दर्द का रिश्ता Dard Ka Rishta Kahani In Hindi Part 1-6 Hindi Shayarih सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दर्द का रिश्ता Dard Ka Rishta Kahani In Hindi Part 1-6 Hindi Shayarih

 दर्द का रिश्ता Dard  Ka Rishta Kahani In Hindi


कोरोना में अपनों को खो देने के बाद अपूर्वा की सासूमां में अचानक आए बदलाव से वह हैरान थी। आखिर ऐसा क्या हो गया था कि वे दकियानूसी सोच को छोङ आधुनिक जमाने की सासूमां बन गई थीं...

दर्द का रिश्ता Dard  Ka Rishta Kahani In Hindi Part 1-6
दर्द का रिश्ता



लेखिक–  डा. रंजना जायसवाल

“कितनी बार समझाया था तुझे इकलौती लड़की से शादी मत कर पर तुझ पर तो प्यार का भूत सवार था. न आगे नाथ न पीछे पगहा… मांबाप के मरने के बाद तेरी ससुराल भी खत्म हो जाएगी…सुखदुख में खड़ा होने वाला भी कोई न रह जाएगा. हम कोई जिंदगीभर जिंदा थोड़ी बैठे रहेंगे.”

“मां, कैसी बात करती हो, मैं भी तो इकलौता ही हूं.””तेरी बात अलग है, तू लड़का है. अपूर्वा को देख अपने साथ दहेज में कुछ भी न लाई पर मांबाप की जिम्मेदारी जरूर ले आई.”

“मां, ऐसा न कहो, यह बात तो हम पहले दिन से जानते थे. वैसे भी अपूर्वा से शादी का निर्णय मेरा था फिर दानदहेज की बात कहां से आ गई. अपूर्वा ने शादी के पहले ही मुझे स्पष्ट शब्दों में यह बात कह दी थी.शादी के बाद उस के मातापिता की जिम्मेदारी वही उठाएगी.”

साधनाजी का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. समर की हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वह उन की तरफ नजर उठा कर देखे.”वाह रे जमाना, हमारे जमाने में लड़की के मांबाप बेटी के घर का पानी तक नहीं पीते थे और यह साहब अपने ससुर को यहां लाने को सोच रहे हैं. क्या कहेंगे लोग…”

“मां, लोगों की मैं परवाह नहीं करता. जब पापा बीमार पड़े थे तो अपूर्वा के पापा ने कितनी मदद की थी भूला नहीं हूं मैं… जिन लोगों की आप बात कर रही हैं वे तो झांकने भी नहीं आए थे. मां, जैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे हर बात के भी तीन पहलू होते है आप का, उन का और सच. कभी सुनीसुनाई बात पर भरोसा मत कीजिए.”

“आ गए ससुराल के वकील बन कर…” “मां, वकील बनने की बात नहीं है, उन का हमारे सिवा है ही कौन? आप ही बताइए इस उम्र में वे भला कहां जाएंगे.” “भाड़ में जाओ तुम…लोगों को कुल्हाड़ी पैर पर मारते देखा था पर जब कोई पैर ही कुल्हाड़ी पर मारने को आतुर हो तो उस को क्या कहना और क्या समझाना.”


अपूर्वा 1 महीने से यह नाटक देख रही थी. कोरोना महामारी ने उस की मां को लील लिया था. अजयजी इस भरी दुनिया में बिलकुल अकेले पड़ गये थे. फोन पर वे कुछ भी न कह पाते पर उन की आवाज में उन का अकेलापन उसे महसूस हो जाता था.इस मशीनी युग में इंसान वैसे भी कितना अकेला था, ऊपर से इस महामारी ने इंसान को बिलकुल ही अकेला कर दिया था. साधनाजी दिल की बुरी नहीं थीं, पिछले साल कोरोना की वजह से उन्होंने अपने पति को खो दिया था. बस तभी से एक अजीब सी झुंझलाहट उन के व्यवहार में आ गई थी. उन्हें हमेशा यही लगता था कि शायद उन की सेवा, उन के देखरेख में कहीं कुछ कमी रह गई थी शायद इसलिए वे…साधनाजी का दर्द समर और अपूर्वा अच्छी तरह से समझते थे. आखिर उन्होंने भी तो अपने पिता को खोया था.

इंसान की जवानी घरपरिवार की जिम्मेदारियों में ही गुजर जाती है पर बुढ़ापा जब एकदूसरे के साथ की सब से ज्यादा जरूरत होती है, उस में से कोई एक हाथ छुड़ा कर चला जाए तो जीवन पहाड़ की तरह लगने लगता है. साधनाजी इन दिनों उसी दौर से गुजर रही थीं.

अपूर्वा जानती थी की यह सब इतना आसान नहीं था पर…बात सिर्फ मम्मीजी की नहीं थी, पापा को समझाना क्या इतना आसान था?

अपूर्वा और समर ने प्रेमविवाह किया था, दोनों ही परिवार इस रिश्ते, इस शादी के लिए तैयार नहीं थे पर बच्चों की जिद के आगे उन्होंने घुटने टेक दिए. वक्त के साथ सबकुछ ठीक होने लगा था पर संकोच की दीवार तब भी उन के आड़े आ ही जाती थी. पिछले साल समर के पापा को जब कोरोना हुआ था तो अपूर्वा की मां दोनों वक्त  फोन कर के साधनाजी को सांत्वना देतीं. अपूर्वा के पापा ने भी समर का हर कदम पर साथ दिया. कभीकभी जब वह निराशा से टूटने लगता तो वह उस की हिम्मत बन कर खड़े हो जाते.समर के लाख मना करने पर भी उन्होंने अपूर्वा के अकाउंट में यह कर पैसे डाल दिए,”बेटा, सबकुछ तुम लोगों का ही है, आज वक्त पर यह पैसे न काम आए तो फिर उन के होने का क्या फायदा…”


समर ने उन के आगे हथियार डाल दिए, जानता था पापाजी के पास इस पैंशन के पैसे के अलावा धन आने का कोई जरीया नहीं था…कमाने को तो वे दोनों भी कमा ही रहे थे पर लौकडाउन के चलते तनख्वाह 50% कट कर मिल रही थी. समर के पापा के इलाज में पैसा पानी की तरह बह रहा था, पैसे की जरूरत तो समर को वाकई में बहुत थी पर वो उन से मांग वह अपूर्वा की नजरों में छोटा नहीं होना चाहता था. उस ने दोस्तों से पैसे का जुगाड़ करने की कोशिश की पर सब के हालात एकजैसे ही थे.








जिस व्यक्ति ने इतने विकट समय में उस का साथ दिया था, आज वह उन्हें भला अकेला कैसे छोड़ सकता था. खून का न सही पर इंसानियत का रिश्ता तो था ही…अपूर्वा इन दिनों चुप सी रहने लगी थी. समर जानता था उस चुप्पी की वजह पर उस चुप्पी को तोड़ कर उस तक पहुंच पाना इन दिनों उसे मुमकिन लग रहा था.

घर के कामों को निबटा कर अपूर्वा कमरे में दाखिल हुई,”सो गए क्या?” “नहीं तो…तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.” “कुछ कहना था तुम से..!” “हां बोलो, तुम्हें बात करने के लिए कब से इजाजत की जरूरत पड़ गई.” कमरे की लाइट बंद थी पर चांदनी रात में रौशनी परदे से छन कर आ रही थी. कमरे के बाहर नीम की डालियों पर चांद अटका हुआ था. हवा से उड़ते परदे से लुकाछिपी करती रौशनी में अपूर्वा का चेहरा साफसाफ दिखाई दे रहा था. इन बीते  1 महीने में उस का नूर न जाने कहां खो गया था. हिरनी सी आंखों की चंचलता न जाने कुलांचे मारते उदासी के किस अरण्य में गुम हो गई थी.रूखेसूखे बाल, माथे पर एक छोटी सी बिंदी, समर न जाने क्यों हिल सा गया. अपूर्वा सिर्फ उस की पत्नी नहीं…उस का प्यार… उस की दोस्त भी थी. वह उस का दर्द अच्छी तरह से समझता था… आखिर उस दर्द को पिछले साल उस ने भी तो झेला था.

शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब अपूर्वा ने अपनी मां से बात न की हो.औफिस हो या घर ठीक 11 बजे उसे मां को फोन करना ही होता था. मां को भी आदत सी हो गई थी. 10-15 मिनट भी आगेपीछे होता तो वे खुद ही फोन कर देतीं, कई बार तो घबरा कर उन्होंने समर को भी फोन मिला दिया था.

“समर बेटा, सब ठीक है न? अपूर्वा का आज फोन नहीं आया, कहीं तुम लोगों की…” और समर खिलखिला कर हंस पड़ता,”मम्मी, मुसीबत मोल लेनी है क्या मुझे, आप की बेटी से कोई लड़ सकता है क्या?” “वह आज उस का फोन नहीं आया न… कई बार मिला चुकी हूं, पता नहीं क्यों बंद बता रहा है.”


” दरअसल, वह मीटिंग में होगी, आज उस की कोई महत्त्वपूर्ण मीटिंग थी इसलिए फोन बंद है. आप चिंता न करें जैसे ही फ्री होती है मैं उस से कहता हूं आप से बात करने के लिए…” “ठीक है बेटा.”

और वे खट से फोन काट देतीं, कभीकभी बड़ा अजीब लगता था.आखिर यह मांबेटी रोजरोज क्या बात करती होंगी. अपूर्वा टूट सी गई थी, मां के अंतिम दर्शन करने की अनुमति नहीं मिली थी. उसे हमेशा यही लगता बस फोन की घंटी बजेगी और मां बोलेगी… “अप्पू, कहां थी बेटा सब ठीक है न..”

पर मां नहीं थी, कही नहीं थी. वे तो सफेद बादलों के पार सारे बंधन तोड़ कर दूर बहुत दूर चली गई थी. क्या इतना आसान था उन का जाना… अस्पताल में मुंह में मास्क लगाए अपनी उखड़ती हुई सांसों को संभालने की उन की नाकाम कोशिश ने उन के हौसले को टूटने नहीं दिया था पर उन की सांसों की लड़ी एक दिन टूट ही गई.

हर बार वह यही कहती,”समर बेटा, अपूर्वा को संभालो, मैं बिलकुल ठीक हूं. जल्दी घर वापस आ जाऊंगी. फिर हम सब बोटिंग करने चलेंगे, अब यहां घाट पर बहुत साफ सफाई रहने लगी है.” उन्हें क्या पता था हम नाव पर जाएंगे उन के साथ पर उन के जीवित रहते नहीं उन की मौत के बाद… अपूर्वा हमेशा बताती थी कि मां बहुत अच्छा तैरना जानती थीं. मां आज भी तैर रही थीं इस क्षणभंगुर दुनिया को छोड़ कर सारे बंधन को तोड़ कर वे पानी के प्रवाह के साथ दूर बहुत दूर तैरती बहती जा रही थीं. समर विचारों के भंवर में डूबउतर रहा था. इंसान जीवनभर ख्वाहिशों के बोझ तले डूबताउतराता रहता है, देखा जाए यह ख्वाहिशों का बोझ उतर जाए तो वह ऐसे ही पानी में उतराता रहेगा जैसे आज मम्मीजी के अस्थि अवशेष पानी पर तैर रहे थे. न जाने क्या सोच कर समर की आंखें भर आई थीं. पिछले साल इसी तरह उस ने नदी के शीतल जल में अपने पापा के अवशेष को इन्हीं हाथों से प्रवाहित किया था.



लौबी में लगी घड़ी ने 11 बजने का संकेत दिया. अपूर्वा की आंखें घड़ी की तरफ चली गई और उस की आंखों से आंसू की बूंदें टपक गईं. “समर, कल मैं पापा के पास जा रही हूं.” “यों अचानक… अपूर्वा इस माहौल में घर से निकलना ठीक नहीं, मैं 2 लोगों को खो चुका हूं. बस अब और नहीं…”

 

“समर, वह पापा…” “क्या हुआ अपूर्वा, सब ठीक है न? अभी परसों ही तो बात हुई थी मेरी उन से…”समर न जाने क्यों बेचैन हो गया, वह अपूर्वा के पास सरक आया. उस ने अपूर्वा के हाथों को अपने हाथों में ले लिया. अपूर्वा की रूलाई छूट गई.”समर, वह आज बगल वाली जूली आंटी का फोन आया था.”

“जूली आंटी? तो क्या हुआ कोई खास बात?””आज सुबह चाय बनाते वक्त पापा के हाथों से गरम चाय का भगोना छूट गया.””अरे…जले तो नहीं?””हाथ पर फफोला पड़ गया है.””ओह…””आज शाम पापा से बात हुई, जानते हो वे क्या कह रहे थे…”समर ने अपूर्वा के चेहरे की तरफ ध्यान से देखा.

“तेरी मां ने कभी मुझे 1 पानी का गिलास भी नहीं उठाने दिया और आज देख मेरी क्या दशा हो रही है.आज तेरी मां की बहुत याद आ रही.इस से अच्छा होता कि मैं भी उन के साथ चला गया होता.”अपूर्वा फूटफूट कर रो पड़ी, समर की आंखें भीग गईं.”समर, मैं उन्हें इस हाल में अकेला नहीं छोड़ सकती. मैं कल उन्हें लेने जा रही.”

समर के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं, मां का व्यवहार देख कर वह सोच नहीं पा रहा था कि इस बात को वह किस तरीके से लेंगी. अपूर्वा समर के चेहरे को देख कर उस की मनोस्थिति को समझ गई थी. वह जानती थी कि मम्मीजी को मनाना इतना आसान नहीं था पर निर्णय तो लेना ही था. आखिर पापा को यों अकेले नहीं छोड़ सकती थी.

“समर, आप यहां संभाल लेना, मैं ने ड्राइंगरूम के बगल वाला कमरा ठीक कर दिया है. पापा अब वहीं रहेंगे.” “और मां?”







“मां, अपने कमरें में ही रहेंगी, जानती हूं पापा का आना उन्हें अच्छा नहीं लगेगा. इसलिए उन के कमरे से थोड़ा दूर ही रखा है जिस से बहुत ज्यादा आमनासामना न हो.”जब रहना एक ही घर में है तो क्या दूर क्या पास…”

“समर, समझती हूं यह सब इतना आसान नहीं है पर मैं भी क्या कर सकती हूं. मैं ने तो शादी के पहले ही…” “एक ही बात कितनी बार कहोगी…” समर न जाने क्यों झुंझला सा गया, “मां को बताया है तुम ने?”

“हां, उन से इतना कहा है कि कल पापा के पास जा रही हूं.” “और उन को साथ लाने की बात?” “नहीं.” “वही तो मैं सोचूं, आज शाम को मां इतनी चुपचुप क्यों थीं. खाना भी ठीक से नहीं खा रही थीं.” “समर, मुझे लगता है कि उन्हें अंदाजा है. आज जब मैं पापा के लिए कमरा सही कर रही थी तो आसपास ही घूम रही थीं. एक अजीब सी बेचैनी थी उन के व्यवहार में.”

“कुछ कहा उन्होंने?” “कहा तो कुछ भी नहीं पर उन का मौन बहुत कुछ कह रहा था. समर, मैं समझती हूं इतना आसान नहीं है यह सब पर और कोई रास्ता नहीं…मेरे फैसले में तुम हो न मेरे साथ?” अपूर्वा ने समर की आंखों में अपने प्रश्न का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की…समर ने अपूर्वा के चेहरे पर लटक आई अलकों को अपनी उंगलियों से पीछे करते हुए कहा,”मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं.”

रात गहराती जा रही थी. दोनों की आंखों मे नींद नहीं थी. एक अजीब सी कशमकश दोनो के मनमस्तिष्क में घूम रही थी. आने वाले दिन न जाने कैसे होंगे, अपूर्वा साधनाजी के उठने से पहले ही मायके के लिए निकल गई. शादी के बाद ऐसा शायद उस ने पहली बार किया था. घर का कोई भी सदस्य साधनाजी से कहे बिना नहीं जाता था पर न जाने क्यों एक अनजान सा डर उस को जकड़े हुआ था.


अपूर्वा मृदुलाजी के जाने के बाद पहली बार घर आई थी. लौकडाउन की वजह से एक शहर से दूसरे शहर जाना इतना आसान नहीं था. कितने हाथपैर जोड़े थे उस ने… घर के दरवाजे पर लगा तुलसी का चौरा सूख गया था. शायद अपनी देखभाल करने वाली गृहस्वामिनी के जाने का वस आज तक मातम मना रहा था. उसी के बगल में पड़ा आज का ताजा अखबार हवा में फड़फड़ा रहा था.बरामदे की लाइट अभी तक जल रही थी. अपूर्वा ने कलाई में बंधी घड़ी पर नजर डाली,’9 नौ बजे गए हैं. पापा तो 6 बजे ही जग जाते हैं फिर मौर्निंग वाक…सब ठीक है न कहीं कुछ…’

उस ने घबरा कर घंटी की तरफ हाथ बढ़ाया. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं, एक अनजाने डर से उस का चेहरा पीला पड़ गया, अपूर्वा ने एक बार फिर घंटी बजाई और अपने कान दरवाजे पर चिपका कर सुनने की कोशिश करने लगी. अंदर सन्नाटे को चीरती किसी के पैरों की आहट से अपूर्वा के चेहरे पर एक सुकून पसर गया. अपूर्वा का ड्राइवर सामान रखने लगा,”भाभी, अब कब आना है?”

“दिनेश भैया, मैं आप को फोन कर के बता दूंगी. साहब से जा कर पैसे ले लीजिएगा.””अच्छा भाभी, चलता हूं.”2 बार “अच्छा भाभी चलता हूं” कहने के बाद भी दिनेश वहीं खड़ा रहा. अपूर्वा समझ गई दिनेश कुछ लिए बिना खिसकने वाला नहीं. उस ने पर्स खोला और एक कड़क 100 का नोट पकड़ा दिया. दिनेश का चेहरा चमक उठा. अपूर्वा दरवाजे की तरफ मुड़ी, शायद किसी ने सिटकनी खोली थी, इंटरलौक 3 बार खटखट कर के खुल गया. सामने दूध का भगौना लिए अजयजी खड़े थे, शायद घंटी की आवाज सुन कर ही उन की नींद खुली थी.

“कितनी बार कहा है रामलाल थोड़ी देर से आया कर, बस अभीअभी नींद लगी ही थी.”‘कितने दुबले लग रहे थे पापा…’ अपूर्वा मन ही मन बुदबुदाई… 1 महीने में अजयजी के चेहरे की वे रौनक न जाने कहां गुम हो गई थी.अपूर्वा की आंखें छलछला आईं.”अरे अप्पू तू…सब ठीक है न यों अचानक कैसे? समर और भाभीजी सब ठीक हैं न…””सब दरवाजे पर ही पूछ लेंगे या अंदर भी आने देंगे पापा…”


मृदुलाजी तसवीरों में मुसकरा रही थीं, स्वागत करने वाले हाथ बाट जोहती वे दो जोड़ी आंखें दूसरी दुनिया में जा चुकी थीं. अजयजी और मृदुलाजी की तसवीर बैठक में आज भी मुसकरा रही थी, जैसे कहना चाहती हो हम तो हमेशा साथ थे और रहेंगे.

“तू अचानक कैसे आ गई अप्पू?””पापा, अपने घर आने के लिए क्या सोचना…”अजयजी ने भरसक मुसकराने का प्रयास किया, पर वे निश्छल हंसी कहीं गुम हो गई थी. घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, एक ऐसा सन्नाटा जो कभी भी टूटने वाला नहीं था. अपूर्वा हमेशा की तरह आंगन के झूले में आ कर बैठ गई.कितनी यादें जुड़ी थी इस झूले से, मां इसी झूले पर बैठ कर उस को खाना खिलाया करती थीं, पापा से रूठ कर वह यहीं तो लेट जाती थी और मां अपनी गोद में उस का सर रख कर उस को कहानियां भी यहीं सुनाया करती थीं.

मां के पास उस की बात हर परेशानी का हल था. कालेज में एक लड़के ने उस के ऊपर एक भद्दा सा फिकरा कस दिया था, इसी झूले पर बैठ कर तो मां ने कितने घंटों तक उसे दुनियादारी समझाई थी.समर के विषय में जब उस ने मां को बताया था तब भी तो वे यहीं बैठी थीं.उफ्फ…अपूर्वा ने एक गहरी सांस ली.किचन की खटरपटर से वे यादों की परिधि से बाहर आ गई. अजयजी ने पानी का गिलास उस की ओर बढ़ाया,”अपूर्वा, जल्दी से हाथमुंह धो ले, मैं तेरे लिए बढ़िया चाय बनाता हूं. तुम ने पहले नहीं बताया वरना मैं कमला को जल्दी बुला लेता वह तो दोपहर के खाने के समय ही आएगी.”

“और नाश्ता?””नाश्ता… नाश्ते का क्या है, कभी ओट्स, कभी कौर्नफ्लैक्स खा लेता हूं.””पर पापा आप






अपूर्वा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अजयजी बोल पड़े,”बेटा, अब इस उम्र में कुछ पचता नहीं है,”अजयजी ने नजरें चुराते हुए कहा. अपूर्वा जानती थी कि झूठ बोलना पापा के बस की बात नहीं. आज से 1 महीने पहले तक मां पापा के लिए उन की पसंद की हर चीज बनाती थीं.कभी आलू के परांठे, कभी सैंडविच, कभी कटलेट…फैमिली डाक्टर ने कई बार कहा,”अंकलजी, पौष्टिक खाना खाया करिए ओट्स, कौर्नफ्लैक्स, दलिया…” और अजयजी हर बार उन की बात हंसी में उड़ा देते.

“यह मरीजों का खाना खाना मेरे बस की बात नहीं, कभी मेरी पत्नी के हाथ का खाना खा कर देखिए सब भूल जाएंगे.”जिस आदमी को मां ने जीतेजी एक गिलास पानी नहीं उठाने दिया आज वे…अपूर्वा का दिल छलनी हो गया.

“पापा, 1 मिनट आप का हाथ…””अरे, कुछ नहीं बताया तो था कल वह चाय बनाते वक्त थोड़ी छलक गई थी. कुछ नहीं 2 दिन में ठीक हो जाएगी.”अजयजी ने अपने हाथ को पीछे छिपाने की कोशिश की पर अपूर्वा ने जबरदस्ती उन के हाथ को खींच कर आगे कर लिया. वे दर्द से कराह उठे. चेहरे पर दर्द की टीस उभर आई.उन के हाथों में बड़ेबड़े फफोले देख कर उस की आंखें भर आईं. दाढ़ी बनाते वक्त एक हलकी सी खरोंच लग जाने पर पूरा घर सिर पर उठा लेने वाले अजयजी आज दर्द के साथ जीना सीख रहे थे. अपूर्वा ध्यान से उन के चेहरे पर दर्द की लकीरों को पढ़ने की कोशिश करती रही. उस दर्द को पढ़ने के आगे वर्षों की पढ़ाई और डिग्रियां भी फेल हो गई थीं. अपूर्वा को बारबार लगता कि मां अभी किसी कमरे से बाहर निकलेंगी और बोलेंगी,”देख रही अप्पू, तेरे पापा अपना हाथ जला बैठे,:कितनी बार समझाया था कि कुछ काम करना सीख लीजिए, काम ही देगा. कल को बीमार पड़ गई या मुझे कुछ हो गया तो 1 कप चाय को तरस जाएंगे.”

अपूर्वा को लगा वह जारजार कर के रो पड़े,’मां, तुम कहां हो देखो न तुम्हारे बिना हम सब का क्या हाल हो गया है. आ जाओ मां, वापस आ जाओ. अपूर्वा अपने आंसुओं को छिपाने गुसलखाने में घुस गई. बहुत देर तक वह पानी से अपने मुंह को धोती रही. पानी की शीतल तासीर ने उस के मनमस्तिष्क में चल रहे विचारों के तूफान को थामने का प्रयास किया.


“पापा, कमला को फोन मिलाइए कब तक आएगी.””मेरे पास उस का नंबर नहीं है. तेरी मां ही यह सब देखती थी.””मां का फोन कहां है? उसमें नंबर होगा.””तेरी मां की अलमारी में रखा है पर वह तो डिस्चार्ज हो गया होगा. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. उसे इस्तेमाल करने वाली ही नहीं रही तो मैं क्या करता.”

अपूर्वा महसूस कर रही थी कि पापा हर बात में मां को ही ढूंढ़ रहे थे. उस ने अलमारी खोली, मां के बदन की खुशबू आज भी उन के कपड़ों से आ रही थी. 1-1 साड़ी उसे अजनिबियत से देख रहे थे, मानों पूछना चाहते हों कि मुझे पहनने वाली कहां है उसे बुलाओ…मां के हाथों के काढ़े रुमाल के बगल में मोबाइल रखा हुआ था. पिछले साल उन के जन्मदिन पर पापा ने उपहार स्वरूप दिया था.कितना भुनभुनाई थीं वे,’अब इस बुढ़ापे में यह सब चोंचलेबाजी अच्छी नहीं लगती.’

शुरूशुरू में कितनी दिक्कत हुई थी उन्हें इस फोन को सीखने में…फोन पर ही मां चिल्ला उठी थी,”तेरे पापा को कितना समझाया था कि महंगा वाला फोन मत दिलाओ पर मेरी सुनता कौन है. ऐसा झुनझुना ले आए हैं कि न उन्हें समझ आता है न मुझे, बताओ बिना बात के पैसे फंसवा दिए इन्होंने.”

कितना हंसी थी वह उस दिन, मम्मीपापा बच्चों की तरह छोटीछोटी बातों पर लड़ जाते थे और फिर क्या… झगड़ा निबटाने की जिम्मेदारी उस की…किस की तरफ से बोले और किस की तरफ से नहीं. मां का फोन स्विचऔफ था, अपूर्वा ने कांपते हाथों से फोन को खोलने की कोशिश की.सुर्ख बंधेज की साड़ी में मां का मुसकराता चेहरा सामने था. मां को हमेशा खिलते रंग ही पसंद थे. मां की अलमारी खिलते रंगों से भरी पड़ी थी पर आज वे सब के जीवन को बेरंग कर गई थीं. अपूर्वा ने साड़ियों पर हाथ फेरा, बचपन में भी तो वह ऐसे ही उन पर हाथ फेरती तो मां खिलखिला कर हंस पड़ती.


“अप्पू, क्या करती है तू…” और नन्ही सी अप्पू हुलस कर कहती,”मां, कितना प्यारा रंग है न… मेरे कलर बौक्स में भी ऐसे रंग नहीं हैं.” और मां उस की मासूमियत पर मुसकरा देतीं.’मां, आप ने एक बार भी पापा के विषय में नहीं सोचा कि आप के बाद उन का क्या होगा. पापा चुप से हो गए थे, कहते हैं जब आप बात नहीं कर रही होती हैं तो तब आप सही मानों में बहुत कुछ बोल रही होती हैं. बस उसे सुनने वाला केवल एक ही शख्स होता है और वो शख्स कोई और नहीं आप होती हैं.’

अपूर्वा ने मां के फोन से कमला को फोन कर दिया. अपूर्वा ने उस दिन पापा की पसंद की चीजें बनाई थी.पापा सबकुछ देख और समझ रहे थे पर कब तक? एक दिन तो अपूर्वा को जाना ही है. अपूर्वा दिन भर लैपटौप से जुझती रहती. इन दिनों औफिस घर से ही चल रहा था पर वह पापा का नाश्ता, खाना और दवाएं देना नहीं भूलती. अपूर्वा ने कई बार घुमाफिरा कर पापा से साथ चलने के लिए कहती पर पापा कभी दुनिया, कभी रिश्तेदार तो कभी परंपराओं की दुहाई देने लगते. अपूर्वा को रहतेरहते 1 हफ्ता हो चुका था. इधर समर भी बारबार फोन करकर के उस का प्रोग्राम पूछते रहते. अपूर्वा अजीब सी दुविधा में थी, पापा जाने को तैयार नहीं थे और अपूर्वा उन्हें छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी. आखिर उस की भी गृहस्थी थी, उस के भी कुछ कर्तव्य थे. पापा खाना कर आराम कर रहे थे, कमला चौका समेट रही थी.

“कमला, शाम को लौकी के कोफ्ते बनाएंगे.””ठीक है दीदी…” “तेरी मां कैसी है कमला…””क्या बताऊं दीदी, 2 साल से नहीं जा पाई, भाई का फोन आया था. एक जगह की हो कर रह गई है, खानापीना सब बिस्तर पर…” “तू मिल क्यों नहीं आती?”









“मन तो बहुत है दीदी पर अंकलजी को छोड़ कर कैसे जाऊं. आंटीजी थीं तो बात कुछ और थी पर अब…”अपूर्वा ने कमला के हाथों को अपने हाथों में लिया और नोटों का पुलिंदा उस के हाथों में रख दिया. कमला आश्चर्य से अपूर्वा का मुंह देख रही थी.

“दीदी, आप पैसे क्यों दे रही और वह भी इतने सारे, अभी तो महीना भी पूरा नहीं हुआ. अंकलजी है न वे दे देंगे.”अपूर्वा बड़ी देर तक चुपचाप खड़ी रही, कमला समझ नहीं पा रही थी कि आखिर अपूर्वा करना क्या चाहती है.”कमला, मैं पापा को यहां अकेले नहीं छोड़ सकती, पूरी रात मम्मी की तसवीर की तरफ ही देखते रहते हैं. मेरे सिवा उन का है ही कौन? तुम मेरी एक मदद करेगी.”

“बोलो दीदी…?””जब पापा सो कर उठें तो उन से अपनी मां की तबीयत का बहाना कर के महीनेभर के लिए तुम गांव चली जाओ. मैं पापा को किसी तरह भी मना कर अपने साथ ले कर चली जाऊंगी,”कहतेकहते अपूर्वा का गला भर आया. कमला की आंखें भी डबडबा गईं. अपने आंचल से अपूर्वा के आंसू पोंछते हुए कमला ने कहा,”दीदी, आप जरा भी चिंता न करो, खुशीखुशी अपने पापा को अपने घर ले जाओ. तुम्हारी जैसी बिटिया कुदरत सब को दें.”

अपूर्वा के चेहरे पर खुशी की लहर आ गई. एक जंग तो वह जीत चुकी थी अब दूसरी जंग की तैयारी करनी थी. कमला ने योजना के अनुसार वैसा ही किया,पापा कमला के 1 महीने गांव जाने की बात सुन कर सोच में पड़ गए पर कमला की मां की बीमारी की बात सुन कर वे ज्यादा कुछ न बोल पाए. अपूर्वा ने उन के चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी देखी. अपूर्वा भी तो अपने घर जाएगी फिर उन का खानापीना… उन्हें तो चाय के सिवा कुछ बनाने भी नहीं आता. अपूर्वा सबकुछ चुपचाप देख रही थी. उस दिन पूरी रात उन की आंखों में पश्चाताप में ही गुजरी.


“पापा, उठिए कितना सोएंगे…मैं ने चाय चढ़ा दी है. एक बार आप जरा अपने कपड़े देख लीजिए हम लोग शाम तक निकलेंगे.”अपूर्वा, तू जा रही है? सब ठीक है न?””मैं नहीं पापा हम…हम दोनों कानपुर जा रहे हैं. 2 घंटे का ही रास्ता है. शाम होने से पहले पहुंच जाएंगे.””अप्पू, मैं तुझ से पहले ही कह चुका हूं मैं तेरी ससुराल नहीं जा सकता. लोग क्या कहेंगे.””पापा, आप हमेशा के लिए थोड़ी जा रहे हैं, बस 1 महीने की बात है. कमला भी यहां नहीं है, आप को दिक्कत हो जाएगी न..”

‘दिक्कत…’ अजयजी मन ही मन बुदबुदाए, अपूर्वा गलत तो नहीं कह रही थी.”पर तेरी सास?””उन की चिंता मत कीजिए.”””बस 1 महीना.””हांहां भाई बस 1 महीना..”

अपूर्वा मन ही मन खुश थी. अजयजी ने बड़े भारी दिल से अपने सामान को पैक किया. अपूर्वा ने कपड़ों के बीच उन को मां की तसवीर छिपाते देख लिया था. मृदुलाजी के बिना अपूर्वा के घर जाने का उन का पहला मौका था. पापा भरी निगाहों से उस घर के कोनेकोने को देख रहे थे. इतने मन से बनाए इस घर को छोड़ कर यों जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था पर जाना तो था ही…तभी पापा को कुछ याद आया,”अप्पू जरा रुक तो..”

“क्या हुआ पापा?”पापा बिना कुछ कहे कमरे में घुस गए और मां की अलमारी में टटोलने लगे. थोड़ी देर में पापा एक रंगीन लिफाफा ले कर हाजिर थे.”तेरी मां कहती थी कि बहनबेटियों को खाली हाथ विदा नहीं करते. यह ले तेरा शगुन…तू पिछले साल आ नहीं पाई थीं न… तेरी मां ने पिछले साल से ही तेरे लिए कुछ खरीद कर रखा था. सोचा था जब तू आएगी तो तुझे देंगी पर वे तो रहीं नहीं खैर…”

पापा ने पैकेट अपूर्वा के हाथों में पकड़ा दिया. अपूर्वा मूकदर्शक बनी सबकुछ देख रही और समझने का प्रयास कर रही थी. उस कल के इंतजार में मां चली गईं. वह कल आएगा कितना बड़ा भ्रम था. पैकेट से लाल रंग की साड़ी झांक रही थी,”कितनी बार कहा था मां से मुझे साड़ी मत दिया करो. पहनने में नहीं आती. आप के पैसे भी फंस जाते हैं…”और मां कहतीं, “तू तो साड़ी खरीदती नहीं. कम से कम तीजत्योहार पर तो पहन लिया कर.”


मां जातेजाते भी अपने हाथों की खुशबू अपने होने का एहसास छोड़ गई थी. अपूर्वा ने उस साड़ी को अपने गालों से लगा लिया. आंसू की 2 बूंदें साड़ी पर टपक गईं. वह सुकून भरी गोद अब नहीं थी, थी तो बस उस की स्मृतियों का एहसास जो हर सांस के साथ महसूस होता था.

गाड़ी तेजी से धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ गई. अपूर्वा और पापा की नजर कार के शीशे के बाहर घर के दरवाजे पर ही अटक गई थी. अपूर्वा को लगा आज वह एक बार विदा हो रही थी इस दहलीज से… शायद हमेशा के लिए कभी भी न लौटने के लिए. रास्ते भर दोनों ने एकदूसरे से कोई भी बात नहीं की. दोनों अपनेअपने विचारों से जूझ रहे थे. विचारों की एक गहरी सुनामी उन्हें विचलित कर रही थी. हाइवे पर तेजी से दौड़ती कार पीछे छूटते खेतखलिहानों के साथ पीछे बहुत कुछ छूट गया था.

“भाभी,घर आ गया.”दिनेश की बात सुन कर दोनों मानों नींद से जागे. अपूर्वा का मन एक अनजाने भय से भयभीत था. पैर मानों भारी हो रहे थे. एक बहुत बड़ा सवाल उस के सामने मुंह बाए खड़ा था. गाड़ी का हौर्न सुन कर समर बाहर निकल आए पर मम्मीजी… समर के लिए भी एक अजीब सी स्थिति थी. मां के बिना पापा का स्वागत, कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी.





“रास्ते में कोई दिक्कत तो नहीं हुई.”समर ने सामान संभालते हुए कहा और जवाब का इंतजार किए बिना ही घर में घुस गया. पापा गाड़ी के पास ही खड़े थे, एक अजीब सा संकोच घर कर गया था. पहले की बात और थी पर अब… “चलिए न पापा आप यहां क्यों खड़े हैं…”

समर मुसकराते हुए घर से बाहर निकले, अपूर्वा ने राहत की सांस ली. घर में एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था. चौके में कुछ खटरपटर हो रही थी. शायद खाना बनाने वाली आ गई थी. अपूर्वा साधनाजी को हर कमरे में ढूंढ़ आई थी पर पता नहीं वे कहां थीं. समर पापा के साथ बैठक में बैठे हुए थे.अपूर्वा ने जल्दी से हाथमुंह धुले और सब के लिए पानी लेने के लिए चौके में घुसी.

 

“मम्मी,आप यहां…सुनीता कहां है?आप हटिए मैं करती हूं.” “सुनीता राशन लेने गई है, तेरे पापा के लिए बिना चीनी वाली चाय अलग बना दी. ये पकौड़ियां ठंडी हो जाएंगी, तुम ले कर जाओ. मैं चाय ले कर आती हूं.” अपूर्वा आश्चर्य से मम्मीजी को देख रही थी. क्या मम्मीजी को बात समझ में आ गई थी? उन्हें पापा का यहां रहने पर कोई आपत्ति नहीं थी या फिर यस तूफान से पहले की शांति थी? बैठक में समर और पापा इधरउधर की बातें कर रहे थे. अपूर्वा नाश्ता लेकर पहुंची,”यह लीजिए गरमगरम पकौड़ी.”

 

पापा वैसे ही निर्विकार से बैठे हुए थे अचानक वे खड़े हो गए,”नमस्ते भाभी जी.” साधनाजी तब तक चाय ले कर आ गई थीं. सब लोग अपनी जगह से खड़े हो गए. साधनाजी ने गरदन हिला कर पापा का अभिवादन स्वीकार कर लिया. “मम्मी, बैठिए न आप भी चाय पीजिए.”

 

“तुम्हें तो पता है अपूर्वा मेरा घूमने का समय हो गया है.” सब चुप हो गए. अजयजी ने फलों की टोकरी साधनाजी के हाथों में थमा दी. कितना मना किया था अपूर्वा ने पर उन्होंने गाड़ी रुकवा कर फल खरीद ही लिए. “अप्पू, बेटी के दरवाजे पर खाली हाथ जाऊं यस शोभा नहीं देता. तेरी मां होती तो क्याक्या बांध देती. एक तो वैसे भी कोरोना के चक्कर में मिठाइयों की दुकानें बंद हैं. कम से कम फल तो ले चलूं.”


अपूर्वा पापा को देख रही थी. कितना फर्क आ गया था पापा में…पापा अचानक से मां की तरह लगने लगे थे. पहले उस की विदाई का लिफाफा और अब यह सब…कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया. अजयजी अपने नए ठिकाने में सिमट गई थे. मां की फोटो जो घर पर दीवार पर टिकी थी, कमरे के मेज पर दीवार से टिका दी गई. उन का सामान कमरे के एक कमरे में 2 दिनों तक वैसे ही पड़ा रहा. अपूर्वा ने ही सामान निकाल कर अलमारी में जमाया था.अपूर्वा घर को समेटने में लगी थी. 1 हफ्ते से औफिस से छुट्टी भी ले रखी थी. ऊपर से साधनाजी का शीत युद्ध वैसे ही चल रहा था. मुंह से तो कुछ नहीं कहतीं पर उन का ठंडा व्यवहार सबकुछ कह देता.

शुरूशुरू में तो अजयजी ने भी शामिल होने की कोशिश की पर साधनाजी किसी न किसी काम के बहाने उठ जाती. वे सब समझ रहे थे पर…जब तक वर्क फ्रौम होम था तब तक स्थिति सही भी थी. अपूर्वा प्रयास करती कि मम्मीजी को कोई काम न करना पड़े.

अजयजी को सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ने की आदत थी. साधनाजी को अखबार पढ़ने का कोई विशेष शौक नहीं था. सच तो यह था कि कभी घरगृहस्थी से फुरसत ही नहीं मिली इसलिए अखबार की ओर ध्यान भी नहीं गया. पर जब से अजयजी आए थे वे गेट पर ही अखबार वाले का इंतजार करने लगतीं और अखबार अपने कमरे में ले कर चली जातीं. अखबार पढ़े बिना  अजयजी का सवेरा नहीं होता था. उन्हें बेचैन देख कर अपूर्वा छटपटा जाती. समर से भी वह कुछ कह नहीं पाती. कई बार सोचा कि एक और अखबार लगवा लूं पर अगर किसी ने पूछ लिया तो क्या जवाब देगी वह…

धीरेधीरे लौकडाउन में छूट मिलने लगी थी. अपूर्वा को औफिस भी जाना होता था. पापा की दवा, जूस इन सब का वह इंतजाम कर के जाती पर खाना… सुनीता से उस ने पहले ही कह रखा था कि जिस दिन न आना हो तो पहले से बता दे वरना…ऐसा नहीं था कि साधनाजी खाना नहीं बनाती थीं पर एक अनजाने भय से वे हमेशा ग्रसित रहती थीं. कहीं कल साधनाजी इसी बात को बखेड़ा न बना दें.


आज औफिस में कुछ ज्यादा ही काम था, समर घर से ही औफिस संभाल रहा था. अजयजी के कमरे में बड़ा सन्नाटा पसरा हुआ था. साधनाजी 2 बार कमरे के बाहर चक्कर भी मार आई थीं. इतनी देर तक तो अजयजी कभी नहीं सोते थे फिर आज…आज क्या हुआ? वे समर के कमरे की ओर बढ़ गईं, “समर, चाय पिएगा?”

“अपने लिए बना रही हो मां तो पिला दो…अपनी स्पैशल वाली बनाना.” साधनाजी के चेहरे पर एक मुसकराहट आ गई, दरवाजे के पास जातेजाते वह वही रुक गई. कैसे पूंछूं? पता नहीं क्या सोचेगा?”समर, तेरे ससुर ठीक है न…सुबह से देखा नहीं उन्हें, इस वक्त तक तो गमलों के साथ कुछ न कुछ करते ही रहते हैं. सब ठीक है न…” “मुझे पता नहीं मां, आज मेरी एक बहुत जरूरी मीटिंग है मैं उसी की तैयारी में व्यस्त हूं. ठीक ही होंगे?”

समर साधनाजी को उन के चिंतन के साथ छोड़ कर काम में व्यस्त हो गया. साधनाजी चौके की तरफ बढ़ गईं.चाय का पतीला उठाया पर मन तो अजय की तरफ ही लगा था,’जब चाय बना रही हूं तो एक बार पूछ ही लेती हूं…एक बार पूछ लूंगी तो कौन सा घट जाऊंगी,’ साधनाजी अजयजी के कमरे की तरफ बढ़ गईं. कमरे के अंदर अभी भी सन्नाटा था. साधनाजी ने दरवाजे को खटखटाया उधर से कोई आवाज नहीं आई, उन्होंने दूसरी बार दरवाजे को जोर से खटखटाया…

 


“आ जाओ अप्पू…” अपूर्वा को इसी नाम से तो पुकारते थे वे. साधनाजी अजीब कशमकश में पड़ी थीं, अंदर जाऊं या न जाऊं. अजयजी पता नहीं क्या सोचें पर अब तो जाना ही पड़ेगा,”मैं हूं भाईसाहब…अंदर आ जाऊं?” “जी…” साधनाजी ने दरवाजे को हलके से धक्का दे कर खोल दिया. अजयजी  बिस्तर पर ही लेटे हुए थे. साधनाजी की आवाज को सुन कर उन्होंने उठने का उपक्रम किया. “अरे क्या हुआ आप लेटे क्यों हैं… तबीयत ठीक है न?”

“हां ठीक है बस कल रात से थोड़ा सा पेट में दर्द है. 2 बार पतले दस्त भी हुए.”अजयजी के चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आईं, आंखें उनींदी हो रही थीं.शायद दर्द के कारण वे पूरी रात सोए नहीं थे. साधनाजी के माथे पर बल पड़ गया,”अपूर्वा ने भी कुछ नहीं बताया.. .””नहींनहीं उस की कोई गलती नहीं… उसे तो पता भी नहीं. आप ने दरवाजा खटखटाया तो मैं ने सोचा अपूर्वा ही है.””कोई दवा ली…?”


“जी दवा…”अजयजी के गले में शब्द अटक से गए. जब तक मृदुला थी तो वह कहीं भी जाने से पहले एक छोटा सा फर्स्ट एड बौक्स जरूर रख लेती थी पर अब…”कोई बात नहीं आप मुंहहाथ धो लीजिए…मैं अभी आती हूं.”अजयजी बड़े पेशोपेश में थे. इतने दिनों में पहली बार साधनाजी से उन की इतनी बात हुई थी. वे गुसलखाने में घुस गए.

“भाईसाहब, यह गरम पानी के साथ निगल लीजिए, आराम मिलेगा. समर के पापा को भी जब कभी दिक्कत होती तो मैं यही देती थी. 2-3 बार ले लेंगे तो सही हो जाएगा.””जी…”साधनाजी दवा और पानी रख कर चली गईं. अजयजी ने चुपचाप दवा ले ली और अपने बिस्तर पर लेट गए. कितने दिनों बाद उन्होंने किसी से बात की थी. ऐसा नहीं था कि समर और अपूर्वा उन्हें समय नहीं देते थे पर इंसान का एक स्वभाव होता है जहां से उम्मीद न हो वह वहां से ही उम्मीद करता है. अजयजी को न जाने क्यों बहुत पहले पढ़ी एक पत्रिका की कुछ पंक्तियां याद आ गईं,’घरों में दरवाजों से ज्यादा खिड़कियां होनी चाहिए क्योंकि दरवाजे हमेशा घुटन का एहसास कराते हैं पर खिड़कियां… खिड़कियों से आती शीतल बयार मन के कोनेकोने को सुवासित और सुगंधित कर देती है. खिड़कियों पर खड़ा आदमी उम्मीद का इंतजार करता है…’ तभी बरतनों की आवाज से उप की तंद्रा टूट गई.

“भाईसाहब, यह आप की चाय है. थोड़ी ही दी है और यह मूंग की दाल का चिल्ला, हलका रहेगा पेट तो आराम मिलेगा.”अजयजी संकोच से दोहरे हुए जा रहे थे.”आप…आप क्यों परेशान हो रही हैं.मैं ठीक हो जाऊंगा.””परेशानी कैसे…अपूर्वा मूंग की दाल पीस गई थी कि नाश्ते में पकौड़ी बनेगी, मैं ने सोचा आप के लिए चिल्ला बना दूं. पेट भी भर जाएगा और आराम भी रहेगा.

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