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Hindi Poetry Kudarat ka Karishma हिंदी कविता कुदरत का करिश्मा

 कुदरत का करिश्मा 


भोर भए आकाश पर 
सूरज उगता है 
तो धरती को भी धमकाता है 


शाम को जब ठंडी हवा 
के झोंके चलते हैं
 तो दोपहर की झलती धूप को 
जैसे पतझड़ से बहार बनाते हैं 



सूरज भी शाम ढलते अपनी 
करवट बदलता है 
रात को गहरी सांस लेता है 
अगले दिन की तैयारी में जुट जाता है 


शीत वायु चल पड़ती है 
अपनी डगर पे 
न कोई उसको रोके 
न कोई उसको टोके
 जहां चाहती है वहां घूमती है 
न कोई उसकी खबर ले 



अंदर पर जब बादल छा जाते हैं 
आपस में टकराते रहते हैं 


समीर भी रागिनी गाती है
 बारिश आने लगती है 



ऊंचे - ऊंचे पर्वतों पे बर्फ 
गिरती है बर्फ पे
 सुनहरी धूप पड़ती है । 



बर्फ भी पिघलकर बिखर जाती है . 
अद्भुत सा नजारा होता है 
स्वर्ग का जैसे इशारा होता है 



गगन पे तारे निकलते है 
सात - ऋषि भी नजर आते हैं । 
अनगिनत तारे लगते हैं 
बहुत प्यारे कोई ऊपर है , कोई नीचे 
कोई आगे है ,कोई पीछे 


रात को चांद निकलता है 
कभी आधा तो कभी पूरा होता है . 
ये दृश्य भी बहुत निराला है 
कभी पूर्णिमा तो कभी अमावस्या को लाता है ।

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