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घर पर शायरी






अजीब सानेहा गुज़रा है इन घरों पे कोई
कि चौंकता ही नहीं अब तो दस्तकों पे कोई
- जावेद अनवर


घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
- बशीर बद्र


घर वापसी शायरी


मैं क्या जानूं घरों का हाल क्या है
मैं सारी ज़िंदगी बाहर रहा हूं
- अमीर क़ज़लबाश


अपने घरों से दूर बनों में फिरते हुए आवारा लोगो
कभी कभी जब वक़्त मिले तो अपने घर भी जाते रहना
- मुनीर नियाज़ी


शायरी घर की याद

सफ़र के साथ सफ़र के नए मसाइल थे
घरों का ज़िक्र तो रस्ते में छूट जाता था
- वसीम बरेलवी


ख़मोशी के हैं आंगन और सन्नाटे की दीवारें
ये कैसे लोग हैं जिन को घरों से डर नहीं लगता
- सलीम अहमद


हुई जो शाम रास्ते घरों की सम्त चल पड़े
हमें मगर ये क्या हुआ ये हम किधर निकल पड़े
- मुस्लिम सलीम

घर वापसी शायरी इन हिंदी


ज़िंदगी ऐसे घरों से तो खंडर अच्छे थे
जिन की दीवार ही अच्छी थी न दर अच्छे थे
- ज़ुबैर रिज़वी

जाता है जो घरों को वो रस्ता बदल दिया
आंधी ने मेरे शहर का नक़्शा बदल दिया
- फ़ातिमा हसन


घर परिवार शायरी


घरों को ओढ़ लेने से भला क्या
घरों से दूर भी रहना पड़ेगा
- अज़ीज़ प्रीहार


















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