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Hindi Kahani Prem Kabootar प्रेम कबूतर

 

Hindi Kahani Prem Kabootar प्रेम कबूतर
 Prem Kabootar hindi Story



hindi kahani online prem kabootar

अजनबी तो वो कभी नहीं था, लेकिन इतना करीब भी कहाँ था. सभी के बीच भी तन्हाई का यह एहसास, पहले नहीं था. उसकी गली से गुज़रती तो मैं पहले भी थी, लेकिन अब एक अलग सी बेचैनी मेरा रास्ता रोक देती है. मेरे घर वो बचपन से आता था, लेकिन अब उसके जाने के बाद उसकी खुशबु ढूँढ़ती रहती हूँ. पहले सपने रातों को आते थें, अब सपनों में ही रहती हूँ.

अखिल को सदा से देखा था. प्रथम कक्षा से हम साथ ही थें. हमारा बचपन तिलियामुड़ा की इन गलियों में एक साथ खेलकर किशोर हुआ था. त्रिपुरा के इस छोटे से शहर में जीवन दौड़ता नहीं था, धीमी गति से चलता था. सूर्य और चंद्रमा का अनुपम तथा विलक्षण मिलन संध्या को आकर्षक बना देता था. बच्चों में मिट्टी से सन कर खेलने के प्रति आकर्षण आज भी जीवित था. कोई भी कहीं पहुंचने की शीघ्रता में नहीं था, जो जहाँ था, वहाँ प्रसन्न था.

मैं भी खुश थी, जीवन से संतुष्ट. लेकिन इस साल के आरंभ में बहुत कुछ बदल गया. हमारी वार्षिक परीक्षा समाप्त हो गयी थी. दसवी के क्लास आरम्भ होने में दस दिन का समय था. मेरी सहेली ने अपनी बड़ी बहन की शादी में मुझे बुलाया, तो मैं चली गयी. वहां अखिल भी था. काफी भाग-दौड़ कर रहा था. बार-बार हमारी नजरें मिल रही थीं. यूँ तो नजरें पहले भी कई बार मिली थीं, लेकिन इस बार जो मिलीं, मैं मंत्रमुग्ध सी उसे देखती रह गयी.
 

लंबा, गोरा, सुदर्शन, नहीं काफी सुदर्शन, नीले रंग की शर्ट और काली पैंट पहने हुये आकर्षक लग रहा था. मैं अखिल की तुलना में उतनी सुंदर नहीं थी. रंग सांवला. वैसे, लोग कहते थें, साँवली होने के बावजूद मैं सुंदर लगती हूँ. वैसे सुंदरता की परिभाषा मैं समझ नहीं पाती. मेरी लम्बाई पाँच फुट दो-ढाई इंच होगी. गोलाकार चेहरा, आंखें बड़ी-बड़ी, तीखा नाक-नक्श, चिकने होंठ, कंधें तक लंबें बाल, पेट के निचले हिस्से में चर्बी गायब है. कोई कहता है, स्वास्थ्य ठीक नहीं, कोई कहता है, ठीक ही तो है. वैसे मैंने पढ़ाई के अतिरिक्त कभी कुछ सोच ही नहीं था. अपने स्वास्थ्य, चेहरा, नाक-नक्श आदि को लेकर सोचना कभी सोच में भी नहीं आया था. लेकिन, उस रात घर लौटने के बाद आईने के सामने मैंने खुद को देखा. अपने साँवले रंग के कारण मन ही मन दुःख हुआ.

उस दिन हमारी कोई बातचीत नहीं हुयी, उसने मेरी ओर एक बार भी नहीं देखा. लेकिन इसके बाद छुट्टियों के वे दिन, मेरे लिये असह्य हो गये थें. अखिल को एक बार फिर देखने की इच्छा होती थी. बात करने का मन करता था. मैं पढ़ने में अच्छी थी. अपना काम भी समय पर पूरा कर लिया करती थी. मैथ्स और फिजिक्स में अखिल का हाथ जरा तंग था. इस कारण मेरी मदद लेने कभी-कभी घर आया करता था. लेकिन आजकल स्कूल बन्द होने के कारण, उसका भी यूँ आना बंद हो गया था.

मैं चुप रहने लगी थी. इसी बीच मैंने कुछ कविताएँ भी लिखीं. सारी की सारी अखिल को लेकर. कविता को डायरी को कोर्स की पुस्तकों के नीचे दबा के रखती, ताकि किसी के हाथ न लगे. हाथ लगते ही झमेला! मम्मी-पापा का तो सोचकर भी, मन डर जाता है। सम्पा दीदी तो अवश्य झमेला कर देगी. दीदी वैसे तो कॉलेज के प्रथम वर्ष में है लेकिन, प्रेम का सुख उसे प्राप्त ही नहीं हुआ. सब कहते हैं, वो सुंदर नहीं है. फिर वही, सुंदरता का अजीब मापदण्ड! लेकिन, प्रेम क्या मात्र शारीरिक होता है! प्रेम! तो क्या जो मुझे हो रहा था, वह प्रेम था! लेकिन, ये प्रेम कैसे हो सकता था, दोनों में कोई बातचीत नहीं, आँखों में आँखें नहीं, हाथों में हाथ नहीं, मात्र सपना है-यह कैसा प्रेम था!

मुझमें आ रहें परिवर्तन को मेरी माँ ने समझा. उन्होंने और पिताजी ने इसका इलाज भी निकाल लिया. मेरा नाम अपोलो कोचिंग सेंटर में लिखा दिया गया. आरम्भ में मैं कुछ खास प्रसन्न नहीं हुयी थी. लेकिन कोचिंग सेंटर के बैच नम्बर बारह की क्लास में घुसते ही, मेरा सिर अपनी माँ के प्रति श्रद्धा से झुक गया था. उस दिन मैंने जाना कि जो होता है, वह वाकई अच्छे के लिये ही होता है. जब बीरेन सर ने मुझे अखिल की पास वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया, मेरा कलेजा उछलकर हाथ में आ गया था.

 
सफेद शर्ट, नीली जीन्स, कोल्हापुरी चप्पल. क्या ख़ूब जँच रहा था. मैं उसे नहीं देख रही थी. सर जो कह रहे थें, वो लिखने की असफल कोशिश कर रही थी. और अखिल, वो मुझे भला क्यों देखेगा! लेकिन, क्लास समाप्त होने के बाद मैंने जाना कि, वो मुझे देख रहा था. मैं जन्म से एक घेरे में रहने वाली लड़की. छोटे से एक घेरे में मेरी दुनिया, जिसमें अब वो भी प्रवेश कर चुका था. दरअसल, एक बात मैं बहुत अच्छी तरह उस दिन समझ गयी कि प्रेम मेरे भीतर प्रवेश कर चुका है और अब मेरे जीवन में कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा.

ऐसा ही हुआ. शहर की ठंड में गर्मी घुलने लगी और मौसम के साथ हमारा रिश्ता भी गर्म होने लगा था. स्कूल में हम साथ रहतें और स्कूल के बाद घण्टों हाथ थामें तुरई फॉल के पास बैठें रहतें. यहाँ तक कि घर आकर भी जब मैं उसका होमवर्क कर रही होती थी, तो ऐसा लगता कि जैसे अखिल को छू रही हूँ. सब कुछ अजीब, लेकिन अच्छा लगता था.





मैं तो पापा के वॉलेट से बिना उनकी अनुमति लिये, पैसे निकाल लिया करती थी. मेरे सरल पापा थोड़े भुलक्कड़ भी थें, जिसका फायदा मुझे मिल जाया करता था.





मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे. हालाँकि अच्छे पद पर थें, इज्जत भी थी, लेकिन ईमानदार होने के कारण अथाह पैसा नहीं था. शिक्षा को महत्व देने वाले इस परिवार की मैं छोटी लड़की थी. मम्मी-पाप आम भारतीय अभिभावकों जैसे ही थें. मेरी आगामी बोर्ड परीक्षाओं के लिये परेशान. सम्पा दीदी के दिल्ली जाकर पत्रकारिता के कोर्स करने की जिद को लेकर परेशान. बड़े भैया की हर साल बढ़ती फीस को लेकर परेशान. दिनोदिन बढ़ती महँगाई और महँगी होती शिक्षा के बीच अपनी स्थिर कमाई का सामंजस्य बिठाते माँ-बाप, अपने बच्चों की मनोदशा को क्या पढ़ पातें!

बड़े भैया शिलांग से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थें. एक तरह से अच्छा ही हुआ जो वे यहाँ नहीं थें. भैया जानते ही चीख-चिल्लाकर घर को सिर पर उठा लेतें. वैसे जब सम्पा दीदी को पता चला था, हंगामा कम उसने भी नहीं किया था. उसने मुझे सलाह मिश्रित डाँट की कड़वी घुट पिलायी थी.

हुआ यूँ कि, उस शाम अखिल का मोमो खाने का मन कर गया था. अब अखिल कहे और मैं न करूँ, ऐसा तो हो नहीं सकता. लेकिन महीने के आखिरी दिन थें और मेरी जमा-पूँजी समाप्त हो चुकी थी. मम्मी से माँगने पर मात्र पैसा संचय करने पर ज्ञान प्राप्त होता, यह मुझे मालूम था. माँगने पर तो वैसे पापा भी यह ही देते, बल्कि कुछ अधिक ही. लेकिन पापा से माँगता ही कौन था!

मैं तो पापा के वॉलेट से बिना उनकी अनुमति लिये, पैसे निकाल लिया करती थी. मेरे सरल पापा थोड़े भुलक्कड़ भी थें, जिसका फायदा मुझे मिल जाया करता था. मैं अपने ही घर में चोरी करने लगी थी. कभी-कभी मेरी आत्मा मुझे कचोटा करती थी. लेकिन, ठीक उसी समय हृदय मुझे समझा लेता कि, प्रेम में सब जायज है. लेकिन उस शाम पापा भी घर पर नहीं थें.

हारकर मुझे दीदी से पैसे माँगने पड़े, और वहीं मुझसे गलती हो गयी. पैसे के लिये मेरी बैचैनी देखकर उसे मुझपर शक हो गया था. जब मैं उससे पैसे लेकर घर से निकली, तो यह जान ही नहीं पायीं कि वो भी मेरे पीछे-पीछे निकल आयी थी.

उसने मुझे अखिल के साथ अंतरंग होकर बैठे देख लिया. मेरे घर लौटते ही वो बिफर पड़ी थी.

दीदी ने कहा-“यह तेरा अखिल के साथ क्या चल रहा है?”

मैंने कहा-“मैं उससे प्यार करती हूँ”

-“प्यार करती हूँ मतलब!?”

-“प्यार करती हूँ, मतलब प्यार करती हूँ”

-“वो तुझे मूर्ख बना रहा है! तुझे दिखता नहीं है. अब मुझे समझ आया तू उसका होमवर्क क्यों करती रहती थी.तेरा जेबखर्च इतनी जल्दी कैसे समाप्त हो जाया करता था. अरे पागल वो तेरा इस्तेमाल कर रहा है.

-“ऐसा कुछ नहीं है! वो अगर पढ़ाई में थोड़ा कमजोर है तो क्या उसकी सहायता करना गलत है!दूसरी बात, उसके पापा की आमदनी उतनी नहीं है कि वो मुझपर खर्च कर सकें. बेचारा खुद ही शर्मिन्दा होता रहता है. और फिर प्यार में खर्च कौन करता है, वह इतना जरूरी नहीं होता. कहीं लड़की कर देती है, कहीं लड़का दीदी, तुम ऐसा कहोगी, मैं नहीं जानती थी. क्या हो गया फेमिनिज्म की उन सभी बातों का क्या वे सभी किताबी थीं”

-“अब इसमें फेमिनिस्म कहाँ से आ गया. आ गया तो सुन ही लो, समय बराबरी का है. लड़का हो या लड़की.यदि दोनों में से कोई भी एक अधिक खर्च करें, और दूसरा उससे बेझिझक करायें, तो समझ लेना चाहिये कि, यहाँ रिश्ता प्रेम का नहीं है, स्वार्थ का है”

-“तुम प्यार को क्या जानो”

-“पुतुल, तू सही कह रही है. मैं प्रेम को नहीं जानती! पर मैं उसे जानती हूँ और तुझे भी. उसके पिता की आर्थिक तू ठगी जा रही है”

-“मेरा भला-बुरा मैं देख लूंगी. तुम बस मम्मी से कुछ मत कहना”

इसके बाद हम दोनों के बीच एक चुप बैठ गया. दीदी ने किसी से कुछ नहीं कहा और मुझसे भी कहना छोड़ दिया.

मेरा समय, अखिल के साथ और उसके बाद, उसके साथ के एहसास के साथ बीतने लगा था. अखिल को नित नये उपहार देना मेरी आदत बन गयी. उसकी बाइक में तेल डलवाना तो मेरी जिम्मेदारी थी ही, कभी-कभी उसका फोन भी रिचार्ज कराना पड़ता था. हर दूसरे दिन अखिल का मन रेस्टुरेंट में खाने का हो जाया करता था. अखिल की प्रसन्नता मेरे लिये महत्वपूर्ण थी. उसकी उदासीनता मेरे लिये असहनीय थी. मुझे ऐसा लगता कि अखिल जैसे लड़के का मुझ जैसी लड़की को प्यार करना, एक एहसान हो; और मैं उसकी कीमत अदा कर रही थी. मैं यह समझ ही नहीं पा रही थी कि प्रेम व्यापार नहीं होता.

अखिल से निकटता बनाये रखने के क्रम में, मैं अपनी सहेलियों से दूर होती चली गयी. उनका क्रोध फब्तियाँ बनकर मुझपर बरसता था.





परीक्षा में मेरे प्रदर्शन से जहाँ मैं दुःखी थी, वहीं अखिल के व्यवहार में किसी भी प्रकार की संवेदना का अभाव था. दो दिन पहले परिणाम आया था.




नादिरा कहती-“पुतुल तो अखिल का बैंक बन गयी है”

मिठू कहती-“पुतुल कामधेनु गाय है जो अखिल के हाथ लगी है”

लेकिन मैं खुश थी.

उनके सभी मजाक पर अखिल के कहे वे प्रेम से भींगे शब्द भारी पड़ जाते थें-“पुतुल तुम मेरी जान हो.”

-“पुतुल हम लवर हैं”

‘लवर’, शब्द सुनकर बहुत अच्छा लगता. दिल करता उसके लिये सात समुद्र-तेरह नदियां, सभी पार कर जाऊं.

लेकिन प्रेम की कसौटी में छात्र जीवन कहाँ फिट बैठता है.

मेरी यूनिट टेस्ट का परिणाम आया और आशा के अनुरूप ही आया. यह परिणाम मेरे छात्र जीवन का सबसे बेकार परिणाम था. मम्मी-पापा तो सकते में आ गये थें. सहम तो मैं भी गयी थी! लेकिन परिणाम के कारण नहीं, अखिल के व्यवहार के कारण.

परीक्षा में मेरे प्रदर्शन से जहाँ मैं दुःखी थी, वहीं अखिल के व्यवहार में किसी भी प्रकार की संवेदना का अभाव था. दो दिन पहले परिणाम आया था. तब से आज तक उसने मात्र दो बार फोन किया था. एक बार उसका फोन रिचार्ज कराने के लिये और दूसरी बार रिचार्ज प्लान बताने के लिये.

जब मैंने अपना दर्द उससे बाँटना चाहा तो बोला-“अरे यार.पढ़ना चाहिये था! अब रोकर क्या फायदा! चियर अप”

वो मुझे पढ़ने पर सुझाव दे रहा था, जिसने आजतक बिना मेरी सहायता के एक परीक्षा भी पास नहीं की थी!

मैं शाम को बरामदे में उदास बैठी थी.

मम्मी मेरे पास आयीं और बोलीं-“तुम आजकल कहाँ गायब रहती हो!”

-“कही नहीं.”

-“तुम परसो कहाँ गयी थी?”

-“नादिरा के घर. क्यों?”

-“ये फोन पर इतना क्यों लगी रहती हो?”

-“मम्मी, ये क्या हैं!?”

-“सुनो, मुझसे मत छिपाओ. तुम्हारा हाव-भाव आजकल कुछ ठीक नहीं लग रहा. पापा को तुम्हारे मार्क्स से धक्का लगा है. बेटा, शिक्षा वह पतवार है जो हर तूफान से तुम्हें निकाल लेगी. दिन-भर सोचते रहने से क्या होगा! जो गलत कर रही हो, उसे सुधारो!”

मम्मी की बात सुनकर मैं अंदर ही अंदर चौंक गयी. कहीं इन्हें सन्देह तो नहीं हो गया. मेरे होठों से कुछ नहीं निकला. सिर झुकाए बैठी रही. तभी दीदी आ गयी थीं.

-“तुम जाओ मम्मी, मैं इससे बात करती हूँ”

मम्मी चली गयी थीं. दीदी मेरे पास आकर बैठ गयी. कुछ समय तक हमारे बीच का चुप बोलता रहा और हम खामोश बैठे रहें.

फिर न जाने क्या सोचकर मेरे केशों को सहलाते हुये दीदी बोली थीं-“पुतुल, क्या हुआ”

यदि वे डांटती, तानें देतीं अथवा मेरी हँसी उड़ातीं; तो मैं झेल लेती. किन्तु उनकी प्रेम मिश्रित चिंता के स्वर ने मुझे तोड़ दिया. मैं उनके गले लगकर रो पड़ी थी.

-“दीदी, कुछ समझ नहीं आ रहा! उसका व्यवहार कष्ट दे रहा है. अपनी मूर्खता भी नजर आ रही है. लेकिन फिर भी दिल में कुछ फँसा हुआ है.”

-“अब क्या कह रहा है”

“कल उसका जन्मदिन है. मुझे बुला रहा है”

-“ह्म्म्म!” दीदी ने मात्र इतना ही कहा और फिर कुछ सोचने लगी थीं.

मैं थोड़ी लज्जित होकर बोली-“वैसे यह गलत भी नहीं है. जन्मदिन पर अपनी गर्लफ्रैंड को तो बुलायेगा ही मैं भी क्या-क्या सोचने लगती हूँ”

दीदी ने मेरे कंधें को हिलाते हुये बोला-“वो तुझे पार्टी के लिये बुला रहा है वो वो स्वार्थी तेरे ऊपर खर्च करेगा  मैं नहीं मानती.”

-“तो फिर मेरे साथ चलो और स्वयं फैसला कर लो .अब तो मैं भी देखना चाहती हूँ.आज सब कुछ सामने होगा.”

मेरी इस बात पर दीदी बोली कुछ नहीं, मात्र मुस्कुरा दी थी.

अगले दिन सज-धजकर करीब साढ़े-बारह बजे मैंने और सम्पा दीदी ने ऑटो लिया. ऑटो वाले को खोखन कॉफी हाउस चलने को कहा. वैसे भी कोई गली-कूची तो थी नहीं. हम समय पर पहुंच गये थें.

अखिल गेट पर ही खड़ा था. मुझे देखते ही लपका लेकिन, दीदी को देखकर ठिठक गया.

मैं कुछ कहती इससे पहले ही दीदी बोल पड़ी थीं-“हैप्पी बर्थडे अखिल! तुमसे मिलना तो था ही, इसलिये जब सुना कि आज तुम्हारा बर्थ डे है तो मैं भी पुतुल के साथ चली आयी. तुम्हें बुरा तो नहीं लगा!”

अखिल का चेहरा प्रसन्न तो नहीं लग रहा था. लेकिन उसने कहा-” ऐसी कोई बात नहीं है. यु आर मोस्ट वेलकम!”

मैंने भी आगे बढ़ अखिल को गले लगाकर जन्मदिन की शुभकामनाएं दी. हमने एक साथ ही कैफ़े के भीतर प्रवेश किया. लेकिन भीतर पहुँचते ही मैं चौंक पड़ी थी.

वहाँ अखिल के कई मित्र खड़ें मुस्कुरा रहे थें. उनमें से कई लड़कों को तो मैं जानती भी नहीं थी. लेकिन उनकी नजरों से बरसती बेशर्मी की अग्नि मुझे जला रही थीं. मैंने सम्पा दीदी की तरफ देखा. वे भी मुझे ही देख रही थीं.

दीदी धीमे से मेरे कानों में बोलीं-“तुमने तो कहा था, सिर्फ तुम और अखिल हो इस पार्टी में!”

-“मुझे भी अभी-अभी पता चला!”

तभी उन लड़कों में से एक बोला-“अरे अखिल, इन दोनों में तेरी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी कौन सी है!” उसके इतना कहते ही अन्य लड़कें हँसने लगे थें. मेरी गर्दन शर्म से झुक गयी.

अखिल मेरे बचाव में आने का नाटक करते हुये बोला-“अरे गधों इसे प्यार कहते हैं. तुम्हें पुतुल जैसी कोई नहीं मिली, इसलिये जल रहे हो! अब चुप करो सब”

मेरा मोह भंग हो चुका था. सत्य मेरे सामने था. मैं एक पल भी वहाँ नहीं रुकना चाहती थी. लेकिन दीदी ने मुझे रुकने का इशारा किया और मुझे रुकना पड़ा था.

उसके बाद केक कटा, डांस हुआ. जम कर खाना-पीना हुआ. फिर आया बिल देने का समय. वेटर बिल लेकर आया और जैसा कि उसे समझाया गया था, उसने बिल मेरे सामने रख दिया.

अखिल बेशर्मी से हँसते हुये बोला-“मेरी पुतुल ऐसी ही है. मुझे खर्च करने ही नहीं देती!”

बहुत देर से मेरी दायीं हथेली को सम्पा दीदी ने अपनी हथेली में पकड़ रखा था, जैसे मेरी पीड़ा और क्रोध की उफनती नदी पर उन्होंने एक बाँध बना रखा हो. लेकिन अखिल के इतना कहते ही, उन्होंने मेरी हथेली को हल्का सा दबाकर छोड़ दिया था. मैं समझ गयी थी.

मैंने बिल को उठाया और अखिल के सामने रख दिया-“अरे ! ऐसा कैसे! बर्थ डे तुम्हारा तो पार्टी भी तुम ही दोगे, मैं क्यों दूँ! वैसे भी आज मैंने सोचा तुम्हारी सभी शिकायतें दूर कर दूँ! चलो, आज जी भरकर खर्च कर लो! मैं कुछ नहीं बोलूंगी!

फिर सम्पा दीदी बोलीं-“अच्छा हम चलते हैं! घर पर मेहमान आने वाले हैं तो मम्मी ने घर जल्दी आने बोला है. थैंक्स फ़ॉर लवली पार्टी!”

इतना कहकर हम कॉफी हाउस से बाहर निकले ही थें कि, जैसा हमारा अनुमान था अखिल चिल्लाता हुआ हमारे पीछे आया. मैं उसे आता हुआ देख रही थी लेकिन मेरा हृदय भावनाशून्य था. जो चेहरा कभी मुझे प्रिय था, आज कुरूप प्रतीत हो रहा था.

अखिल मेरे करीब आकर गुस्से में बोला-“तुम मुझे ब्रेकअप करने को मजबूर कर रही हो!”

मुझे उसके इस अहंकार पर क्रोध भी आ रहा था और हँसी भी. लेकिन मैं कुछ बोली नहीं. उस पर एक व्यंग्यात्मक तीखी मुस्कान का प्रहार करके आगे बढ़ने को ही थी कि उसने मेरी कलाई पकड़ ली.

-“मैं मजाक नहीं कर रहा! मैं तुम्हें छोड़ दूँगा!”

मैंने अपनी कलाई पर कसी उसकी मुट्ठी को एक झटके में हटा दिया और फिर बोली-“मजाक तो मैंने भी नहीं किया है! घमण्ड के काले बादल जो तुम्हारी आँखों पर छाये हुये हैं, उनके कारण तुम शायद देख नहीं पाये होंगे कि प्रेम कबूतर तो कब का उड़ चूका है!”

इतना कहने के बाद हम दोनों बहनें घर आकर नेटफ्लिक्स पर आयी एक नयी सीरीज देखने में व्यस्त हो गये थें.

वहाँ अखिल के साथ क्या हुआ, कॉफी हाउस के मैनेजर ने उसके और उसके दोस्तों के साथ क्या किया और अखिल को उसके दोस्तों से उपहार में क्या मिला, यह मैं पाठकों की कल्पनाशक्ति पर छोड़ती हूँ.

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