari Collection, Environment के प्रति चिंता व्यक्त करते ये 20 चुनिंदा शेर. सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

World पर्यावरण Day 2020: Shayari Collection, Environment के प्रति चिंता व्यक्त करते ये 20 चुनिंदा शेर.

Environment के प्रति चिंता व्यक्त करते ये 20 चुनिंदा शेर.
World पर्यावरण Day 2020


कविता या शायरी इशारे की कला है। इस विधा में बातें इशारों-इशारों में आएंगी। शेरों शायरी की श्रृंखला में आज पाठकों के लिए जो शेर हम प्रस्तुत कर रहे हैं उसमें भी पर्यावरण के प्रति चिंता महसूस की जा सकती है।



बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं
- राहत इंदौरी

गाँव से गुज़रेगा और मिट्टी के घर ले जाएगा
एक दिन दरिया सभी दीवार-ओ-दर ले जाएगा
- जमुना प्रसाद राही




मैंने अपनी ख़ुश्क आंखों से लहू छलका दिया
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए
- राहत इंदौरी

अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना
हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है
- बशीर बद्र




गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो
आँधियों तुमने दरख़्तों को गिराया होगा
- कैफ़ भोपाली



साहिल पे लोग यूं ही खड़े देखते रहे
दरिया में हम जो उतरे तो दरिया उतर गया
-अज्ञात 

मंज़िल तो सबकी एक ही है, रास्ते हैं जुदा,
कोई पतझड़ से गुजरा, कोई सहरा से गया।

किसी शजर के सगे नहीं हैं ये चहचहाते हुए परिंदे
तभी तलक ये करें बसेरा दरख़्त जब तक हरा भरा है
-नीरज 




फलदार था तो गांव उसे पूजता रहा 
सूखा तो क़त्ल हो गया वो बे-ज़बां दरख़्त 
-परवीन कुमार अश्क़

किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का
जो धूप छांव से रिश्ता बनाए रहता है
- अतुल अजनबी

इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा
ये आख़िरी दरख़्त बहुत याद आएगा
-अज़हर इनायती



ये सुब्ह की सफ़ेदियां ये दोपहर की ज़र्दियां
अब आईने में देखता हूं मैं कहां चला गया
- नासिर काज़मी

शहर क्या देखें कि हर मंज़र में जाले पड़ गए
ऐसी गर्मी है कि पीले फूल काले पड़ गए
- राहत इंदौरी

हवा के दोश पे उड़ती हुई ख़बर तो सुनो
हवा की बात बहुत दूर जाने वाली है
- हसन अख्तर जलील
 
हवा दरख़्तों से कहती है दुख के लहजे में
अभी मुझे कई सहराओं से गुज़रना है
- असद बदायुनी

नदी थी कश्तियाँ थीं चाँदनी थी झरना था 
गुज़र गया जो ज़माना कहाँ गुज़रना था 
- शहराम सर्मदी

है दरख़्तों की शायरी जंगल
धूप-छाया की डायरी जंगल 
- वर्षा सिंह


यादों का शहर देखो बिलकुल वीरान है
दूर-दूर न जंगल है न कोई मकान है  

दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था
-क़तील शिफ़ाई

फरमान से पेड़ पे कभी फल नहीं लगते
तलवार से मौसम कोई बदला नहीं जाता
-मुजफ्फर वारसी

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