Subhadra Kumari Chauhan Selected Hindi Poetry And Rahat Indori Ghazal Main Lakh Kah Doon - Hindi Shayari H


Subhadra Kumari Chauhan Selected Hindi Poetry And Indori Ghazal Main Lakh Kah Doon
Subhadra Kumari Chauhan  Hindi Poetry
 





देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं

धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं

मैं ही हूं गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं

कैसे करूं कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी

पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूं
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूं

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

 
परिचय

क्या कहते हो कुछ लिख दूं मैं
ललित-कलित कविताए
चाहो तो चित्रित कर दूं
जीवन की करुण कथाएं।
 
 
Subhadra kumari chauhan hindi kavita

सूना कवि-हृदय पड़ा है,
इसमें साहित्य नहीं है।
इस लुटे हुए जीवन में,
अब तो लालित्य नहीं है।

मेरे प्राणों का सौदा,
करती अंतर की ज्वाला।
बेसुध-सी करती जाती,
क्षण-क्षण वियोग की हाला।

नीरस-सा होता जाता,
जाने क्यों मेरा जीवन।
भूली-भूली सी फिरती,
लेकर यह खोया-सा मन।

कैसे जीवन की प्याली टूटी,
मधु रहा न बाकी?
कैसे छुट गया अचानक
मेरा मतवाला साकी?


हिंदी कविताएं

सुध में मेरे आते ही
मेरा छिप गया सुनहला सपना।
खो गया कहां पर जाने?
जीवन का वैभव अपना।

क्यों कहते हो लिखने को,
पढ़ लो आंखों में सहृदय।
मेरी सब मौन व्यथाएं,
मेरी पीड़ा का परिचय।
 

वेदना


दिन में प्रचंड रवि-किरणें
मुझको शीतल कर जातीं।
पर मधुर ज्योत्स्ना तेरी,
हे शशि! है मुझे जलाती।

संध्या की सुमधुर बेला,
सब विहग नीड़ में आते।
मेरी आँखों के जीवन,
बरबस मुझसे छिन जाते।
 
 
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएं
 

नीरव निशि की गोदी में,
बेसुध जगती जब होती।
तारों से तुलना करते,
मेरी आँखों के मोती।

झंझा के उत्पातों सा,
बढ़ता उन्माद हृदय का।
सखि! कोई पता बता दे,
मेरे भावुक सहृदय का।

जब तिमिरावरण हटाकर,
ऊषा की लाली आती।
मैं तुहिन बिंदु सी उनके,
स्वागत-पथ पर बिछ जाती।

खिलते प्रसून दल, पक्षी
कलरव निनाद कर गाते।
उनके आगम का मुझको
मीठा संदेश सुनाते।
 
 
 
Indori Ghazal Main Lakh Kah Doon Aakash Hoon Zameen Hoon Main

 

मैं लाख कह दूं कि आकाश हूं ज़मीं हूं मैं
मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूं मैं
 
अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को
वहां पे ढूंढ़ रहे हैं जहां नहीं हूं मैं
 
 
राहत इंदौरी ग़ज़ल

 
मैं आइनों से तो मायूस लौट आया था
मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूं मैं
 
वो ज़र्रे ज़र्रे में मौजूद है मगर मैं भी
कहीं कहीं हूं कहां हूं कहीं नहीं हूं मैं
 
वो इक किताब जो मंसूब तेरे नाम से है
उसी किताब के अंदर कहीं कहीं हूं मैं
 
 
rahat indori ghazal
 
सितारो आओ मिरी राह में बिखर जाओ
ये मेरा हुक्म है हालांकि कुछ नहीं हूं मैं
 
यहीं हुसैन भी गुज़रे यहीं यज़ीद भी था
हज़ार रंग में डूबी हुई ज़मीं हूं मैं
 
ये बूढ़ी क़ब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएंगी
मुझे तलाश करो दोस्तो यहीं हूं मैं
 
 

 

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