बैपनाह - Bepanah hindi kahani Bhag 4 to 6 hindishayarih सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बैपनाह - Bepanah hindi kahani Bhag 4 to 6 hindishayarih

बैपनाह - Bepanah hindi kahani Bhag 4 to 6 hindishayarih



हद कर दी दीवानयी ने इतना भी नहीं सोचा जब सर से उतरेगी दीवानों का क्या होगा।
“उसने मुझे गेस्ट रूम में क्यों बुलाया? क्या वहाँ और सीनियर्स भी होंगे? पता नहीं सब मेरे ढारे में क्या सोच रहे होंगे। इतनी मेहनत से बनाई इज्ज़त मिट्टी में मिला कर रख दी", सौम्या शीशे में अपना अक्स देखते हुए बोली।



कुछ काम इन्सान पेट पालने के लिए ही नहीं करता बल्कि दूसरों की नज़र में आने के लिए भी करता है। प्रतिष्ठा ताश के घर की तरह होती है। बनाते हुए बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है लेकिन ज़रा सी चूक होते ही वो महल क्षण भर में भरभरा कर धूल चाटने लगता है। कितनी मेहनत की थी सौम्या ने अपने काम में। अपनी लगन से सभी को आकर्षित किया था लेकिन सचिन की इस कुचेष्टा ने सौम्या की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के लिए एक ज़ोरदार प्रहार का काम करके उसकी इज्ज़त की धज्जियां उड़ा कर रख दी थीं।



“लेकिन मेरा कसूर क्या है? मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया। आखिर यह मेंरे करियर का प्रश्न है। अगर मुझसे इस बारे में कुछ पूछा गया तो मैं साफ मना कर दूँगी। फिर चाहे सीनियर्स उसके खिलाफ कोई भी कारवाई करें। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई भी मेरी छवि को इस तरह खराब नहीं कर सकता।" सौम्या का दिमाग रह-रह कर उसके दिल को समझा रहा था। वह शीशे में देखकर अपना मेकअप ठीक कर रही थी और साथ ही साथ अपने जज़्बात को काबू में रखने का भरपूर परंतु असफल प्रयास कर रही थी।



सौम्या को इस बात की चिंता नहीं थी कि सचिन की इस हरकत से उन दोनों का नाम जोड़ा गया था। बल्कि उन दोनों की नज़दीकियाँ देखकर पहले भी आ£फ़िस में कानाफूसी होती रहती थी लेकिन वह इन बातों को ज़्यादा तूल नहीं देती थी। सचिन से उसकी निकटता और उसकी तरक्की को कुछ लोग आपस में जोड़कर देखते थे। सौम्या को लगता था कि सचिन के इस तरह अपने प्यार का खुलेआम इज़हार करने से उन बातों को हवा मिल गई थी। उसे बस लोगों की फिक्र थी। उसे लगता था कि लोग यही समझ रहे होंगे कि तरक्की पाने के लिए उसने सचिन के साथ कोई "समझौता" किया होगा। हालांकि इस ढात में लेष मात्र भी सच नहीं था।



ऐसा नहीं था कि आज तक उसे किसी ने प्रपोज़ नहीं किया था लेकिन पहले पढ़ाई और अब करियर बनाने की चाह उसे इन सब चीज़ों से दूर ही धकेलती रही थी। उसने सबको मना करके उनके दिल तोड़े थे मगर सचिन की बात और थी। सचिन ने एक सच्चे दोस्त की तरह उसका साथ दिया था। उसे सचिन पर गुस्सा भी आ रहा था और उसकी इस हरकत पर हँसी भी। जिस अंदाज़ में सौम्या का नाम लिए बिना उसने अपने प्यार का ऐलान किया था, ऐसी हिम्मत हर किसी के पास नहीं होती। मन ही मन सौम्या उसके अंदाज़ की दाद दे बैठी और अनजाने में ही उसके होंठों पर एक मुस्कान फैल गई। सचिन ने इससे पहले कभी सौम्या से ऐसी कोई बात नहीं की थी लेकिन सौम्या समझ सकती थी कि सचिन के मन में कुछ था जो उसकी नज़र कहती थी लेकिन होंठ झूठ बोलते थे।




“एक बार मुझसे पूछा तो होता बेवकृफ! क्या मैं तुम्हें..." सोचते-सोचते अचानक सौम्या दहीं अटक गई। क्या सचिन उसे अकेले में अपने दिल की बात कहता तो वह हाँ कर देती? शायद नहीं। बिल्कुल नहीं। ऐसा तो नहीं था कि वह नासमझ थी। उसे भी पता था कि सचिन कया कहने वाला था। तभी तो उससे दूर भाग रही थी। अब उसे लगने लगा था कि उसने सचिन का इस्तेमाल भर किया था। उसे अपने इस स्वार्थ पर घिन्न आने लगी थी।



सौम्या पहले भी कई बार सचिन के बारे में सोचते हुए खो जाती थी। सुबह उठते ही मोबाइल देखती कि कहीं उसका कोई मैसेज आया या नहीं। उसे याद करते-करते नाश्ते के दक़त अक्सर उसकी चाय ठण्डी हो जाया करती थी। दफ्तर में दाख़िल होते ही मन सचिन से मिलने को बेचैन रहता था। कई बार सचिन नए लोगों को ट्रेनिंग देने में व्यस्त होता था तो वह उसे दूर से देखकर ही सुकून कर लेती थी। लंच सचिन के साथ ही अच्छा लगता था। पिछले ४ हफ्ते छोड़ दे तो ५-६ महीनों में सचिन के साथ ही लंच करना, शाम को छुट्टी के बाद एक-दूसरे के लिए इन्तज़ार करना, ५-६ बार बाय बोलकर भी फिर से बातों की संकरी अंधेरी गली में खो जाना, घर आकर भी मोबाइल पर एक-दूसरे से बात करते रहना, रात को गुड नाइट बोले बिना न सोना, वीकैंड इकट्ठे गुज़ारना और एक-दूसरे की पसन्द का हर काम करना, यह सब क्या था?



सौम्या हर छोटी-बड़ी बात और अपने परिवार के बारे में सब कुछ उसे बताती थी। आज सौम्या ने जो पोशाक पहन रखी थी, दो भी सचिन के साथ जाकर उसकी पसन्द की ही लाई थी। उसे खुद भी अहसास होने लगा था कि किसी और से बात करते हुए भी सचिन का ज़िक्र उसकी बातों में गाहे-बगाहे हो ही जाता था।



“क्या सचिन मेरा दोस्त है, ज़रूरत है या आदत? कहीं मैं उसे इस्तेमाल तो नहीं कर रही, जैसे कई लड़कियाँ करती हैं? लेकिन मैंने तो उससे ऐसी कोई बात नहीं कही। हालांकि सचिन की इस हरकत से मेरा भी मज़ाक बन रहा होगा लेकिन मुझे उस पर उतना गुस्सा नहीं आ रहा जितना इस मामले में मुझे आना चाहिए। शायद ऐसा इसलिए कि वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। दोस्त से भी बढ़कर या शायद मुझे भी उससे प्यार है।" सौम्या अपने सवालों के जदाब खुद ही ढूँढने की कोशिश कर रही थी लेकिन जब दिमाग ने और सठाल दाग दिए तो उसने अपना सिर पकड़ लिया।



“आई लव यू सचिन!" सौम्या के अन्तर्मन से निकली आदाज़ ने उसे चौंका दिया। उसने अपने दिल को कितनी बार रोका था। उस दिन जब फिल्म में रोमांटिक दृश्य देखते हुए सचिन ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा था तब वह समझी थी कि गलती से हुआ होगा और अपना हाथ हटा लिया था। सचिन ने उसे कभी नहीं छुआ था, न उससे पहले न उसके ढाद। हाँ उसकी आँखें ज़रूर कुछ कहती थीं जिसे उसने नजर-अंदाज़ करना शुरू कर दिया था। अब सौम्या को समझ आया कि अगर वह सचिन की आँखों में देखती तो उसे सब समझ में आ गया होता लेकिन उसे एक अनजाना सा डर भी था।



“नहीं नहीं, यह प्यार-व्यार सब बेकार की ढातें हैं। पहले मेरा करियर है, यह सब ढाद में।" उसने अपना सिर झटकते हुए खुद को बहलाया।



तभी उसे किसी के हँसने की आदाज़ आई। सौम्या की २ सहकर्मियों ने हँसते हुए वहाँ प्रवेश किया और उसे वहाँ पाकर ठिठक गईं और चुपचाप उसे देखने लगीं। सौम्या को याद आया कि उसे उस सीनियर लड़की ने बुलाया था। उसने अपना हैंडबैग उठाया और सिर झुका कर तेज़ी से बाहर निकल गई लेकिन अपने पीछे उन दोनों के ठहाकों की आवाज़ उसे १ खंजर की तरह चुभती हुई अनुभव हुई। वह गुस्से में तीव्र गति में सबसे नज़र चुरा कर अतिथि कक्ष की ओर चल पड़ी। हालांकि वह किसी को देख नहीं रही थी लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि वहाँ मौजूद हर नज़र उसे ही ताड़ रही थी। उसने उस महौल से निकलते हुए गहरी साँस ली और अपने दिल को मनाया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह हार नहीं मानेगी।



सौम्या ने अतिथि कक्ष का दरवाज़ा खटखटाया तो अन्दर से उस लड़की की आवाज़ आई, "अंदर आ जाओ!"




वह दरदाज़ा खोल कर अन्दर दाखिल हुई से बाहर के मुकाबले वहाँ काफ़ी शान्त महौल था। उसे तो लगा था कि वहाँ उसके अधिकारियों जमावड़ा होगा लेकिन इसके उलट वहाँ हल्की-सी रोशनी में वही सीनियर लड़की नजर आई। लेकिन दूसरा कदम बढ़ाने के साथ ही उसकी परेशानी गहरा गई। उस कमरे में सचिन भी मौजूद था। जहाँ सौम्या उसकी मौजूदगी को लेकर हैरान थी, वहीं सचिन सिर झुकाए पत्थर की तरह बैठा था। शायद उसे सौम्या के मनोस्थिति का अंदाज़ा था।



“प्लीज बैठो सौम्या", उस लड़की ने मुस्कुराते हुए उसे बैठने का इशारा किया। एक काउच के एक तरफ सचिन बैठा हुआ था। सौम्या सहमे हुऐ कदमों से दूसरी तरफ सचिन से दूरी बनाते हुए बैठ गई। वह सीनियर लड़की उनके सामने पड़े मेज़ के पार एक सोफे पर बैठी हुई थी।



“मिस सौम्या घोष! कुछ देर पहले जो हुआ, सबने देखा। मिस्टर सचिन देशमुख ने अपनी गलती मान ली है और ....", अभी उसने अपनी ढात पूरी भी नहीं की थी कि सचिन बीच में ही बोल पड़ा।



“मैंने कोई गलती नहीं की, प्यार का इजहार किया है। हाँ मेरा तरीका कुछ अटपटा हो सकता है लेकिन मेरी नीयत साफ थी। मैं सौम्या से बहुत प्यार करता हूँ और विवाह करना चाहता हूँ। मुझे पता है कि सौम्या भी मुझसे प्यार करती है लेकिन न जाने क्‍यों वह यह बताना नहीं चाहती। "



“क्या यह सच है मिस घोष?" उस लड़की ने सौम्या से पूछा तो दह हैरान होकर देखने लगी। उससे जवाब देते नहीं बन पा रहा था।



“मिस्टर सचिन! अगर यह बात झूठ हुई तो इसका परिणाम आपके लिए बुरा हो सकता है", इस बार उसने सचिन की तरफ देखते हुए कहा तो सौम्या की हालत और बुरी हो गई। दह हैरान थी कि सचिन ने खुलेआम उससे प्यार का इज़हार करके एक चूक थी या प्रबंधन की नज़र में प्यार ही एक गुनाह था? उसने अपनी नजरें झुका लीं।



“मिस घोष! अगर आप लिखित में शिकायत दें तो हम सचिन देशमुख को नौकरी से निकाल सकते हैं", इस बार उस लड़की ने अपना लहज़ा सख़्त करते हुए कहा तो सौम्या काँप गई।



“नहीं नहीं मैम प्लीज़ ऐसा मत कीजिए", उसने घढराते हुए कहा। उसे लगा था कि सचिन को छोटी सी चेतावनी देकर छोड़ दिया जाएगा और ढाद में दे दोनों मिलकर यह मामला सुलझा लेंगे लेकिन उसे नौकरी से निकाले जाने का ख़्याल तो उसके दिमाग के किसी कोने में नहीं था। "प्लीज़ मैम उसका करियर खराब हो जायगा।" अब सौम्या सचिन की दकालत कर रही थी।



“तो ठीक है, इनका ट्रांसफफ़र ऐसी जगह करवा दूँ जहाँ से यह आपसे सम्पर्क न कर सके?" इस बार उस लड़की ने कुछ नरमी बरतते हुए पूछा।




“प्लीज़ मैम ऐसा कुछ मत कीजिएगा। मैं इसके ढिना नहीं रह पाऊँगी", सौम्या ने रुआंसी होकर हाथ जोड़ते हुए कहा तो उसके दिल की बात जुबान तक आ ही गई थी।



उस लड़की के होंठों पर एक हल्की-सी हँसी आ गई लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, "माफ करना सौम्या, मुझे यह सब नाटक करना पड़ा। यकीन मानो मैनेजमेंट की ऐसी बातों में कोई रुचि नहीं है। यह तो मैं ही तुम दोनों की निजी ज़िंदगी में दखल दे रही थी। तो इसका मतलब तुम भी सचिन से प्यार करती हो?” उसने होंठों पर दार्शनिक मुस्कान लाते हुए पूछा। उसकी इस मुस्कान में सामने बैठे हुए दोनों की भावनाओं का सम्मान था।



उसकी बात सुनकर दोनों ने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा और फिर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। सचिन ने सौम्या की आँखों में देखना चाहा लेकिन सौम्या ने साथ न दिया और नजरें घुमा लीं। शायद उसे डर था कि सचिन उसकी आँखों में छुपी सच्चाई पढ़ लेगा।



“अभी मेरे पास इन सब बातों के लिए समय नहीं है। मुझे अभी अपने करियर के ढारे में सोचना है।" सौम्या ने यह कहने की बहुत कोशिश की कि वह सचिन से प्यार नहीं करती लेकिन उसके होंठ झूठ न कह सके।



"मुझे अपनी दोस्त ही समझो। कभी-कभी हमारे मन में किसी के प्रति प्रेम तो होता है परन्तु हमें यह बहुत बाद में अनुभद होता है और जब पता चलता है तो हम उसे पनपने नहीं देते मगर जब प्यार का इज़हार करने की बारी आती है तो बहुत देर हो चुकी होती है। उन दोनों के साथ भी तो यही हुआ था।" उसने ख्यालों की भंवर में डूबते हुए कहा।



“कौन दोनों?" दोनों ने उसकी तरफ सठालिया नज़रों देखा।



“लम्बी कहानी है। फिर कभी सुनाऊँगी।" उस लड़की ने समय के गहरे कुएं से निकलते हुए कहा लेकिन तब तक उसकी पलकों के किनारे नम हो चुके थे।



"आपने हमें दोस्त कहा है और हमारी उलझन को सुलझाने का प्रयास किया है। आप चाहें तो अपने दिल का दुःख हमसे बाँट सकती हैं*, सौम्या ने अपनापन जताते हुए कहा।



*और रही बात समय की तो आपकी वापसी की फ्लाइट कल शाम की है। हमारे पास समय ही समय है।" सचिन ने भी सौम्पा की हाँ में हाँ मिलते हुए कहा।



“लेकिन यह कोई कहानी नहीं अपितु दो लोगों के जीवन का दुखान्त है। क्या अब भी सुनना चाहोगे?" उस लड़की ने गम्भीर स्वर में पूछा तो दोनों ने हाँ में सिर हिला दिया।



"तो सुनो। यह तब की बात है जब..." "प्रिया! क्या अभी भी वो बाइक पर हमारा पीछा कर रहा है?", दीप्ति ने घबराते हुए पूछा। दोनों अपनी-अपनी स्कूटी पर एक साथ कॉलेज से लौट रही थीं। प्रिया ने पीछे मुड़ कर देखना चाहा लेकिन दीप्ति ने इशारे से मना कर दिया। उसने स्कूटी के साइड मिरर से देखा तो दह लड़का अपनी बाइक पर उनके पीछे आ रहा था।



“जाने कब से हमारा पीछा कर रहा है?", दीप्ति ने गुस्से में बड़बड़ाते हुए कहा। “हाय! खूबसूरत है ना?", प्रिया ने आह भरते हुए दीप्ति को चिढ़ाने के लिए पूछा तो उसकी आँखों में एक शरारत थी। बेशक वह लड़का खूबसूरत था और अच्छी कद-काठी का था लेकिन प्रिया ने बस दीप्ति को तंग करने के लिए कहा था। जवाब में दीप्ति ने उसे गुस्से में घूर कर देखा तो प्रिया का चेहरा उतर गया। प्रिया दीप्ति की इकलौती सहेली थी और दोनों ने अभी कुछ ही दिन पहले एक साथ एमबीए में एडमिशन लिया था।



दीप्ति बाकी लड़कियों से कई ढातों में अलग थी। उसको जीवन में कुछ कर गुज़रने का लक्ष्य था। दूर से देखकर कोई उसे लड़की नहीं कह सकता था। लड़कों की तरह ही छोटे बाल, उनकी तरह के कपड़े और सबसे खास बात थी उसका बिंदासपन। किसी भी मुश्किल का सामना करने के लिए अकेली खड़ी हो जाती थी। घर में मॉम और नानी की जान उर्फ़ 'शेर पुत्तर' थी। बाहर तो उससे पंगा लेने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था लेकिन शायद यह कोई नहीं जान सकता था कि बाहर से चाहे दह कितनी भी सख़्त दिखने की कोशिश करे, अन्दर से वह उतनी ही नाजुक थी। आज तक कई लड़कों का मुँह बन्द कर चुकी थी और १-२ की तो पिटाई भी करवा चुकी थी। मगर आज उस लड़के को अपना पीछा करते देख उसका दिल घबरा रहा था।



इन्सान बाहर से जितना मर्जी मज़बूत होने का दिखाठा करता हो लेकिन ठक़त बेवकत उसकी असलियत सामने आ ही जाती है। आज तक दीप्ति का किसी लड़के ने पीछा नहीं किया था। यह उसके लिए एक नया अनुभव था। उसके अन्दर सोई हुई लड़की अचानक से जाग गई थी। बाकी लड़कियों की तरह उसे भी कुछ डर सा लगने लगा था लेकिन दह अपने चेहरे पर डर के भाद नहीं आने देना चाहती थी।




प्रिया उससे बिल्कुल उलट थी। अमीर माँ-बाप की इकलौती बेटी होने की वजह से वह उनकी लाडली थी। एमबीए में तो उसने प्रदेश सिर्फ़ इसलिए लिया था ताकि घरदालों का उस पर शादी कर लेने का दबाव कुछ हद तक तो कम हो जाए। उसकी पढ़ाई से ज़्यादा रुचि साहित्य में थी। जाने कितनी किताबें घोल कर पी गई थी। किताबों से फुर्सत मिलती तो दीप्ति उसके पास होती थी। इसलिए किसी लड़के का उसकी ज़िन्दगी में आना नामुमकिन ही था। लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि वह लड़कों से दूर भागती थी। उसे भी एक सच्चे प्रेमी की तलाश थी जो दीप्ति के साथ रहते हुए एक स्वप्र ही लगता था। दीप्ति के पास रहने का प्रिया को फायदा भी था कि वह उसके साथ सुरक्षित थी। यूँ तो प्रिया किताबी रूप से समझदार थी लेकिन दुनियादारी के बारे में इतनी चालाक नहीं थी इसलिए लोग उसे 'ब्यूटी विदाउट ब्रेन' ही समझते थे।



दीप्ति ने ट्रैफिक में फंसे हुए ही फिर से साइड मिरर से देखा तो वह लड़का पीछे से उसे सिर उठा कर देख रहा था और कुछ इशारा करके कहने का प्रयास कर रहा था। उसके इस छिछोरेपन से वह तिलमिला उठी। दह लड़का उसके पास आना चाहता था लेकिन ट्रैफिक इतना ज़्यादा था कि निकलना मुश्किल हो रहा था। वह लड़का दीप्ति के पीछे काफी दिनों से था। जब उसे कॉलेज ३-४ दिन ही हुए थे तो उसने पहली बार उसे देखा था।



“एक्सक्यूज़ मी! मैंने शायद आपको पहले कहीं देखा है", उसने दीप्ति से पहली मुलाकात में ही कहा था।



"९०% लड़कों का किसी लड़की से बात करने का यही तरीका है, लेकिन काफी घटिया और पुराना है", दीप्ति ने मुँह बनाते हुए उसे तपाक से जवाब दे मारा था। इतना कहकर वह तो चली गई थी जबकि वह लड़का मुँह लटकाए खड़ा रहा था।



उसके बाद वह लड़का उसके करीब तो कभी नहीं आया था लेकिन दीप्ति ने गौर किया था कि वह उसे अजीब सी नजरों से देखा करता था जैसे कि आँखों से ही कुछ कहना चाहता था। दीप्ति भी सोच में पड़ गई थी कि क्या वह सच में उसे जानती थी? लेकिन दिमाग पर बहुत ज़ोर देने पर भी उसे कभी ऐसा नहीं लगा। अब उसे यकीन हो गया था कि वह लड़का उससे करीबी बढ़ाने के लिए ही झूठ बोल रहा था। पहले तो वह उसे सिर्फ़ देखा ही करता था लेकिन आज जब दह प्रिया के साथ कैंटीन में बैठी हुई थी तो वह वहाँ भी पहुँच गया था। हद तो तब हो गई जब उन दोनों के दहाँ से निकलने के बाद वह पीछा करता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा था।



तभी उसकी मोढाइल की घंटी ने उसके विचारों की शान्त झील में एक कंकड़ का काम किया। दीप्ति ने देखा तो मॉम की कॉल थी। "दीपू बेटा कहाँ हो? आज बहुत देर कर दी।" मोबाइल उठाते ही मॉम की आवाज़ कानों में पड़ी।



*आ रही हूँ मेरी डार्लिंग मॉम। ट्रैफिक में फंसी हूँ।" उसने भी शब्दों की मिठास से मॉम की चिन्ता कम की और कॉल ख़त्म करके मुस्कुरा दी। "मॉम भी न... मुझे अब तक बच्ची ही समझती हैं", उसने बुड़बुड़ाते हुए मोबाइल फिर से जीन्स की जेब में ठैँस लिया।



प्रिया ने मुड़ कर देखा तो उस लड़के ने दीप्ति को बुलाने का इशारा किया। वह इतनी दूर था कि उसकी आवाज़ ट्रैफिक के शोर-शराबे में उन तक नहीं पहुँच पा रही थी।



"दीप्ति दो लड़का तुम्हें बुलाने का इशारा कर रहा है", इस बार प्रिया ने भी मायूस होते हुए कहा। डर और चिन्ता की लकेरें उसके माथे पर साफ देखी जा सकती थीं।



“बेवकृफ! तुमने पीछे मुड़ कर देखा ही क्‍यों?" दीप्ति ने गुस्से में उसे दाँत पीसते हुए कहा लेकिन जब उसे महसूस हुआ कि लोग उसकी तरफ देख रहे थे तो वह तुरन्त चुप हो गई। प्रिया ने भी गलती मानते हुए धीमी आदाज़ में उसे सॉरी कहा जिसे दोनों के सिदा उसे कोई नहीं सुन पाया।



तभी ट्रैफिक खुला और दोनों तेज़ी से अपनी-अपनी स्कूटी भगाती हुई वहाँ से निकल गईं। वह लड़का ट्रैफिक में काफी पीछे रह गया था। यह देख कर दोनों ने राहत की साँस ली। दोनों को पता था कि वो लड़का दोनों का अगले दिन भी पीछा कर सकता था लेकिन फिलहाल खतरा टल चुका था।



प्रिया का घर नज़दीक आ गया तो वह दीप्ति को बाय बोलती हुई अपने घर की तरफ मुड़ गई। लेकिन दीप्ति को याद आया कि उसे घर जाने से पहले अपनी मॉम के बुटीक होते हुए जाना था इसलिए वह दूसरी तरफ मुड़ गई। अभी वह ज़्यादा दूर नहीं गई थी की उसे वही लड़का बेतहाशा रफ्तार में बाइक दौड़ाता हुआ उसके पीछे आता जान पड़ा। साइड मिरर से देखते हुए वह उसके करीब, और करीब आता जा रहा था। दीप्ति का गुस्सा अब सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने स्कूटी को सड़क के किनारे रोक लिया। इतने में वह लड़का भी बाइक से उसके करीब आ कर रुका।



दीप्ति की आँखें गुस्से में लाल हो चुकी थीं। दह साँस फुलाते हुए चिल्लाई, "तुम्हें लड़कियों की पीछा करने का बहुत शौक है? बुलाऊँ पुलिस को?"



दीप्ति का यह रूप देख कर वह लड़का हक्‍्का-बक्का रह गया। उसने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि दीप्ति ने उसका कॉलर पकड़ लिया। लोग यह सब देख कर इकट्ठे होने लगे।




आजकल यूँ दुनिया में लोगों के पास वक़्त की कमी का बहुत जोरदार बहाना होता है मगर इस प्रकार का मुफ्त का मनोरंजन देखने को सब तैयार हैं। कुछ तो लगे हाथ अपनी भड़ास उस प्राणी पर निकाल ही देते हैं। इससे पहले कि उस लड़के का भी यही अन्जाम होता, दह अपने आप को बचाने के लिए किताब से चेहरा ढकते हुए चिल्लाया, "मैं तो तुम्हारी किताब देने आया था जो तुम कैंटीन में मेज़ पर भूल आई थी।"



उसे मारने के लिए उठा दीप्ति का हाथ ह॒दा में दहीं रुक गया। उसने किताब छीनते हुए गौर से देखा तो वह किताब उसी की थी। यह देखकर उसके तेवर ढीले पड़ गए। दह झेंपते हुए उससे दूर होकर बोली, "तो पहले क्यों नहीं बताया?"



“तुमने मौका ही कब दिया?" उस लड़के की जान में जान आई और तमाशा ख़त्म हुआ देख सब वहाँ से खिसकने लगे। अब वहाँ उनके मनोरंजन की कोई सामग्री उपलब्ध नहीं थी। सब "व्यस्त" जो थे।



“मिस दीप्ति! आज आपके कारण मैं बेवजह पिट जाता", उसने मुस्कराते हुए कहा जिस पर दीप्ति ने नज़र झुका ली। वह अपनी गलती पर शर्मिंदा तो थी लेकिन उसे इस बात की हैरानी हुई कि दह लड़का उसका नाम तक जानता था। उसका गुस्सा फिर से भड़कना लगा। साथ ही साथ कुछ डर भी लग रहा था कि क्‍या दह उस पर नज़र रखे हुए था? लेकिन लड़के की बातों से दीप्ति की सब आशंकाओं पर दिराम लग गया।



“मैंने कहा था न कि मैंने तुम्हें कहीं देखा है। लेकिन मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा था। आज किताब में तुम्हारा नाम देखकर सब याद आ गया। तुम दीपू हो न?" लड़के के इतना कहते ही दीप्ति ने चौंक कर सिर उठाया और आँखें बड़ी करके उसे पहचानने की कोशिश करने लगी। उसे इस नाम से तो माँ और नानी ही पुकारती थीं। दह यह सोचने पर मजबूर हो गई कि उस लड़के को उसका यह नाम कैसे पता था?



गिले वो अजनवी बन कर... जिनके होठों पर रहते थे हय हँसी वन कर जिनकी जाँखों से बहते थे नगरी बन कर गिले गो अजनवी बन कर



दीप्ति गौर से उसके चेहरे का निरीक्षण कर रही थी। उसकी आँखें छोटी हो गईं जैसे बहुत बारीकी से उसके चेहरे को परखने का प्रयास कर रही हो। किन्तु उसकी आँखों पर लगे बड़े फ्रेम वाले ब्रांडिड चश्मे ने उसका आधा चेहरा ढक रखा था जिससे दीप्ति को अपने काम में बाधा उत्पन्न होती प्रतीत हो रही थी। वह लड़का यह सब देखकर मुस्कुरा रहा था। जैसे- जैसे उसके चेहरे को ध्यानपूर्वक देखते हुए उसे न पहचान पाने के कारण दीप्ति के माथे के बल गहराते जा रहे थे, वैसे-वैसे लड़के की मुस्कान बढ़ती जा रही थी। दीप्ति को परेशान देखते हुए उसकी मुस्कान एक शरारत भरी हँसी में ददल गई और उसके बन्द होंठों का कपाट खुलते ही उसके सफेद दाँत दिखने लगे। इससे दीप्ति की असफलता खीझ में बदलने लगी और उसके चेहरे पर और अधिक गम्भीरता के भाद आने लगे लेकिन वह अभी भी हार न मानते हुए उसे पहचानने के प्रयास में लगी हुई थी। बार-बार उसकी नज़र उसके धूप के चश्मे पर जा टिकती थी जिसमें स्वयं का प्रतिबिम्ब देखकर उसकी तन्द्रा भंग हो जाती थी। बेचारी दीप्ति की मनोस्थिति को समझते हुए उसने दया दिखा कर अन्ततः अपने चेहरे दो धूप का चश्मा हटा ही लिया।



दीप्ति ने दोबारा उस चेहरे को गौर से देखा तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई जैसे कोई वर्षो से गुम खज़ाना मिल गया हो। शरीर में एक सरसराहट सी दौड़ गई और दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने अपने खुले हुए मुँह पर हाथ रखते हुए एक आह भरी। अगले ही पल हैरानी से उसने मुँह से हाथ हटाते हुए कम्पित आवाज़ में धीमे सदर में उसे पुकारा, "राहुल !!!"



अपना नाम सुनते ही लड़के के होंठों की हल्की हँसी ठहाके में बदल गई थी जिसने दीप्ति के अन्दाज़े पर मुहार लगा दी। दीप्ति ने इस बार उसे ऊपर से नीचे तक बहुत गौर से देखा। गोरा रंग और मज़बूत कद-काठी का मालिक, अच्छी तरह से सँदरे हुए बाल, जींस और टी-शर्ट और पैरों में ब्रांडेड जूते और चेहरे पर चश्मा उसका रुतबा बता रहे थे लेकिन इन सबसे ऊपर भी एक चीज़ होती है व्यक्तित्द।



अपना नाम सुनते ही लड़के के होंठों की हल्की हँसी ठहाके में बदल गई थी जिसने दीप्ति के अन्दाज़े पर मुहार लगा दी। दीप्ति ने इस बार उसे ऊपर से नीचे तक बहुत गौर से देखा। गोरा रंग और मज़बूत कद-काठी का मालिक, अच्छी तरह से सँदरे हुए बाल, जींस और टी-शर्ट और पैरों में ब्रांडेड जूते और चेहरे पर चश्मा उसका रुतबा बता रहे थे लेकिन इन सबसे ऊपर भी एक चीज़ होती है व्यक्तित्व।



अधिकतर लोग दौलत की चकाचौंध से किसी के व्यक्तित्व का अन्दाजा लगाते हैं लेकिन ये दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। राहुल दिखने में शुरु से ही सुन्दर था परन्तु उसकी सबसे बड़ी खासियत थी उसकी मुस्कान जो सदा उसके होंठों पर रहती थी और सबको दीठाना बनाने के लिए काफी थी।



राहुल के सामने दुबली-पतली दीप्ति बिल्कुल बच्ची ही लग रही थी। लड़कों की तरह छोटे-छोटे बाल, पतला लेकिन खूबसूरत चेहरा, उम्मीद से चमकती आँखें जो राहुल को देखकर हैरानी से बड़ी हो गई थीं और पतले मगर खूबसूरत होंठ चेहरे की शोभा बढ़ा रहे थे। इतने पर भी दह अपनी उम्र से कम ही लगती थी।



राहुल को देखकर दीप्ति का दिल न जाने क्यों आज फिर उसी तरह से धड़क गया। वह अभी यादों में खोने ही वाली थी कि राहुल ने उसकी आँखों के आगे चुटकी बजाकर उसे यादों में जाने से रोका और फिर उसकी तरफ बढ़कर उसके इर्द-गिर्द अपनी बाहों का घेरा बनाते हुए उसे धीरे से गले लगा लिया। हालांकि यह एक दोस्ताना आलिंगन ही था लेकिन फिर भी दीप्ति थोड़ा-सा सकपका गई। हमेशा लड़कों से दूर रहने वाली दीप्ति के इतने करीब पहली बार कोई लड़का आया था और दो भी राहुल। यह तो हमने ख्वाब में भी नहीं सोचा था।



"तुम यहाँ कैसे?" दीप्ति ने उससे दूर होते हुए खुद को संभाल कर पूछा।



राहुल उसके इस सवाल पर मुस्कुरा दिया, "यह तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए। हम तो काफी साल पहले यहाँ आ गए थे।" “६ साल हो गए", दीप्ति शायद उसे याद दिलाना चाहती थी कि वह भी उसे भूली नहीं थी।



"हाँ ६ साल हो गए। लेकिन तुमने मेरी बात का जदाब नहीं दिया। तुम दिल्‍ली कब आई?" राहुल ने बहुत बेसब्री से पूछा जैसे सारी बातें एक ही दिन में जान लेना चाहता था।




"तुम्हारे जाने के एक साल के बाद मैं और मॉम नानी के घर आ गए थे और यहीं पर शिफ्ट....", दीप्ति अभी उसे बता ही रही थी कि उसके मोबाइल की घण्टी बज उठी। “दीपू बेटा कहाँ रह गई?", मोबाइल कान से लगाते ही मॉम की परेशान आदाज़ उसे अतीत के सुनहरे सफ़र से बाहर खींच लाई।



"आ रही हूँ मॉम। मैं आकर ढताती हूँ", उसने अपनी खुशी को छिपाने का भरसक प्रयास करते हुए मॉम से कहा। पता नहीं राहुल से दर्षों बाद मिलने की कौन सी खुशी थी जिससे उसके शरीर में एक अजीब सी सनसनाहट हो रही थी, जिसे उसने पहली बार महसूस किया था।



"तुम कहाँ रहती हो?”, राहुल ने उसके मोबाइल से अलग होते ही पूछा। “जनकपुरी", दीप्ति की आदाज़ में एक अलग तरह की खनक थी। अरे! मेरा घर ग्रेटर कैलाश २ में है", राहुल ने हैरान होते हुए कहा। “कमाल है। आज तक मुलाकात नहीं हुई इतने सालों में", दीप्ति भी हैरत से बोली। "क्योंकि किस्मत में ऐसे ही मिलना लिखा था", राहुल ने दीप्ति से हँसते हुए कहा तो उसने ध्यान दिया कि दे दोनों सड़क के किनारे खड़े थे।



“मुझे माफ़ करना। अभी जाना होगा। मॉम बुटीक पर मेरा इंतज़ार कर रही है। कल कॉलिज में मिलेंगे। बाय*, उसने मुस्कुराते हुए राहुल की ओर देखा और स्कूटी पर जाने लगी। उसका दिल अनजानी खुशी में तेज़ धड़क रहा था। वह खुद को सम्भालने के लिए जल्दी से राहुल से दूर जाना चाहती थी। “अपना मोबाइल नंबर ही दे जाओ", राहुल ने पीछे से उसे पुकारा लेकिन वह दूर जा चुकी थी।




दीप्ति ने स्कूटी चलाते हुए ही हँसकर पीछे मुड़कर देखा और दूर से ही चिललाई, "बहुत जल्दी रहती है तुम्हें। कल कॉलेज में मिलना।" उसकी इस अदा पर राहुल भी हँसे बिना न रह सका।



दीप्ति ने अगले मोड़ पर जाकर स्कूटी रोकी तो अपनी धड़कन को तेज़ पाया। आज पहली बार कोई लड़का उसके इतने करीब आया था। उसे राहुल के साथ बिताए बचपन के पल याद आने लगे। लेकिन वर्तमान में लौटते हुए वह अपनी मॉम के बुटीक के तरफ़ बढ़ गई।



शादियों का मौसम आने वाला था इसलिए बुटीक में बहुत काम होता था जिस कारण दीप्ति की मॉम खुद सामान लेने नहीं जा सकती थी। उन्होंने वही लाने के लिए दीप्ति को बुलाया था। कभी-कभी किसी खास ग्राहक की पोशाक तैयार करके उसके घर पर भी पहुँचानी पड़ती थी जिसे पहुँचाने का जिम्मा भी दीप्ति पर ही होता था। बुटीक में जाते ही उसकी मॉम ने उसे सामान की सूची थमा दी थी। दीप्ति की मॉम सुमन ने यह बुटीक अपने दम पर चलाया था। पहले घर पर लोगों के कपड़े सीते-सीते आज वह एक बड़े बुटीक की न सिर्फ अकेली मालकिन थी बल्कि उसने अपने जैसी और औरतों को भी काम देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में सहायता की थी। हालात के थपेड़ों ने उसे बहुत मज़बूत बना दिया था। लेकिन बाहर से दो जितनी सख्त दिखती थी, अन्दर से उतनी ही नर्म थी। कह सकते हैं कि व्यक्तित्व के हिसाब से दीप्ति अपनी माँ पर गई थी।



दीप्ति की नानी की कहानी भी कमोबेश ऐसी ही थी। लेकिन शुक्र है कि उनके पति अन्तिम साँस तक उनका साथ देते रहे दरना वे लोग रेत के महल की तरह बिखर गए होते। दीप्ति अपनी मॉम और नानी के साथ ही रहती थी।



“आज पता क्या हुआ?" दीप्ति ने रात के खाने के समय दिन की घटना का वृतान्त छेड़ दिया। दीप्ति की सबसे अच्छी खासियत यह थी कि जहाँ बच्चे इस उम्र में अपने माँ-बाप से बातें छुपाते हैं, वह दिन भर की हर अच्छी-बुरी बात उन दोनों को ज़रूर बताती थी। पहले तो वे दोनों औरतें किसी लड़के द्वारा उसका पीछा करने दाली बात से घबरा गईं लेकिन पूरी बात सुनकर उनकी साँस में साँस आई। दोनों वर्षों ढाद राहुल से दोनों मिलना चाहती थीं ताकि देखकर तसल्ली कर लें कि वह दोस्ती के लायक था भी या नहीं।



रात को दीप्ति अपने बिस्तर पर लेटी करवटें बदल रही थी। उसे राहुल से हुई आज की मुलाकात याद आ रही थी। फिर उसे राहुल के साथ बिताए बचपन के दो गुज़रे दिन याद आने लगे।




कुछ साल पहले अम्बाला में राहुल का परिवार दीप्ति के पड़ोस में रहता था। इकट्ठे खेलना, स्कूल जाना और शरारतें भी इकट्ठे ही करते थे। हालांकि राहुल की छोटी बहन दीप्ति की हमउम्र थी लेकिन दीप्ति उसके साथ न खेल कर राहुल के साथ ही खेलती थी।



बचपन से जवानी तक के रास्ते में एक बहुत नाजुक और खतरनाक मोड़ हुआ करता है, किशोरादस्था मतलब कि टीनेज जिसमें से हर कोई गुज़रता है, वे दोनों भी उसी दौर से गुज़रने लगे। उम्र के उस दौर में शरीर ही नहीं मन में भी कई बदलाव आने लगते हैं। मन में एक तरंग सी हिलोरे लेने लगती है। नर और मादा की एक-दूसरे को जानने की इच्छा और जिज्ञासा ही आकर्षण बनकर उन्हें करीब लाने लगती है। लेकिन इस खतरनाक मोड़ पर एक ऐसी गहरी खाई में पाँव फिसल कर गिरने का डर भी रहता जिसमें से इंसान फिर कभी उभर नहीं सकता। उसे इस मोड़ से सुरक्षित निकलने के लिए किसी अपने भरोसेमंद के सहारे की आवश्यकता होती है और राहुल दीप्ति का वही सहारा था।



उस कच्ची उम्र में दीप्ति के जिस्म में भी बदलाव आने लगे थे। राहुल के होते किसी की भी दीप्ति की तरफ गलत नज़र से देखने की हिम्मत नहीं थी। बचपन में उससे खूब झगड़ने वाला राहुल एकदम से उसका रखदाला बन गया था। दीप्ति पर भी उसके व्यक्तित्व का एक अनजाना और अनोखा असर होने लगा था। उसे राहुल का साथ अच्छा लगने लगा था। दोनों घंटों एक-दूसरे से बातें करते रहते थे। कभी-कभी तो बिना कुछ बोले एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहते।



"राहुल, नाम तो सुना ही होगा", अक्सर जब वह यह फिल्‍मी संवाद एक अदा के साथ बोलता तो दीप्ति खिलखिला कर हँसती। राहुल के अलादा आईना भी उसका दोस्त बन गया था। घण्टों खुद को आईने में निहारती रहती थी। क्या करे वह उम्र ही ऐसी होती है।



राहुल के पास जाने से पहले दह कई बार खुद को आईने में देखकर सन्तुष्ट होती थी कि दह अच्छी तो लग रही थी न? एक और परिवर्तन अब दीप्ति में आ चुका था और वह था शर्म। जब भी राहुल उसे मुस्कुरा कर देखता तो उसके गाल लाल हो जाते थे और धड़कन अजीब सी चाल चलती थी। फिर अक्सर दीप्ति की नज़र न चाहते हुए भी झुक जाती थी। यह बातें कोई सिखाता नहीं, बल्कि उम्र का असर होता है। जैसे उफनता हुआ दरिया अपना रास्ता खुद बना लेता है, ये अदाएं भी अपने आप आ जाती हैं।




अनजानी चीज़ों को जानने की एक अलग सी तलब होती है जो कहीं चैन नहीं लेने देती। दीप्ति का भी राहुल के प्रति आकर्षण बढ़ता ही जा रहा था। हर समय उसका चेहरा ही आँखों के सामने नज़र आता था। उसका हमेशा राहुल को ही देखने के दिल करता था। परन्तु आकर्षण और प्रेम में एक बहुत बड़ा फर्क होता है, समझ का फर्क। कच्ची उम्र इसे समझ नहीं सकती और न ही इस समझ का बोझ उठा सकती है। कच्ची मिट्टी के ढर्तनों में भी कभी पानी टिका है भला? यह उम्र दुनिया की किसी रिवायत, किसी दस्तूर को नहीं मानती और न ही माने तो ही अच्छा है। वरना दुनियादारी इसके सपनों को रौंद डालेगी।



दीप्ति एक पतंग की तरह बन गई थी जोकि आसमान में उड़ने ही दाली थी कि तभी उसकी डोर टूट गई। राहुल का परिवार दिल्‍ली शिफ्ट हो गया। दह उसे याद करके न जाने कितने दिन उदास रही थी। २-३ बार तो छुप-छुप कर रोई भी थी। जो बीज दिल की ज़मीन पर अपने आप गिरा था, इससे पहले कि वो मिट्टी पकड़ पाता, समय की तपिश में जल गया था। उसे अपनेपन का पानी मिल ही नहीं सका था।



"आज क्यों मिल गए तुम राहुल? अब क्या फायदा मिलकर?" दीप्ति ने मन ही मन हालात को कोसते हुए कहा। फसल सूख जाने के बाद बारिश का कोई फायदा नहीं। अब उसके दिल की ज़मीन बंजर हो चुकी थी। अब दोनों जदान हो चुके थे परन्तु दीप्ति वो पहले वाली दीप्ति नहीं रही थी। पहले उसके दिल में कुछ अंकुर फूटा होता तो शायद कुछ बात बनती लेकिन अब तो इस बात की कोई उम्मीद भी नहीं थी।



दीप्ति ने लाइट जला कर ठक़्त देखा तो घड़ी रात के २ बजा रही थी। उसे आश्चर्य हुआ कि इतने वर्षों बाद वह यह सब क्यों सोच रही थी जबकि उसे यह पता नहीं था कि राहुल को दो सब याद भी था या नहीं। दह यह भी नहीं जानती थी कि राहुल के मन में उसके लिए अब भी वही सब था या नहीं। फिर भी पता नहीं क्‍यों वह फिर से उसके मोहपाश में फैंसने लगी थी। समय का चक्र फिर से घूम कर उसी जगह ले जाने का प्रयास कर रहा था जहाँ कभी यह सब छूट गया था।



“नहीं। अब यह सब असम्भव है। मुझे उससे दूरी बना कर ही रखनी चाहिए। अब उससे नहीं मिलूँगी।”, यह सोच कर वह फिर से लाइट बन्द करके सोने का प्रयास करने लगी।




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